Anand Kumar
सारांशः 'क्या सब ठीक हो जाएगा?' - डॉट-कॉम बुलबुले के फूटने से लेकर अब तक, हर संकट में धीरेंद्र कुमार के पास यही सवाल आता है. उनका सच्चा जवाब क्या है और असल में क्या काम आता है - यह पढ़ने लायक़ है.
जब बाज़ार में उथल-पुथल होती है, तो मेरे इनबॉक्स में एक जाना-पहचाना पैटर्न दिखता है. आम दिनों में जो सवाल आते हैं, वो फ़ंड्स से जुड़े होते हैं - कौन-सा फ़ंड चुनें, किसी एक कैटेगरी से दूसरी में जाएं या नहीं, किसी फ़ंड मैनेजर के हालिया फ़ैसलों को कैसे समझें. यानी ये निवेश के सवाल होते हैं.
लेकिन जब तेल की क़ीमतें उछलती हैं और टीवी एंकर सामान्य से भी ज़्यादा चिल्लाने लगते हैं, तो जो सवाल आते हैं, वो असल में फ़ंड्स के बारे में होते ही नहीं. वो डर के बारे में होते हैं. वो निवेश से जुड़े सवालों की शक्ल में आते हैं - "क्या SIP रोक दूं?", "क्या अभी डेट में चले जाना सही रहेगा?", "मेरा पोर्टफ़ोलियो कितना गिरा?" - लेकिन असल में इन सबके पीछे एक बहुत सीधा और इंसानी सवाल छिपा होता है: क्या सब ठीक हो जाएगा?
मैं इस काम में इतने लंबे समय से हूं कि यह सवाल कई बार सुन चुका हूं. डॉट-कॉम की तबाही में. 2008 के संकट के बाद. मार्च 2020 के कोविड क्रैश में. और अब, जब होर्मुज़ की खाड़ी के पास जंग जैसे हालात से तेल की क़ीमतें उन स्तरों को पार कर रही हैं जो लोगों को सच में घबराहट दे रहे हैं. हर बार सवाल वही होता है. और हर बार सच्चा जवाब भी वही होता है: शायद हां, लेकिन इसलिए नहीं कि अगले 48 घंटों में आप कुछ कर सकते हैं.
मुझे जो सवाल से भी ज़्यादा दिलचस्प लगता है, वो है उसके पीछे की बेचैनी - और यह बेचैनी आती कहां से है. मेरे तजुर्बे में, संकट के वक़्त सबसे ज़्यादा घबराने वाले निवेशक वो नहीं होते जिनका पोर्टफ़ोलियो सबसे ज़्यादा गिरा हो. वो होते हैं जो यह साफ़ नहीं देख पाते कि उनके पास है क्या.
जिस निवेशक ने तीन अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म पर, परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर, कुछ एडवाइज़र के ज़रिए, कुछ सीधे, कुछ याद, कुछ भूले हुए - जगह-जगह फ़ंड इकट्ठे किए हों, वो ऐसे वक़्त में सच में मुश्किल में होता है. इसलिए नहीं कि उसका पोर्टफ़ोलियो बुरा हो, बल्कि इसलिए कि वो उसे देख नहीं सकता. और जो दिखता नहीं, उसे कल्पना भर देती है - और कल्पना हमेशा असलियत से बदतर तस्वीर बनाती है.
Value Research Fund Advisor के पोर्टफ़ोलियो एनालिसिस टूल्स बनाते वक़्त मेरे दिमाग़ में यही बात थी. पूरे परिवार के निवेश को एक जगह देखने की सुविधा - अपना, पत्नी का, माता-पिता का, बच्चों का - यह सिर्फ़ एक सहूलियत भर नहीं है. मेरे हिसाब से यह किसी भी रिटेल निवेशक के पास मौजूद सबसे अहम संकट-प्रबंधन टूल है.
जब सब कुछ एक जगह दिखे और हर फ़ंड पर Buy, Sell या Hold का साफ़ संकेत हो, तो "क्या कुछ करना चाहिए?" का जवाब अपने आप मिल जाता है. आप देखते हैं कि SIP तय समय पर चली, जो फ़ंड्स हैं उनकी रेटिंग पिछले महीने जैसी ही है और किसी पर कोई अलर्ट नहीं है. आप ऐप बंद करते हैं. और अपने काम में लग जाते हैं.
लेकिन इससे भी गहरी बात है, जो साफ़ शब्दों में कहनी चाहिए. एक अच्छी तरह से बना हुआ पोर्टफ़ोलियो - जो आपके असल लक्ष्यों, आपके निवेश के समय और अलग-अलग एसेट क्लास में समझदारी से बंटवारे पर बना हो - वो पहले से ही इसी तरह के संकटों के लिए बना होता है.
