Anand Kumar
सारांशः ख़ासकर सतर्क निवेशकों के लिए, डिविडेंड को अक्सर सिर्फ़ नियमित आय का साधन मान लिया जाता है. लेकिन लगातार डिविडेंड देने का रिकॉर्ड मज़बूत कैश फ़्लो, अनुशासित मैनेजमेंट और टिकाऊ बिज़नेस का संकेत होता है. इससे भी अहम बात यह है कि डिविडेंड देने वाली कंपनियां बाज़ार गिरने पर निवेशकों को शांत और निवेशित बने रहने में मदद कर सकती हैं.
किसी भी भारतीय रिटेल निवेशक से पूछिए कि डिविडेंड किस काम के होते हैं, तो जवाब लगभग तय होगा. ये रिटायर लोगों के लिए होते हैं, सतर्क निवेशकों के लिए होते हैं और उनके लिए होते हैं जिन्होंने ग्रोथ की उम्मीद छोड़ दी है.
ऐसे बाज़ार में जहां स्मॉल कैप शेयर एक साल में दोगुने हो सकते हैं और IPO पहले दिन 50 प्रतिशत रिटर्न दे सकते हैं, वहां 2 या 3 प्रतिशत की डिविडेंड यील्ड लगभग मामूली लगती है. वर्षों में मैंने यह बातचीत कई बार की है और तर्क हमेशा एक जैसा रहा है. जब मैं वेल्थ बनाना चाहता हूं तो डिविडेंड की परवाह क्यों करूं?
यही भारतीय निवेश की बड़ी ग़लतफहमी है. लोग यह नहीं समझते कि डिविडेंड आपको क्या देते हैं और डिविडेंड आपको क्या बताते हैं, इन दोनों में फ़र्क़ है.
ज़रा सोचिए कि किसी कंपनी का कई सालों तक लगातार और बढ़ता हुआ डिविडेंड देना क्या मतलब रखता है. इसका मतलब है कि बिज़नेस असली नक़दी कमा रहा है, सिर्फ़ कागज़ी मुनाफ़ा नहीं. इसका मतलब यह भी है कि मैनेजमेंट इतना अनुशासित है कि वह उस नक़दी को जमा करके साम्राज्य बनाने या संदिग्ध कैपेक्स पर ख़र्च करने की बजाय शेयरहोल्डरों के साथ साझा कर रहा है. इसका मतलब यह भी है कि कंपनी ऐसे माहौल में काम कर रही है जहां वह बिना नक़दी संकट की चिंता के नियमित भुगतान का वादा कर सकती है. इसलिए लगातार डिविडेंड देने का रिकॉर्ड बिज़नेस क्वालिटी को पहचानने का एक सीधा तरीक़ा है. निवेशक जटिल रेशियो में उलझे रहते हैं, जबकि डिविडेंड का स्थिर और बढ़ोतरी का इतिहास कहीं ज़्यादा साफ़ संकेत दे सकता है.
मैं हमेशा भविष्य के मुनाफ़े की बजाय मौजूदा, असली मुनाफ़े पर भरोसा करता रहा हूं. इस नज़रिये से देखें तो डिविडेंड बहुत स्पष्ट प्रमाण हैं कि कमाई असली है. दर्ज किए गए मुनाफ़े को अलग-अलग तरीके़ से पेश किया जा सकता है. एडजस्टेड EBITDA को भी अलग अंदाज़ में दिखाया जा सकता है. लेकिन अगर कैश है ही नहीं, तो लंबे समय तक भुगतान संभव नहीं है. आज के दौर में कहानियां अक्सर बुनियादी तथ्यों से आगे निकल जाती हैं. ऐसे में डिविडेंड एक ठोस आधार देते हैं, जो सिर्फ़ खाते में आए पैसों से कहीं ज़्यादा अहम है.
लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि असली असर रिटर्न पर नहीं, बल्कि ख़ासकर बाज़ार गिरने के समय निवेशक के दिमाग़ पर होता है.
हम सभी ने बाज़ार में गिरावट देखी है. कुछ ने कई बार देखी है. और गिरावट का सबसे बड़ा असर सिर्फ़ फ़ाइनेंशियली नहीं बल्कि मानसिक तौर पर भी होता है. जब पोर्टफ़ोलियो 40 या 50 प्रतिशत गिरता है, तो निवेशक और इक्विटी बाज़ार के बीच भरोसे में दरार आ जाती है. घबराहट होती है. पछतावा होता है. रातों की नींद उड़ जाती है. और यह असर क़ीमतें वापस आने के बाद भी लंबे समय तक रहता है.
यही वजह है कि निवेशक सबसे ग़लत समय पर बेच देते हैं. कुछ लोग तो ठीक उस समय इक्विटी से पूरी तरह बाहर निकल जाते हैं और फ़िक्स्ड डिपॉज़िट या सोने की ओर लौट जाते हैं, जब बाज़ार अच्छे मौके़ दे रहा होता है. अस्थायी दर्द स्थायी संपत्ति नुक़सान में बदल जाता है.
ऐसा पोर्टफ़ोलियो जो कम गिरता है, वह सिर्फ़ पूंजी नहीं बचाता बल्कि वह निवेशक की निवेशित रहने की इच्छा को भी बचाता है. लंबे समय में यही धैर्य, या गिरावट के दौरान शांत रहने की क्षमता, निवेश के नतीजों का सबसे बड़ा कारण बन सकती है. दुनिया की सबसे अच्छी स्ट्रैटेजी भी बेकार है अगर आप उस पर टिक न सकें. और जिस स्ट्रैटेजी से हर कुछ साल में डर लगे, उस पर टिके रहना मुश्किल होता है.
इसीलिए डिविडेंड और गिरावट में स्थिरता के बीच संबंध अहम है. यह सिर्फ़ रिटर्न बढ़ाने का अभ्यास नहीं है. यह ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाने की बात है जिसके साथ आप पूरे मार्केट साइकिल में रह सकें. लंबे समय तक वही निवेशक वेल्थ बनाते हैं, जो खेल में बने रहते हैं.
इस महीने की हमारी कवर स्टोरी इसी संबंध को विस्तार से समझाती है. इसमें बताया गया है कि डिविडेंड कॉर्पोरेट सेहत का संकेत कैसे देते हैं, किस तरह की डिविडेंड देने वाली कंपनियों ने ऐतिहासिक रूप से गिरावट में पोर्टफ़ोलियो को संभाला है और किन बिज़नेस में ये ख़ूबी एक साथ मिलती हैं. यह पोर्टफ़ोलियो को मज़बूत बनाने का एक व्यावहारिक तरीक़ा है और ऐसे समय में आया है जब हाल की गिरावट की याद अभी ताज़ा है.
जो लोग डिविडेंड को नए नज़रिये से देखने को तैयार हैं, उनके लिए उस साधारण दिखने वाले 1-2 प्रतिशत यील्ड के पीछे निवेश का एक मज़बूत आइडिया छिपा है.
