
सारांशः जब निवेशकों को एक साथ बड़ी रक़म मिलती है, तो उसे SIP के ज़रिये कितने समय में निवेश किया जाए-ये एक अहम सवाल बन जाता है. यह लेख बाज़ार टाइमिंग के जोखिम को कम करने और इक्विटी में पर्याप्त समय तक निवेशित रहने के बीच के संतुलन को समझाता है.
यह सवाल कई म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों को परेशान करता है, ख़ासकर तब जब वे सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी SIP के विचार को समझ लेते हैं: अगर एकमुश्त पैसा निवेश करना हो, तो उसे कितने समय में SIP के ज़रिये फैलाया जाए?
बेशक, ज़्यादातर SIP निवेशों में यह सवाल उठता ही नहीं. SIP का सबसे सामान्य रूप वह है जिसमें हर महीने मिलने वाली आय से मासिक निवेश किया जाता है. इस तरह की SIP लगातार चलती रहती है और इसका मक़सद बस इतना होता है कि बिना अलग से समय निकाले नियमित निवेश होता रहे.
हालांकि, कभी-कभी SIP निवेशक को एक ही बार में बड़ी रक़म मिल जाती है. यह कार्यस्थल से मिला बोनस हो सकता है (हालांकि आजकल यह कम देखने को मिलता है), या फिर किसी एसेट जैसे रियल एस्टेट की बिक्री से मिली रकंम हो सकती है. यह वो पैसा भी हो सकता है जो रिटायरमेंट के समय एक साथ मिलता है और जिसे जीवन के बाक़ी वर्षों के लिए फैलाकर इस्तेमाल करना होता है.
हर बचतकर्ता को यह समझना चाहिए कि इक्विटी आधारित म्यूचुअल फ़ंड में निवेश लंबे समय-जैसे पांच से सात साल या उससे अधिक-में अच्छे रिटर्न पाने का एक प्रभावी तरीक़ा है. लेकिन कम समय के दौरान इक्विटी फ़ंड जोखिम भरे हो सकते हैं. और जब बड़ी रक़म एक ही बार में निवेश की जाती है, तो यह जोखिम और भी स्पष्ट हो जाता है. अगर बाज़ार अचानक गिरावट की ओर मुड़ जाए, तो निवेश की गई राशि का 10, 20 या उससे भी ज़्यादा प्रतिशत बहुत कम समय में घट सकता है.
अप्रैल 1979 में सेंसेक्स की शुरुआत से अब तक लगभग 13,900 ऐसे छह महीने के दौर रहे हैं जिन्हें देखा जा सकता है. इनमें से लगभग 2,269 दौर ऐसे थे जिनमें 20 प्रतिशत से भी ज़्यादा गिरावट आई. अगर किसी ने ऐसे ही समय की शुरुआत में बड़ी रक़म निवेश कर दी हो, तो पूंजी का बड़ा हिस्सा घट सकता है, उससे पहले कि निवेश बढ़ना शुरू करे. सिद्धांत रूप से बाज़ार बाद में संभल सकता है. लेकिन व्यवहार में कई निवेशक घबरा कर पैसा निकाल लेते हैं और अस्थायी गिरावट स्थायी नुक़सान में बदल जाती है.
इस समस्या का समाधान SIP है. जब निवेश को तय समय तक हर महीने की किस्तों में किया जाता है, तो ख़रीद की औसत क़ीमत बन जाती है. इससे यह जोखिम कम होता है कि पूरी रकम ठीक गिरावट से पहले निवेश हो जाए. साथ ही बाज़ार गिरने पर ज़्यादा यूनिट ख़रीदने और बाज़ार बढ़ने पर कम यूनिट लेने का फ़ायदा मिलता है-जो SIP निवेश की मूल ताक़त है.
यह बात अब काफ़ी लोगों को समझ में आ चुकी है. असली मुश्किल यह तय करने में होती है कि वह ‘तय अवधि’ कितनी होनी चाहिए. क्या SIP छह महीने चले, एक साल, दो साल या उससे भी ज़्यादा?
