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नसीम तालेब की निवेश पर राय

निवेश पर तालेब की एक चर्चित बातचीत पर आधारित

निवेश पर तालेब की एक चर्चित बातचीत पर आधारित

नसीम तालेब एक पूर्व ऑप्शन ट्रेडर हैं जिनका काम अनियमितता, संभावना और अनिश्चितता (रैंडमनेस, प्रॉबेबिलिटी और अनसर्टेनिटी) के आस-पास रहा है। वो अपनी 2007 में छपी चर्चित किताब ‘द ब्लैक स्वान’ और दूसरी किताबों जैसे ‘फ़ूल्ड बाए रैंडमनैस’ और ‘एंटी फ़्रेजाइल’ के लिए जाने जाते हैं। इस इन्वेस्टर्स-टॉक में, हम उनकी किताब ‘स्किन इन द गेम’ पर 2018 में हुई गूगल-टॉक पर चर्चा करेंगे ()।

नया हमेशा पुराने से ज़्यादा परिवर्तनशील होगा
तालिब का कहना है कि कोई नई बात जैसे, किसी आइडिया या तकनीक के बदलने की संभावना कहीं ज़्यादा होती है, बजाए उसके जो पुराना है। वो कहते हैं, “आप नए का सटीक अनुमान तो नहीं लगा सकते कि क्या होगा, मगर उसकी कुछ बातों का अनुमान लगाया जा सकता है, जैसे कि कोई नई चीज़ किसी और ज़्यादा नई चीज़ में बदल जाएगी।” उदाहरण के लिए, वनस्पती पर आधारित मीट के उत्पाद में बदलाव देखने की संभावना ज़्यादा है, बजाए किसी आम च्युइंगम के।

सच का आधार तथ्य है या राय
एक प्लंबर के काम का रिव्यू कौन करता है? क्लायंट ही करेगा। मगर, फ़िल्म, रेस्टोरेंट आदि के रिव्यू कौन करता है? कई बार, कोई क्रिटिक या एक्सपर्ट उन्हें रिव्यू करते हैं। तालिब कहते हैं कि ये सही नहीं है क्योंकि, “ये बताता है कि कोई भी बिज़नस, जिसपर फ़ैसला तथ्यों को बजाए, समकक्षों द्वारा लिया जाता हैं, वो फ़ैसला अंत में बेकार ही साबित होगा।” निवेश की दुनिया में ऐसी राय या रिव्यू जो लोग, कंपनियों या सैक्टर के बारे में पी/ई, पी/बी रेशियो जैसे प्राइस-मल्टीपल के आधार पर करते हैं, ये बिज़नस के बारे में अधूरी जानकारी ही देते हैं।

एक्सपर्ट की समस्या
सोशल मीडिया के बढ़ने के साथ-साथ एक्सपर्ट भी बढ़े हैं। मगर, तालेब के मुताबिक सही एक्सपर्ट वही है जिसके काम पर तुरंत ही रिव्यू मिल जाए। उनके मुताबिक, “आप जानते हैं कि एक डेंटिस्ट एक एक्सपर्ट है, मगर एक एपिडिमोलॉजिस्ट (महामारीविद्) नहीं, क्योंकि उसके लिए कोई फ़ीडबैक नहीं है।” वित्तीय एक्सपर्ट जो कई मीडिया प्लेटफॉर्म पर नज़र आते रहते हैं शायद ही कभी अपने काम का फ़ीडबैक पाते हों।

खेल का स्वरूप
किसी खेल में दांव लगाने के महत्व पर उनका कहना है, “आप खेल में जीतते तभी हैं जब आप सही होते हैं। वर्ना हारने पर कौन पैसे देता है?” हाल के वर्षों में निवेशकों ने प्रमोटरों द्वारा बहुतायत में की गई प्लेजिंग का बड़ा दाम चुकाया है। जब प्रमोटरों ने अपने निजी निवेश के लिए लोन लिए और इसके चलते शेयरहोल्डरों के हिस्से में घटे हुए शेयरों के दाम आए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रमोटर अपने लोन को चुकाने के लिए या तो राज़ी नहीं थे या इस काबिल ही नहीं थे।

स्केल का फ़र्क पड़ता है
अपने स्मॉल-कैप निवेश को लार्ज-कैप निवेश में कुछ ही साल में बदलते देखना बहुत सुखद है। हालांकि, ये बहुत ही कम होता है। क्यों? क्योंकि ऑपरेशन का स्केल मायने रखता है। तालिब कहते हैं, “आप एक बस्ती के डायनेमिक्स को एक गांव के डायनेमिक्स में नहीं बदल सकते। और एक गांव को एक कस्बे में नहीं बदला जा सकता। जब भी कोई समूह बड़ा हो जाता है तो स्केल में भी एक तरह का परिवर्तन हो जाता है।”

नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे
कंपनियों की उम्र दिन-ब-दिन घटती जा रही है। तालिब समझाते हैं, “जब मैं एमबीए स्टूडेंट था, तो आमतौर पर एक कंपनी करीब 50-60 साल एस. एंड पी. 500 में रहती थी। इस तरह वो टॉप पर मज़बूती से रहती थी। आज कंपनियां कितनी मज़बूत हैं? 10-12 साल के लिए.” हालांकि, एक कंपनी को जो वक्त लगता है, एक स्टार्ट-अप से भरे-पूरे बिज़नस में बदलने का, और एक बड़े बिज़नस से फ़ेल हो जाने का, वो वक्त भी घट रहा है।

ये लेख पहली बार सितंबर 11, 2021 को पब्लिश हुआ.

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