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सारांशः एक तेज़ गिरावट ने हाउसिंग फ़ाइनेंस स्टॉक्स के वैल्यूएशन को फिर से सेट कर दिया है. अब, रिकवरी के शुरुआती संकेत दिखने लगे हैं. हमारे गहरे एनालेसिस में जानें कि असल में क्या बदल रहा है और निवेशकों को आगे किन बातों पर नज़र रखनी चाहिए.
अफ़ोर्डेबल सेगमेंट पर फ़ोकस करने वाली हाउसिंग फ़ाइनेंस कंपनियों, यानी आधार हाउसिंग फ़ाइनेंस, आवास फ़ाइनेंसर्स, एप्टस वैल्यू हाउसिंग, होम फ़र्स्ट फ़ाइनेंस और इंडिया शेल्टर फ़ाइनेंस के शेयरों के लिए पिछले 18 महीने काफ़ी मुश्क़िल रहे हैं. 2024 के मध्य में शुरू हुई गिरावट ने वैल्युएशन को ज़मीन पर ला दिया और प्राइस-टू-बुक मल्टीपल 6 से 7 गुना के ऊंचे शिखर से घटकर 2 से 3 गुना पर आ गए.
इस गिरावट के पीछे दो बड़ी वजहें थीं. पहली, लोन ग्रोथ 30% से ज़्यादा की तेज़ रफ़्तार से घटकर 20% के आसपास आ गई, जो अभी भी ठीक-ठाक है लेकिन उतनी रोमांचक नहीं. इसके साथ ही, लोन की वसूली पर भी दबाव बढ़ गया, क्योंकि इस सेगमेंट के मुख्य आधार माने जाने वाले अनौपचारिक उधारकर्ताओं ने अपनी किश्तें चुकाना बंद कर दिया.
अब वो दबाव धीरे-धीरे कम होने लगे हैं. मुनाफ़ा फिर से ऊपर आने लगा है, जो बताता है कि शायद सबसे बुरा वक़्त गुज़र चुका है. बाज़ार ने वैल्युएशन पहले ही घटा दिए हैं और अब फ़ंडामेंटल्स बेहतर होते दिख रहे हैं. इस मेल की वजह से यह सेक्टर बेहतर उम्मीदों और फिर से पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था वाला सेक्टर बन गया है, जिस पर अब और बारीक़ी से ग़ौर करना बनता है.
बेहतरीन रिटर्न मेट्रिक्स वाला सेक्टर
अफ़ोर्डेबल हाउसिंग लेंडर्स बाज़ार के उस हिस्से में काम करते हैं जहां कॉम्पिटिशन कम है. LIC हाउसिंग फ़ाइनेंस, बजाज हाउसिंग फ़ाइनेंस जैसी बड़ी हाउसिंग फ़ाइनेंस कंपनियां और बैंक ₹50 लाख से ज़्यादा के सैलरीड बॉरोअर सेगमेंट पर राज करते हैं. इनके मुक़ाबले ये कंपनियां सेल्फ़-एम्प्लॉइड ग्राहकों को, यानी छोटे व्यापारी, दुक़ानदार और दिहाड़ी मज़दूर को, ₹25 लाख से कम के लोन देती हैं.
इस तरह के कर्ज़दारों को समझना और सर्विस करना मुश्क़िल होता है, इसीलिए बड़े लेंडर इस सेगमेंट से दूर रहते हैं. इसका फ़ायदा भी साफ़ दिखता है: कम प्रतिस्पर्धा की वजह से लेंडिंग रेट्स ज़्यादा रखे जा सकते हैं. यही प्राइसिंग पावर इनके यूनिट इकोनॉमिक्स को मज़बूत बनाती है, रिटर्न ऑन एसेट्स 3 से 8% के बीच और इक्विटी पर रिटर्न 15 से 20% के दायरे में रहता है.
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मेट्रिक्स
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आधार | आवास | होम फ़र्स्ट | एप्टस वैल्यू | इंडिया शेल्टर |
|---|---|---|---|---|---|
| AUM (करोड़ ₹) | 28,790 | 22,200 | 14,925 | 12,330 | 9,819 |
| 5 साल का औसत ROA (%) | 3.6 | 3.4 | 3.5 | 6.7 | 4.6 |
| 5 साल का औसत ROE (%) | 16 | 13.9 | 13.5 | 14.2 | 13.1 |
मार्जिन सुधरने लगे हैं
सेक्टर के वापसी करने का पहला संकेत है, नेट इंटरेस्ट मार्जिन यानी NIM में सुधार. जब RBI ने रेट कट साइकल शुरू किया, तो इन लेंडर्स ने बॉरोअर्स को कम दरों का फ़ायदा पहले दे दिया, जबकि उनकी अपनी उधारी की लागत तब तक नहीं घटी थी. इससे मार्जिन पर दबाव बना रहा. अब वो फ़र्क़ कम हो रहा है, उनके फ़ंड्स की लागत कम हो रही है और मार्जिन बढ़ने की गुंजाइश बन रही है.