इसलिए नहीं कि Value Research में किसी ने ईरान के संघर्ष का अनुमान लगाया था, या हमारे Portfolio Planner की होर्मुज़ की खाड़ी पर कोई राय है. न उसकी कोई राय है, न मेरी. लक्ष्य-आधारित पोर्टफ़ोलियो बनाते वक़्त बस यह मान लिया जाता है कि बुरे वक़्त आ सकते हैं. कि बाज़ार में तेज़ गिरावट के दौर आएंगे. कि तेल उछलेगा या ब्याज दरें अचानक बदलेंगी, या कोई भू-राजनीतिक घटना ऐसी सुर्खियां बनाएगी जो उस पल स्थायी तबाही की शुरुआत लगेंगी.
आपके पोर्टफ़ोलियो में बना एसेट एलोकेशन उसी अनिश्चितता की स्वीकृति है, जो आंकड़ों में जाहिर होती है. यह किसी तरह से भविष्यवाणी का उलटा है. यह एक व्यवस्थित तरीक़े से यह मान लेना है कि हमें नहीं पता क्या होगा, और एक ऐसा स्ट्रक्चर खड़ा करना है जो इस न जानने के बावजूद टिक सके.
यही बात लक्ष्य-आधारित निवेश को उस आम तरीक़े से अलग करती है जिसमें लोग यह मानकर निवेश करते हैं कि भविष्य कमोबेश हाल जैसा ही दिखेगा.
ऐसे वक़्त में दूसरी तरह का निवेशक सबसे ज़्यादा बिखरता है. उसका मानसिक मॉडल टूट जाता है. लक्ष्य-आधारित निवेशक को आदर्श रूप से कुछ अलग महसूस होता है - यह नहीं कि जो हो रहा है उससे बेपरवाही हो, बल्कि यह एहसास कि ऐसी घटनाएं पहले से किसी न किसी तरह मान ली गई थीं. अनुमान नहीं लगाया था, लेकिन बजट में रखा था. मैं जानता हूं यह बहुत आसान लग सकता है. जब रसोई गैस महंगी हो रही हो और ख़बरें लगातार निराशाजनक हों तो यह जानना कि आपको टिके रहना चाहिए और असल में टिके रहना है, इन दोनों के बीच की खाई छोटी नहीं है.
यही वजह है कि मेरे हिसाब से संकट के दौरान Fund Advisor जो सबसे क़ीमती चीज़ देता है, वो सलाह नहीं, वो स्पष्टता है. सलाह मैं किसी कॉलम में दे सकता हूं, या शनिवार सुबह Fund Advisor Live में, जब मेरी टीम और मैं रियल टाइम में सदस्यों के सवालों पर काम करते हैं. लेकिन एक कॉलम आपको वो नहीं दे सकता कि आप अपनी ख़ास स्थिति को, अपने ख़ास फ़ंड्स के साथ, देख सकें और यह जान सकें कि सब सही है. उसके लिए आपको अपना पोर्टफ़ोलियो साफ़-साफ़ देखने में सक्षम होना होगा. ज़्यादातर भारतीय निवेशक, अगर वो ईमानदार हों, तो आम दिनों में भी यह नहीं कर पाते. संकट में इस धुंध की क़ीमत बहुत साफ़ दिखती है.
एक बात और कहना ज़रूरी है. जब इस तरह के संकट आते हैं, तो एक ख़ास किस्म का फ़ाइनेंशियल बिचौलिया बहुत सक्रिय हो जाता है. फ़ोन आते हैं. मीटिंग के प्रस्ताव आते हैं. संदेश - कभी सीधे, कभी इशारों में - यह होता है कि कुछ करना ज़रूरी है, और करने के लिए बिचौलिए की मदद लेनी होगी.
मैं यह नहीं कह रहा कि यह सब स्वार्थ से भरा है - कुछ में सच्ची चिंता भी होती है. लेकिन कमीशन-आधारित सलाह के स्ट्रक्चर का मतलब है कि निष्क्रियता की तुलना में, कोई कदम उठाना सेलर के लिए हमेशा ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है।
Fund Advisor जिस फ्लैट-फ़ी मॉडल पर चलता है, उसमें ऐसी कोई बात नहीं. जब मैं कहता हूं कि आपका पोर्टफ़ोलियो शायद ठीक है और आपको इसे छोड़ देना चाहिए, तो इससे मेरी कंपनी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. आपके लिए क्या अच्छा है और हमारे बिज़नेस मॉडल में किस चीज़ को फ़ायदा मिलता है-इन दोनों के बीच का यह तालमेल तब बहुत मायने रखता है, जब बाकी सभी लोगों की इस बारे में एक पक्की राय हो कि आपको तुरंत क्या करना चाहिए।
मेरे इनबॉक्स में जो सवाल आते हैं, उनका जवाब आमतौर पर मेरी किसी बात से नहीं, बल्कि वक़्त गुज़रने से मिलता है. जो निवेशक अपना पोर्टफ़ोलियो साफ़ देख सकते हैं और उसे वैसा ही पाते हैं जैसा उन्होंने उम्मीद की थी, वो उन लोगों के मुक़ाबले शांत रह पाते हैं जो नहीं देख सकते. यही इस पूरी बात का मक़सद है. और पिछले 30 सालों के तजुर्बे को देखें, तो यह अब भी उतना ही सच है.
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