Anand Kumar
सारांशः मार्केट में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय निवेशक SIP जारी रखे हुए हैं, जो अनुशासित और आदत पर आधारित निवेश की तरफ़ एक ज़बरदस्त बदलाव का संकेत है. असली विजेता वो नहीं हैं जो मार्केट का अनुमान लगाते हैं, बल्कि वो हैं जो लगातार इस फ़्लो का फ़ायदा उठाने की स्थिति में हैं.
जो शख़्स हर सुबह यह तय करता है कि दौड़ने जाना है या नहीं, वो एक्सरसाइज़ करने वाला है. जो आधी नींद में भी जूते पहनकर निकल पड़ता है, वो रनर है. यह फ़र्क़ मामूली लगता है जब तक बारिश न आए, या थकान न हो या कोई भी वाजिब बहाना सामने न आए. एक्सरसाइज़ करने वाला तकलीफ़ को तौलता है और बिस्तर में रह जाता है. रनर बिना सोचे निकल जाता है.
यही फ़र्क़ अब भारत के फ़ाइनेंशियल मार्केट पर लागू होता है. जब यह लिख रहा हूं, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव और होर्मुज़ स्ट्रेट के ज़रिए एनर्जी सप्लाई में बाधा की वजह से, सेंसेक्स फ़रवरी के आख़िर के 83,000 के स्तर से गिरकर क़रीब 74,200 पर आ गया है, यानी सिर्फ़ एक महीने में क़रीब 11% की गिरावट. हेडलाइन गंभीर हैं. पोर्टफ़ोलियो की स्थिति और ख़राब है. यही वो माहौल है जिसने रिटेल निवेशकों को बाहर निकलने पर मजबूर किया है.
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लेकिन वो निकले नहीं. सितंबर 2024 में मंथली SIP इनफ़्लो ₹24,509 करोड़ था, जो उस वक़्त का रिकॉर्ड था. जनवरी 2026 तक, जब मार्केट अपने शिख़र से काफ़ी नीचे था, यह आंकड़ा ₹31,002 करोड़ पर पहुंच गया. फ़रवरी 2026 में, जब मार्केट रोज़ फिसल रहा था और तेल $119 प्रति बैरल पर था, SIP कंट्रीब्यूशन ₹29,845 करोड़ आया, जो पिछले साल फ़रवरी से 15% ज़्यादा (AMFI डेटा, 10 मार्च 2026) था. SIP कंट्रीब्यूट करने वाले अकाउंट की संख्या 9.44 करोड़ थी, एक साल पहले के 8.26 करोड़ से ज़्यादा. कुल SIP अकाउंट 10.45 करोड़ पार कर गए. जनवरी से महीने-दर-महीने हल्की गिरावट आंशिक रूप से इसलिए है क्योंकि फ़रवरी छोटा महीना है और महीने के अंत की किश्तें मार्च में गई हैं.
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मैंने निवेशकों से कहते हुए तीन दशक बिताए हैं कि शोर को नज़रअंदाज़ करें, निवेश ऑटोमेट करें और प्रोसेस पर भरोसा रखें. मन के किसी कोने में हमेशा यह सवाल था कि जब परीक्षा आएगी तो कितने लोग सच में टिकेंगे. 2008 का क्रैश तेज़ था लेकिन रिकवरी इतनी जल्दी आई कि तकलीफ़ लंबी नहीं खिंची. यह गिरावट अलग है. यह लंबी खिंची है, जियोपॉलिटिकल पृष्ठभूमि सच में डरावनी है और नुक़सान मार्केट के हर हिस्से में फैला है. फिर भी SIP डेटा कहता है कि बहुत बड़ी संख्या में बिना इसे परीक्षा माने निवेशकों ने यह परीक्षा दी है. वो बस चलते रहे. यही आदत दिखती है.
इसका निवेश का महत्व तो समझा जाता है. जो कम चर्चा होती है वो यह है कि निवेश की चेन बनाने वाले बिज़नेस के लिए इसका क्या मतलब है. जब फ़ाइनेंशियल व्यवहार आदत बन जाता है तो यह हर उस कंपनी की इकोनॉमिक्स बदल देता है जिससे पैसा गुज़रता है: रजिस्ट्रार जो हर ट्रांज़ैक्शन प्रोसेस करते हैं, डिपॉज़िटरी जो यूनिट रखती हैं, एक्सचेंज और प्लेटफ़ॉर्म जिनके ज़रिए ऑर्डर रूट होते हैं और एसेट मैनेजर जो बढ़ते बेस पर फ़ीस लेते हैं. ये बिज़नेस तब नहीं बढ़ते जब निवेशक अच्छे फ़ैसले लेते हैं. ये बढ़ते हैं जब निवेशक भागीदारी जारी रखते हैं. फ़ाइनेंशियल फ़ैसले लेने वालों का भारत एक अनुमान न लगाए जा सकने वाला मार्केट है. फ़ाइनेंशियल आदत बनाने वालों का भारत रेकरिंग रेवेन्यू के क़रीब है.
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मुझे अनिश्चितता के बारे में ईमानदार रहना चाहिए. SIP की आदत गहरे या लंबे क्रैश में बचेगी या नहीं, यह अभी पता नहीं है. मौजूदा गिरावट, जितनी तेज़ लग रही है, 2008 नहीं है. अगर मार्केट 50% गिरे और दो साल तक नीचे रहे तो इन 9.44 करोड़ अकाउंट में से कुछ चुप हो सकते हैं. तनाव में आदतें टूटती हैं. पहली बार निवेश करने वाले भारतीयों की एक पीढ़ी ने कभी इस तरह की लंबी तबाही का सामना नहीं किया है और हम नहीं जानते वो कैसे रिएक्ट करेंगे. मुझे लगता है SIP की ऑटोमेटेड प्रकृति उन्हें डिस्क्रेशनरी निवेश से ज़्यादा मज़बूत बनाती है, लेकिन यह एक विश्वास है, प्रमाण नहीं.
जो प्रमाण है वो सवाल इस अंक की कवर स्टोरी उठाती है: इस बदलाव से कौन, कितना और कितने वक़्त तक फ़ायदा उठाता है. हर फ़ाइनेंशियल कंपनी को बढ़ती भागीदारी से बराबर फ़ायदा नहीं होता. कुछ उन चोकपॉइंट पर बैठी हैं जहां से हर रुपया गुज़रना ही पड़ता है, चाहे निवेशक का ध्यान किसी पर भी हो. दूसरे उभरती लहर पर सवार मज़बूत बिज़नेस हैं, लेकिन लहर उनकी जगह पक्की नहीं करती. कवर स्टोरी बिल्कुल यही नक़्शा खींचती है कि कौन से बिज़नेस इन चोकपॉइंट पर हैं और कौन से बस धारा के साथ बह रहे हैं. चलिए, वहीं से शुरू करते हैं.
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