रेपो रेट और फ़ंड्स की लागत के बीच का फ़र्क़ बताता है कि यह फ़ायदा अभी पूरी तरह नहीं आया है. Q3 FY25 से अब तक रेपो रेट 125 बेसिस पॉइंट कम हुई है, जबकि फ़ंड्स की लागत महज़ 40-50 बेसिस पॉइंट ही घटी है. यानी आगे और राहत मिलने की उम्मीद है.
कंपनियों के बीच फ़र्क़ उनके बॉरोअर मिक्स से तय होता है. होम फ़र्स्ट के पास ज़्यादा सैलरीड शहरी ग्राहक हैं, इसलिए वो बैंकों से सीधे मुक़ाबले में है और उसके मार्जिन कम हैं. दूसरी ओर एप्टस और इंडिया शेल्टर छोटे शहरों के सेल्फ़-एम्प्लॉइड बॉरोअर्स पर फ़ोकस करते हैं और 12-13% के NIM के साथ मज़बूत प्राइसिंग पावर बनाए रखते हैं.
NIM (%)
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तिमाही
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आवास | एप्टस | आधार | होम फ़र्स्ट | इंडिया शेल्टर |
|---|---|---|---|---|---|
| Q3 FY25 | 7.8 | 12.3 | 9.3 | 4.9 | 12.3 |
| Q3 FY26 | 8 | 13.3 | 9.5 | 6 | 12.6 |
| बदलाव | +20 bps | +100 bps | +20 bps | +110 bps | +30 bps |
एसेट क्वालिटी: परखी हुई, लेकिन टूटी नहीं
एसेट क्वालिटी थोड़ी कमज़ोर हुई है, लेकिन कोई बड़ा नुक़सान नहीं हुआ है. पिछले साल में ग्रॉस NPA 10-30 बेसिस पॉइंट बढ़ा है. यह मुख्यतः FY21 से FY24 के तेज़ ग्रोथ फ़ेज़ में दिए गए लोन के मेच्योर होने और बॉरोअर्स में अस्थायी कैश-फ़्लो दिक़्क़तों की वजह से हुआ है.
लॉन्ग-टर्म के आंकड़े देखें तो इन लेंडर्स का औसत GNPA 1 से 1.8% के बीच रहा है, जो इनके बॉरोअर प्रोफ़ाइल को देखते हुए आरामदायक दायरे में है.
उतना ही अहम यह है कि क्रेडिट कॉस्ट 16-60 बेसिस पॉइंट के बीच बनी हुई है, यानी 1% से काफ़ी नीचे. इसका मतलब है कि न तो बड़े पैमाने पर कोई तनाव है और न ही लेंडर्स को एग्रेसिव प्रोविज़निंग करनी पड़ रही है.
कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि एसेट क्वालिटी टिकी हुई है, गिरी नहीं है.
Gross NPA (%)
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कंपनी
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FY25 | FY24 | FY23 | FY22 | FY21 | औसत |
|---|---|---|---|---|---|---|
| आधार | 1.1 | 1.1 | 1.2 | 1.5 | 1.1 | 1.2 |
| आवास | 1.1 | 0.9 | 0.9 | 1 | 1 | 1 |
| एप्टस | 1.2 | 1.1 | 1.2 | 1.2 | 0.7 | 1.1 |
| होम फ़र्स्ट | 1.7 | 1.7 | 1.6 | 2.3 | 1.8 | 1.8 |
| इंडिया शेल्टर | 1 | 1 | 1.1 | 2.1 | 1.8 | 1.4 |
सेक्टर पर बने दबाव कम हो रहे हैं
जिन वजहों से गिरावट आई थी, वो भी अब थमने लगी हैं.
एक बड़ा दबाव था माइक्रोफ़ाइनेंस से ओवरलैप. बहुत से बॉरोअर एक साथ माइक्रोफ़ाइनेंस और हाउसिंग लोन दोनों चला रहे थे. जब माइक्रोफ़ाइनेंस लेंडर्स ने क्रेडिट सख़्त किया और वसूली तेज़ की, तो बॉरोअर्स ने पहले वो किश्तें चुकाईं और हाउसिंग लोन की किश्तें पीछे हो गईं.
इसके अलावा कुछ राज्यों में, ख़ासकर दक्षिणी बाज़ारों में, सरकारी दखल ने वसूली की प्रक्रिया को रोक दिया, जिससे कलेक्शन और भी प्रभावित हुआ.
अब दोनों दबाव कम हो रहे हैं. माइक्रोफ़ाइनेंस का तनाव घट रहा है, बॉरोअर्स पर क़र्ज़ का बोझ हल्का हो रहा है और वसूली पर लगी पाबंदियां हटा दी गई हैं. इसके चलते वसूली सामान्य हो रही है.
