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गलतफ़हमी की 'क़ीमत'

NAV को प्राइस या दाम समझ लेना निवेश की कई ग़लतियों में से है

गलतफ़हमी की ‘क़ीमत’Anand Kumar

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पिछले तीन दशकों से मैं म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों से मिल रहा हूं. इस दौरान मैंने म्यूचुअल फ़ंड्स को लेकर कई चौंकाने वाली ग़लतफ़हमियां देखी हैं. बदक़िस्मती से, म्यूचुअल फ़ंड की बुनियादी बातों में शामिल NAV और डिविडेंड को लेकर लोगों में सबसे ज़्यादा ग़लतफ़हमी होती है. हाल ही में SEBI ने डिविडेंड शब्द को पूरी तरह से ख़त्म करने की शुरुआत की, और म्यूचुअल फ़ंड डिविडेंड को 'इनकम डिस्ट्रीब्यूशन कम कैपिटल विथड्रॉल' (income distribution cum capital withdrawal) नाम दिया. ये बात सही है कि ये बहुत बड़ा नाम है और इसीलिए इसे IDCW ही बुलाया जाएगा. मगर ये सटीक है, फिर चाहे इसकी आदत पड़ने में कुछ वक़्त लगे.

हालांकि, NAV एक अलग क़िस्म की और कहीं बड़ी मुश्किल है. कुछ दिन पहले, मैंने इस टर्म को ग़लत समझने की एक गज़ब मिसाल देखी. मेरे एक जानकार, अपने म्यूचुअल फ़ंड निवेश पर कुछ सलाह चाहते थे. मगर वो अपनी रिसर्च ख़ुद करना चाहते थे. उनके पास, इक्विटी मिड-कैप का एक फ़ंड था, जो कुछ ठीक नहीं था, तो मैंने उन्हें वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन पर ख़ुद रिसर्च कर के एक बेहतर विकल्प तलाशने की सलाह दी. क़रीब एक हफ़्ते बाद, वो वापस आए और उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि उनके मिड-कैप इक्विटी फ़ंड का सबसे क़रीबी विकल्प एक लिक्विड फ़ंड है. जब पूछा गया कैसे, तो उन्होंने बताया कि इन दोनों फ़ंड्स का NAV लगभग एक जैसा है!

उनके मिड-कैप फ़ंड का NAV ₹37 था, तो उन्होंने एक ऐसा फ़ंड तलाशा जिसका NAV ₹33 था. हममें से जो लोग म्यूचुअल फ़ंड के बारे में जानते हैं, उनके लिए ये एक चकरा देने वाली बात होगी, मगर उन्हें ये बिल्कुल स्वाभाविक सी बात लगी. देखिए, मैं उन सज्जन को दोष नहीं दे रहा और न ही किसी भी तरह से उनका मज़ाक उड़ा रहा हूं. वो एक बेहद सफल बिज़नसमैन हैं जिन्होंने ख़ुद अपने बूते पर पूरा बिज़नस खड़ा किया है और महज़ 15-20 साल में अच्छी-खासी सफलता पाई है. एक बिज़नस करने वाले के तौर पर पैसों को लेकर उनकी समझ बहुत अच्छी है.

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असल में, म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री, सेल्समैन और हम एक्सपर्ट जिस अंदाज़ में NAV की बात करते हैं, मैं उसे इस ग़लती के लिए ज़िम्मेदार समझता हूं. क्योंकि अक्सर हम फ़ंड की यूनिट 'ख़रीदने' के लिए आप जो पैसे देते हैं उसे फ़ंड के 'प्राइस' या दाम के तौर पेश करते हैं. अब अगर, आप एक कार ख़रीदने वाले हैं जिसका दाम ₹5 लाख है और आपसे उसका विकल्प तलाशने के लिए कहा जाता, तो आप उन्हीं कारों को तो देखेंगे जिनका दाम क़रीब ₹5 लाख होगा. NAV को जब अक्सर फ़ंड का प्राइस या दाम कहा जाता है, तो लोग उसके बारे में भी इसी तरीक़े से सोचते हैं कि म्यूचुअल फ़ंड में भी इसका यही मतलब होगा. इसलिए ये नए निवेशकों का दोष नहीं क्योंकि वो तो अनजाने में NAV को दाम या प्राइस समझ बैठते हैं.

ये भी सच है कि ऐसा समझने वालों में मेरा दोस्त अकेला नहीं है. अगर एक व्यक्ति ने ऐसा सोचा है, तो और भी बहुत से लोग इसी तरह सोचते होंगे. नोट करें कि जिस तरह से रेग्युलेटर ने डिविडेंड को लेकर फ़ैसला लिया है, इस मामले में वो कुछ नहीं कर सकते. 'डिविडेंड' शब्द तकनीकी तौर पर सही नहीं था पर NAV के लिए 'नेट एसेट वैल्यू' सही बैठता है. ये तो हमारे बात करने का तरीक़ा है जिसमें हम इसे प्राइस या दाम के तौर पर ज़ाहिर करते हैं. और इसीलिए ये शब्द आभास कराता है कि अगर NAV कम है तो अच्छी बात है क्योंकि फ़ंड सस्ता होगा. संभव है - और काफ़ी हद तक - कि कोई सेल्समैन आपको फ़ंड बेचने के लिए कह रहा हो कि आप वो फ़ंड ख़रीदें क्योंकि इसका NAV कम है.

ये बात ग़लत है कि आप किसी फ़ंड में निवेश का फ़ैसला इस आधार पर करें कि - NAV ज़्यादा है या कम है, क्योंकि ये मायने नहीं रखता. ये ख़याल ही ग़लत है कि NAV का कम या ज़्यादा होना कोई मायने रखता है और इसके आधार पर किसी फंड में निवेश का फ़ैसला लिया जाए. असल में, ये आइडिया इतना ग़लत है कि आप किसी फ़ंड सेल्समैन या 'एडवाइज़र' के आपको बरगलाने का पता लगाना चाहते हैं तो इसे याद रख सकते हैं: जो भी आपको कोई फ़ंड इसलिए चुनने के लिए कहता है क्योंकि उस फ़ंड का NAV कम है, वो आपको बरगला रहा है, धोखा दे रहा है. इस नियम का कोई अपवाद नहीं है.

NAV का सिर्फ़ एक ही मक़सद है कि इससे उसी फ़ंड के NAV की, अपने पिछले NAV के प्रदर्शन से तुलना की जा सके, निवेशकों के लिए इसका और कोई औचित्य नहीं है.

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