कुछ समय पहले वैल्यू रिसर्च ने ऐतिहासिक SIP रिटर्न पर एक स्टडी की थी और पाया कि लगभग चार साल बाद SIP निवेश काफ़ी स्थिर हो जाते हैं. औसतन, जब निवेश चार साल या उससे ज़्यादा समय तक जारी रहा, तो नुक़सान की संभावना बेहद कम हो गई.
दिलचस्प बात यह है कि कम अवधि में नुक़सान का जोखिम भी ज़्यादा होता है और असाधारण मुनाफ़े की संभावना भी. लंबी अवधि में ऊंचाई और गिरावट अक्सर औसत हो जाती है और सबसे अच्छे और सबसे ख़राब परिणामों के बीच का अंतर काफ़ी कम हो जाता है.
इसे उन फ़ंडों के उदाहरण से समझा जा सकता है जिनका इतिहास कई दशकों का है. सभी संभावित एक-साल की अवधियों में अधिकतम सालाना रिटर्न लगभग 160 प्रतिशत तक देखा गया, जबकि सबसे ख़राब परिणाम -57 प्रतिशत रहा. दो साल की अवधि में यह दायरा लगभग 82 प्रतिशत और -34 प्रतिशत तक सिमट गया. तीन साल में यह लगभग 63 प्रतिशत और -18 प्रतिशत रह गया. पांच साल में यह और काफ़ी कम होकर लगभग 54 प्रतिशत ऊपर और करीब 4 प्रतिशत नीचे तक रह गया-यानि लंबे समय में नुक़सान लगभग ख़त्म हो जाता है. 10 साल में यह दायरा और भी छोटा होकर लगभग 30 प्रतिशत से 13 प्रतिशत सालाना के बीच रह गया.
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इससे एक साफ़ समझ बनती है: कम अवधि में ज़्यादा मुनाफ़े की संभावना होती है, लेकिन जोखिम भी उतना ही बड़ा होता है.
इन आंकड़ों से एक सीधा निष्कर्ष यह निकल सकता है कि SIP आदर्श रूप से तीन साल से ज़्यादा समय तक चलनी चाहिए. अगर लक्ष्य नुक़सान की संभावना को लगभग समाप्त करना है, तो यह काफ़ी व्यावहारिक जवाब है.
लेकिन जीवन की कई असल परिस्थितियों में इतनी लंबी अवधि व्यावहारिक नहीं होती. मान लीजिए किसी को हर साल कंपनी से बोनस मिलता है. उस रकम को तीन या चार साल में फैलाना समझदारी नहीं होगी, क्योंकि अगला बोनस आने तक पिछली रक़म का निवेश ही पूरा नहीं होगा.
दूसरी ओर, अगर किसी को पुश्तैनी संपत्ति बेचने से बड़ी रक़म मिली हो और वही धन बुज़ुर्गावस्था की आर्थिक सुरक्षा का आधार बनना हो, तो स्थिति अलग हो जाती है. ऐसे मामलों में पूंजी की सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण होती है. यहां कुछ संभावित मुनाफ़ा छोड़कर शुरुआती बड़े नुक़सान के जोखिम को कम करना बेहतर हो सकता है.
एक सरल नियम यह हो सकता है कि जिस अवधि में पैसा कमाया गया है, उसके लगभग आधे समय में उसे निवेश किया जाए-लेकिन अधिकतम अवधि लगभग चार से पांच साल तक ही हो. इस तर्क से देखा जाए तो सालाना बोनस को लगभग छह महीने में निवेश किया जा सकता है, जबकि दशकों में जमा हुई रक़म-जैसे पुश्तैनी संपत्ति की बिक्री से मिली राशि-को कई वर्षों में धीरे-धीरे निवेश किया जा सकता है.
असल में यह जीवन में उस पैसे की अहमियत के हिसाब से निवेश के जोखिम को संतुलित करने का एक तरीका है.
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