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सारांशः अगर आप प्रीमियम पर विदेशी ETF ख़रीदते हैं और प्रीमियम बना रहता है तो आपका रिटर्न इंडेक्स से मेल खाता है. यह ठीक लगता है, जब तक आप यह न देखें कि वहां पहुंचने के लिए आपने कितना ज़्यादा क़ीमत चुकाई. अगर प्रीमियम घटा, जो आख़िरकार होता ही है, तो इंडेक्स बढ़ने पर भी आप नुक़सान में हो सकते हैं. यहां बताते हैं क्यों.
अगर आपका पोर्टफ़ोलियो अच्छा-ख़ासा बड़ा हो चुका है तो अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र जोड़ना अगला समझदारी का क़दम लगता है. जब विदेशी बाज़ार भारत से बेहतर करें तो उस बढ़त में हिस्सेदारी मिले.
पहली नज़र में यह तर्क सही लगता है.
लेकिन जब विदेशी ETF को गहराई से देखते हैं तो एक अहम बात सामने आती है.
आप सिर्फ़ ग्लोबल मार्केट में निवेश नहीं कर रहे, बल्कि वही चीज़ थोड़ा महंगा दाम देकर ख़रीद रहे हैं. इससे ही तय होता है कि उस बेहतर परफ़ॉर्मेंस में से आपके हाथ कितना आएगा.
इसीलिए हमने आंकड़ों पर ग़ौर किया है.
चलिए, पहले यह समझते हैं कि ये ETF अपनी असली वैल्यू से ऊपर क्यों ट्रेड करते हैं.
प्रीमियम की कहानी
SEBI ने भारतीय म्यूचुअल फ़ंड द्वारा विदेशी ETF में निवेश की कुल सीमा 1 अरब डॉलर तय की है. यह लिमिट ख़त्म हो चुकी है. अप्रैल 2024 से फ़ंड हाउस अपने विदेशी ETF की नई यूनिट नहीं बना सकते. असल में सप्लाई तय है जबकि मांग बढ़ती जा रही है. नतीजा यह है कि मार्केट प्राइस NAV से ऊपर चला जाता है (NAV यानी अंडरलाइंग एसेट की असली प्रति-यूनिट वैल्यू) और वहीं बना रहता है. आप जो चुकाते हैं और जो आप असल में ख़रीदते हैं, उनके बीच का फ़र्क़ ही प्रीमियम है.
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स्कीम
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मौजूदा प्रीमियम (%) | पिछले 1 साल में NAV से ऊपर रहे दिन (%) |
|---|---|---|
| Nippon India ETF Hang Seng BeES | 3.6 | 97.9 |
| Motilal Oswal NASDAQ 100 ETF | 9.7 | 84.3 |
| Mirae Asset NYSE FANG+ ETF | 27.7 | 100 |
| Mirae Asset S&P 500 Top 50 ETF | 20.9 | 100 |
| Mirae Asset Hang Seng TECH ETF | 16.3 | 100 |
| Motilal Oswal Nasdaq Q50 ETF | 15.3 | 97.6 |
| प्रीमियम 30 मार्च 2026 तक. 'NAV से ऊपर रहे दिन' पिछले एक साल में उन ट्रेडिंग दिनों का प्रतिशत दिखाता है जब ETF की मार्केट प्राइस NAV से ज़्यादा थी. स्रोत: वैल्यू रिसर्च. | ||
Mirae Asset NYSE FANG+ ETF का प्रीमियम 27.7% पर है. साथ ही लिस्ट के तीन फ़ंड पिछले पूरे साल NAV से ऊपर रहे. यह आपको क्या लागत देता है, इसे दो सिनेरियो में देखते हैं.
एक पहलू: प्रीमियम बना रहे
आप 20% प्रीमियम पर ₹1 लाख निवेश करते हैं. अंडरलाइंग एसेट की वैल्यू ₹83,333 है, ₹80,000 नहीं. इंडेक्स 10% बढ़ता है. NAV ₹91,667 हो जाती है. प्रीमियम बना रहता है. आपकी मार्केट प्राइस ₹1,00,000 से ₹1,10,000 हो जाती है. इसलिए आपका रिटर्न 10% है और इंडेक्स से मेल खाता है.
यह ठीक लगता है. लेकिन आपने ₹83,333 के एसेट के लिए ₹1 लाख चुकाए. वो ₹16,667 कोई फ़ीस नहीं जो वापस मिले. यह वो दौलत है जो हमेशा के लिए उस शख़्स के पास चली गई जिसने आपको यूनिट बेचीं, क्योंकि वो प्रीमियम उनकी जेब में गया. प्रतिशत रिटर्न इंडेक्स से मेल खाता है, लेकिन आपने वहां पहुंचने के लिए ज़्यादा पैसा लगाया. वक़्त के साथ जैसे-जैसे प्रीमियम बना रहता है, यह ज़्यादा भुगतान कंपाउंड होता जाता है.
