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पुरानी कशमकश: स्टॉक या म्यूचुअल फ़ंड?

निवेश की शुरुआत के लिए, स्टॉक सही हैं या म्यूचुअल फ़ंड? अगर ठीक से समझा जाए तो जवाब साफ़ है.

the-old-dilemma-stocks-or-mutual-fundsAnand Kumar

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7:10

हाल ही में मुझे एहसास हुआ है कि कुछ लोग समझते हैं कि मैं अलग-अलग निवेश के तरीक़ों को समान अवसर वाला मानता हूं. तो, मुझे इन्हें 'समान अवसर' कहने के बजाए, 'सबका साथ, सबका विकास' कहना चाहिए. वैसे बात एक ही है. फ़िनफ़्लुएंसरों के इस दौर में, अगर लोगों का ध्यान खींचना है, तो आपको किसी न किसी चीज़ के ख़िलाफ़ होना ही होगा. हर चीज़ का एक नकारात्मक पक्ष होता है, और अपने आस-पास भीड़ जमा करने का ये अचूक तरीक़ा है कि आप कहें, मैं फ़लां-फ़लां निवेश से सारे पैसे गंवाने से आपको बचाउंगा—क्योंकि इन-इन कारणों से वो ख़राब हैं, इसीलिए मेरा बताया रास्ता चुनिए, जिसे मैं प्रमोट करने यहां आया हूं.

समझने की बात है कि ऐसे बहुत ही कम निवेश हैं, जो हर तरह से तबाही लाने वाले हों. सिवाए डिरेवेटिव, टर्म-इंश्योरेंस के अलावा दूसरे क़िस्म के इंश्योरेंस और फ़्रॉड 'एसेट' उर्फ़ क्रिप्टो. इनके सिवा निवेश के हर तरीक़े का किसी न किसी निवेशक के लिए, किसी न किसी परिस्थिति और अनुपात में कुछ न कुछ फ़ायदा ज़रूर है. इनमें सफलता पाने का राज़ है ज़रूरत के मुताबिक़ सही निवेश का चुनाव करना.

मैंने हमेशा ही लंबे समय के निवेश के बड़े हिस्से को इक्विटी में रखने तरफ़दारी की है. हालांकि, चुनौती इस बात की होती है कि ऐसा करने का सबसे सही तरीक़ा क्या हो. नए निवेशकों के लिए ये समझना आसान नहीं होता कि शुरुआत कैसे की जाए. ये जग-ज़ाहिर है कि इक्विटी में निवेश के दो बड़े तरीक़े हैं. एक तरीक़ा है कि आप अपने स्टॉक ख़ुद चुनें और ट्रेड करें, और दूसरा है, इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स के ज़रिए निवेश किया जाए. जहां दोनों ही तरीक़ों का पहला मक़सद, इक्वटी निवेश के हाई रिटर्न पाना है, वहीं बाक़ी की बातें इन दोनों निवेश के तरीक़ों में काफ़ी अलग हैं.

अगर आप अनुभवी और पारंगत निवेशक नहीं हैं या निवेश के काम को काफ़ी समय दे कर, और ध्यान से नहीं कर सकते हैं, तो सीधे इक्विटी निवेश न करना ही बेहतर होगा. वैसे, सभी शुरुआती निवेशकों के लिए इस बात का फ़ैसला करना काफ़ी आसान है: आप म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिए निवेश कीजिए. इसका मतलब ये नहीं कि किसी इंडिविजुअल इन्वेस्टर का सीधे इक्विटी में किया गया निवेश सफल नहीं हो सकता. बिल्कुल हो सकता है, कई निवेशक अपने निवेशों को बहुत अच्छे तरीक़े से मैनेज करते हैं और शानदार नतीजे पाते हैं, और वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र भी इसे लेकर सर्विस देता है ताकि आप अपने इक्विटी निवेश में सफल हो सकें. लेकिन फिर भी, सफलता के लिए अनुभव की और काफ़ी कोशिशों की ज़रूरत होती है, और कुछ लोग जो सफल होते भी हैं, वो कई असलफलताओं के बाद ही सफलता का स्वाद चख पाते हैं. हां, ऐसा करने में हर बार पैसों का नुक़सान शामिल होता है. ज़्यादातर लोग, जिनका मुख्य लक्ष्य अपनी बचत पर सिर्फ़ ऊंचे रिटर्न पाना है, उनके लिए इस तरह से निवेश के एक्सपेरिमेंट में पैसे गंवाना एक बड़ी रुकावट होती है.