ग्रोथ कैसी दिख रही है?
हालात स्थिर होने के साथ क्रेडिट रेटिंग एजेंसी CRISIL का अनुमान है कि FY27 तक लोन बुक में 20-21% की बढ़त होगी, पीक सालों से कम लेकिन फिर भी मज़बूत.
सेक्टर की विस्तार योजनाएं भी इस अनुमान को सपोर्ट करती हैं. लेंडर्स लगातार ब्रांच बढ़ा रहे हैं और टियर-2 व टियर-3 शहरों में अपनी पकड़ मज़बूत कर रहे हैं, जहां पहले से होम लोन वॉल्यूम का 60% से ज़्यादा हिस्सा है. आवास दक्षिण और उत्तर भारत में फैल रहा है, एप्टस महाराष्ट्र और ओडिशा में, और आधार व इंडिया शेल्टर हर साल 40-60 नई ब्रांच जोड़ रहे हैं.
रिस्क: सिक्के का दूसरा पहलू
बेहतरी की कहानी में छुपे जोख़िमों को नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं होगा.
पहला, ज़्यादा रिटर्न का सबसे बड़ा स्रोत ही सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है. ये लेंडर्स क्रेडिट स्पेक्ट्रम के ज़्यादा जोख़िम वाले हिस्से में काम करते हैं. इनका प्रदर्शन सीधे इनफ़ॉर्मल आमदनी की सेहत से जुड़ा है. जब कैश-फ़्लो कमज़ोर होता है तो चुकाने की क्षमता भी घटती है. कोलैटरल के बावजूद मंदी में NPA बढ़ सकते हैं.
दूसरा, यह बिज़नेस ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील है. आज जो फ़ंडिंग डायनामिक्स मार्जिन बढ़ा रही है, अगर महंगाई फिर से सिर उठाए और दरें चढ़ें तो वही फ़ंडिंग डायनेमिक्स मार्जिन को उतनी ही तेज़ी से निचोड़ सकती है.
तीसरा, फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ में मज़बूत रिटर्न ज़्यादा देर तक बिना चुनौती के नहीं टिकते. तेज़ ग्रोथ और अच्छे मुनाफ़े के दौर में नए खिलाड़ी आते हैं और इतिहास बताता है कि ऐसे दौर में प्रतिस्पर्धा क्रेडिट डिसिप्लिन को कमज़ोर कर सकती है.
कुल मिलाकर
सेक्टर अपने सबसे मुश्क़िल दौर से निकलता दिख रहा है. मार्जिन सुधर रहे हैं, एसेट क्वालिटी टिकी हुई है और बॉरोअर्स पर बाहरी दबाव कम हो रहे हैं. ग्रोथ भले ही धीमी हुई है, लेकिन मज़बूत बनी हुई है.
वैल्युएशन भी अब खिंचे हुए नहीं हैं. यह फ़ंडामेंटल्स के टूटने का नहीं, बल्कि उम्मीदों के रीसेट होने का नतीजा है. लेकिन यह कोई सीधी-सादी रिकवरी स्टोरी नहीं है. जो चीज़ें ज़्यादा रिटर्न देती हैं, सीमित प्रतिस्पर्धा और ज़्यादा जोख़िम वाले बॉरोअर, वही चीज़ें नतीजों को ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाला और कम अनुमानित भी बनाती हैं.
इसलिए यह सेक्टर कुछ साल पहले के मुक़ाबले बेहतर स्थिति में है और मौजूदा वैल्युएशन एक क़रीबी नज़र का हक़ रखते हैं. फिर भी इनके रिटर्न रेशियो कितने टिकाऊ होंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लेंडर्स ग्रोथ और क्रेडिट डिसिप्लिन के बीच कितना सही तालमेल बिठाते हैं.
जहां फ़ायदा मज़बूत हो सकता है लेकिन नुक़सान को भी हल्के में न लिया जाए, ऐसे सेगमेंट में फ़र्क़ मौक़े में नहीं, बल्कि इस बात में होता है कि उसे कैसे भुनाया जाता है.
जिन सेक्टर में ग्रोथ और जोख़िम साथ-साथ चलते हैं, वहां सही बिज़नेस का चुनाव ही सब कुछ तय करता है.
यहीं पर रिसर्च-आधारित नज़रिया ज़रूरी हो जाता है. वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र टिकाऊ बिज़नेस को पहचानता है और अलग-अलग साइकल में उनके फ़ंडामेंटल्स को ट्रैक करता है. अगर आप इस स्पेस को देख रहे हैं तो यह चलती निग़रानी की एक ज़रूरी परत है जो महज़ हिस्सा लेने और असल निवेश के बीच का फ़र्क़ बता सके.
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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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