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दूसरा पहलू: प्रीमियम घटे
आप फिर ₹1 लाख में 20% प्रीमियम पर ₹83,333 NAV के साथ निवेश करते हैं. अब इंडेक्स 10% बढ़ता है और एग्ज़िट NAV ₹91,667 है. लेकिन प्रीमियम 20% से घटकर 10% हो गया. आपके लिए मार्केट प्राइस पहले के ₹1.1 लाख की जगह ₹1,00,833 रह जाती है. इसलिए आप इंडेक्स के 10% रिटर्न से पीछे रहकर सिर्फ़ 0.8% कमाते हैं.
अगर प्रीमियम शून्य हो जाए तो आपकी मार्केट प्राइस NAV के बराबर ₹91,667 हो जाती है. इसलिए आपका रिटर्न -8.3% होगा. इंडेक्स 10% बढ़ने के बावजूद यह काफ़ी बुरी ख़बर है.
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एग्ज़िट प्रीमियम
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एग्ज़िट पर मार्केट प्राइस | आपका रिटर्न (%) | इंडेक्स रिटर्न (%) | मतलब |
|---|---|---|---|---|
| 20% (अपरिवर्तित) | ₹ 1,10,000 | 10 | 10 | इंडेक्स से मेल, लेकिन आपने ज़्यादा चुकाया |
| 15% | ₹ 1,05,417 | 5.4 | 10 | फ़र्क़ दिखने लगा |
| 10% | ₹ 1,00,833 | 0.8 | 10 | बढ़ते बाज़ार में न के बराबर फ़ायदा |
| 5% | ₹ 96,250 | -3.7 | 10 | इंडेक्स बढ़ रहा है, आप नुक़सान में |
| 0% (पूरी तरह ख़त्म) | ₹ 91,667 | -8.3 | 10 | इंडेक्स 10% ऊपर, आप 8% नीचे |
| मान्यताएं: ₹1,00,000 का निवेश 20% एंट्री प्रीमियम पर. एंट्री पर NAV: ₹83,333. इंडेक्स रिटर्न: 10%. एग्ज़िट पर NAV: ₹91,667. एग्ज़िट मार्केट प्राइस = NAV × (1 + एग्ज़िट प्रीमियम). स्रोत: वैल्यू रिसर्च कैलकुलेशन. | ||||
बढ़ता इंडेक्स काफ़ी नहीं है. आपका रिटर्न इस बात पर निर्भर करता है कि जो क़ीमत आपने चुकाई और जो वैल्यू आपके पास है, उनके बीच का फ़र्क़ क्या होता है. अगर वो फ़र्क़ घटता है तो आपके रिटर्न को चोट लगती है, चाहे इंडेक्स कितना भी क्यों न बढ़े.
क्या प्रीमियम घटेगा?
अभी ग्लोबल ETF में निवेश की एक क़ीमत प्रीमियम है. यूनिट बनाना बंद है, मांग कम नहीं हुई और मार्केट प्राइस व NAV के बीच का फ़र्क़ आकस्मिक नहीं, स्ट्रक्चरल है. थोड़ा प्रीमियम स्वीकार करना ग्लोबल डाइवर्सिफ़िकेशन के लिए एक वाजिब समझौता है. बड़ा प्रीमियम स्वीकार करना बिल्कुल अलग मामला है.
यहां वजह है. अगर आप 3% प्रीमियम पर ख़रीदते हैं और यह पूरी तरह शून्य हो जाता है तो 12% रिटर्न कमाने के लिए इंडेक्स को 15.4% देना होगा, यानी 3.4% प्वाइंट का फ़र्क़. असहज, लेकिन झेला जा सकता है. अगर आप 20% प्रीमियम पर ख़रीदते हैं और यह आधा भी घटकर 10% हो जाता है तो वही 12% रिटर्न कमाने के लिए इंडेक्स को 22.2% देना होगा. अगर यह पूरी तरह शून्य हो जाए तो इंडेक्स को 34.4% देना होगा.
और यहीं असली जोख़िम है. NASDAQ और S&P 500 के अच्छे साल रहे हैं, लेकिन 22%, 34% रिटर्न कोई पक्की बात नहीं. आप सिर्फ़ इंडेक्स पर दांव नहीं लगा रहे. आप इस बात पर दांव लगा रहे हैं कि इंडेक्स ख़ासतौर पर उतना ज़्यादा रिटर्न देगा जो आपके एंट्री पर चुकाए प्रीमियम की भरपाई कर सके. यह एक बहुत मुश्क़िल दांव है. आप एंट्री पर जितना ज़्यादा प्रीमियम स्वीकार करते हैं, उतना ज़्यादा आप इंडेक्स के असाधारण रिटर्न देने पर निर्भर हो जाते हैं.
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