इक्विटी में म्यूचुअल फ़ंड्स के ज़रिए निवेश करना कई चुनौतियों का समाधान कर देता है, और कई फ़ायदे दे देता है. इसका बड़ा फ़ायदा, अनुशासन के साथ डाइवर्सिफ़िकेशन का है. दरअसल, फ़ंड मैनेजर उन नियमों के तहत काम करते हैं जिनमें पूरे पोर्टफ़ोलियो का डाइवर्सिफ़िकेशन ज़रूरी होता है. मिसाल के तौर पर, उनके लिए कम से कम 20 स्टॉक में निवेश करना ज़रूरी होता है, जिसमें कुल पोर्टफ़ोलियो की वैल्यू के कुछ प्रतिशत से ज़्यादा निवेश किसी एक ही स्टॉक में नहीं किया जा सकता, ऐसा ही नियम सेक्टर, बिज़नस ग्रुप या कंपनी के साइज़ को लेकर भी होता है. तो कुल मिला कर, इस गाइडलाइन से ये पक्का हो जाता है कि पोर्टफ़ोलियो डाइवर्सिफ़ाइड रहे और किसी एक स्टॉक या सेक्टर में झटका लगने का ज़्यादा बुरा असर न पड़े. अक्सर इस तरह का डाइवर्सिफ़िकेशन अपने-आप करने के लिए ज़्यादातर निवेशकों के पास समझ या अनुशासन की कमी होती है.

इसके साथ ही म्यूचुअल फ़ंड्स में छोटी रक़म से निवेश शुरू करने की सहूलियत होती है जिसे आप अपने मुताबिक़ कभी भी बढ़ा सकते हैं. सीधे स्टॉक ख़रीद कर निवेश करने में डाइवर्सिफ़ाई करने के लिए अच्छा-ख़ासा पैसा लगाने की ज़रूरत होगी, जो आमतौर पर लाखों में हो सकता है. वहीं म्यूचुअल फ़ंड इसे कुछ हज़ार रुपयों में ही करने की सहूलियत देते हैं. अगर आप रेग्युलर और ऑटोमैटिक तरीक़े से निवेश करना चाहते हैं तो SIP से आप एक तय रक़म का निवेश हर महीने कर सकते हैं. अगर टैक्स बचाना चाहते हैं, तो टैक्स-बचाने वाले फ़ंड्स में निवेश करना एक बड़े फ़ायदे का सौदा होता है.

टैक्स की बात चली है, तो इसका एक और फ़ायदा बता दूं कि ये आपके इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड के रिटर्न को बढ़ाता है. क्योंकि कुछ स्टॉक उतने फ़ायदे के नहीं रह जाते इसलिए सभी इक्विटी पोर्टफ़ोलियो में कुछ ख़रीदना-बेचना होता ही है. अगर आप स्टॉक ट्रेडिंग ख़ुद करते हैं, तो इस तरह के लेनदेन का मतलब होगा टैक्स की देनदारी. हालांकि, इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स में ये ट्रेडिंग, फ़ंड के भीतर ही फ़ंड मैनेजर करते हैं. क्योंकि आपने ख़ुद कोई ख़रीदना-बेचना नहीं किया है इसलिए आप पर टैक्स की कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती. टैक्स बचाने को लेकर इसके अलावा एक और फ़ायदा होता है कि आपका पैसा, निवेश में लगा रहता है और लंबे समय के निवेश में यही पैसा कंपाउंड होता है. इसका आपके निवेश पर बहुत अच्छा असर पड़ता है.

शुरुआती निवेशकों के लिए म्यूचुअल फ़ंड को अपने इक्विटी निवेश के लिए चुनने के तर्कों की ये लिस्ट प्रेरणा देने वाली है, है न? हालांकि, मैं आपसे ये नहीं कहूंगा कि आप शेयरों पर कभी नज़र न ही डालें. एक बार, जब आपके पास कुछ अनुभव हो जाए और आप इसके लिए थोड़ा समय निकालने की स्थिति में हों, तब आप इक्विटी निवेश के बारे में ज़रूर सोचें. ये बहुत फ़ायदे की बात हो सकती है, और बहुत से स्मार्ट निवेशक, इक्विटी और म्यूचुअल फ़ंड दोनों को अपने-अपने मक़सद के लिए बढ़िया तरीक़े से इस्तेमाल करते हैं.

ये वीडियो देखें - निवेश की शुरुआत कैसे करें?

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