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कितना फ़्लैक्सी है आपका मल्टी?

सेबी द्वारा मल्टी-कैप फ़ंड्स का एसेट एलोकेशन करने के बाद, इसका निवेशकों पर क्या असर होगा।

सेबी द्वारा मल्टी-कैप फ़ंड्स का एसेट एलोकेशन करने के बाद, इसका निवेशकों पर क्या असर होगा।

आप म्यूचुअल फ़ंड्स में क्यों निवेश करते हैं? स्टॉक्स में क्यों नहीं? आप में से काफ़ी लोग स्टॉक्स में निवेश कर रहे होंगे मगर क्योंकि आप ये पेज पढ़ रहे हैं मैं मानता हूं कि ज़्यादातर लोग म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करने वालों में से होंगे।
इस सवाल के जवाब में कई लोग कह सकते हैं कि स्टॉक्स के लिए रिसर्च करना, निवेश के गुर सीखना और उन पर अमल करना एक मुश्किल काम है। हालांकि, इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश की भी अपनी मुश्कलें हैं, जैसे - बहुत ज़्यादा फ़ंड्स की वजह से विकल्पों की बहुतायत। अगर हम अलग-अलग प्लान के फ़ंड्स को छोड़ भी दें, तो भी क़रीब 1574 इक्विटी फ़ंड हैं जो भारतीय निवेशकों के लिए उपलब्ध हैं। और ये दिमाग़ चकरा देने वाली 37 कैटेगरी में आते हैं। जैसा कि मैं अक्सर कहता हूं, इतने सारे फ़ंड सिर्फ़ म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों की मार्केटिंग की मजबूरियों का नतीजा हैं। अगर उनका गोल निवेशक को अच्छी सेवाएं देना होता, तो कोई भी AMC आठ से बारह फ़ंड ही रखती। और तब हमारे पास कुल 400 के आसपास फ़ंड्स ही होते। ज़ाहिर सी बात है, ऐसा होता तो फ़ंड्स को कहीं बेहतर तरीक़े से मैनेज किया जा सकता था और लोगों के लिए अच्छे फ़ंड्स का चुनाव भी कहीं आसान होता।
आप अगर म्यूचुअल फ़ंड्स की लिस्ट पर एक सरसरी निगाह डालेंगे, तो आपको लगेगा कि अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ फ़ंड के चुनाव से पहले, आपको हर तरह के विस्तार में जाना होगा। आपको इसमें कई तरह के डीटेल्स पर नज़र रखनी होगी, जैसे - कंपनी का साईज़ (लार्ज-कैप, मिड-कैप, स्मॉल-कैप आदि), सैक्टर, थीम, भारतीय इक्विटी, फ़ॉरेन इक्विटी, और इसके अलावा भी बहुत कुछ।
चलिए जानते हैं कि बुनियादी तौर पर म्यूचुअल फ़ंड आपको क्या ऑफ़र करते हैं? यही न कि आप एक फ़ीस देंगे और फ़ंड मैनेजर्स की टीम की सेवाएं हासिल करेंगे। आख़िर म्यूचुअल फ़ंड आपके निवेश का एक ख़ास प्रतिशत फ़ीस के तौर पर लेते हैं और बदले में आपका पैसा, आपके लिए मैनेज करते हैं। अगर आप तर्क के साथ इस बात पर ग़ौर करें, तो इसके मुताबिक़ आपको अपना कोई भी फ़ैसला ख़ुद नहीं करना चाहिए। ये पता करना आपका काम ही नहीं है कि कंपनी का साईज़ क्या है, (लार्ज-कैप, मिड-कैप, या स्मॉल कैप आदि) आपको किस सैक्टर में पैसा लगाना चाहिए या फ़ंड की थीम क्या होगी। ठीक इसी सर्विस के लिए तो आप पैसे दे रहे हैं।
मल्टी-कैप फ़ंड्स इसी के लिए होते हैं और लंबे समय से उनका ठीक यही रोल रहा है। मगर, फिर ये कहानी घुमावदार हो गई और इन फ़ंड्स का स्वरूप दुरूह हो गया। दरअसल, कुछ मल्टी-कैप फ़ंड को चलाए जाने का तरीक़ा सेबी को पसंद नहीं आया। इसलिए रूल्स बदले गए और अब क़रीब-क़रीब कोई मल्टी-कैप फ़ंड नहीं बचा है। जो पहले मल्टी-कैप फ़ंड हुआ करते थे, वो अब फ़्लैक्सी-कैप फ़ंड कहलाते हैं। कुल मिला कर इसका नतीजा ये हुआ है कि ज़्यादातर निवेशकों के लिए ये जटिलताएं समझना मुश्किल हो गया है। अब सवाल है कि दोनों में से कौन से फ़ंड मल्टी-कैप होने के अपने ओरिजनल आईडिया के ज़्यादा क़रीब हैं (अगर कोई एक है भी तो)। इससे पहले, आप निवेशकों को ये सब सोचने की ज़रूरत ही नहीं थी।
ये रूल जनवरी 2021 से बदला गया कि ऐसे फ़ंड्स का कम-से-कम 25-25 प्रतिशत एसेट एलोकेशन - लार्ज, मिड और स्मॉल कैप की तीनों कैटेगरी में होना चाहिए ताकि ये फ़ंड्स अपनी पहचान को लेकर ‘ईमानदार’ दिखाई दें। असल में यही मुश्किल भी है। सेबी की लार्ज, मिड और स्मॉल कैप की परिभाषा पर एक नज़र डालें, तो समझ आ जाएगा कि मिड और स्मॉल कैप कंपनियों में 25-25 प्रतिशत निवेश करने से, मिड और स्मॉल कैप में निवेश का अनुपात ज़रूरत से ज़्यादा हो जाएगा।
पहले जिस तरह से मल्टी-कैप फ़ंड्स चल रहे थे, उसके मुक़ाबले मिड और स्मॉल कैप में निवेश का प्रतिशत अब पहले से कहीं ज़्यादा हो गया है। इससे भी बड़ी बात ये है कि एक बार जब फ़ंड बड़ा हो जाता है, जैसे ₹15,000 से ₹20,000 करोड़ AUM, तो इतने बड़े अनुपात में स्मॉल कैप या छोटे मिड-कैप में निवेश को बहुत ही मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर, स्मॉल-कैप में कम ही फ़्लोटिंग स्टॉक्स होते हैं और उनका वॉल्यूम भी कम होता है। उन्हें बड़ी मात्रा में ख़रीदा और बेचा नहीं जा सकता। रूल्स चाहे जो भी कहें, इस समस्या का असल में कोई समाधान नहीं है।
तो स्थिति ये है कि अब ऐसे मल्टी-कैप फ़ंड हैं जिन्हें कम-से-कम 25 प्रतिशत हर कैप रेंज में रखना है, और पूरे निवेश का कम-से-कम 75 प्रतिशत इक्विटी में निवेश करना है। वहीं फ़्लैक्सी-कैप फ़ंड के लिए इक्विटी में न्यूनतम निवेश 65 प्रतिशत होना चाहिए। सेबी के इस मापदंड के पूरा होने उन्हें ‘फ़्लेक्सी’ होने लिए और कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। इस विशेषता के आधार पर निवेशक पहले या दूसरे क़िस्म के फ़ंड को चुन सकते हैं। हालांकि उन्हें फ़ंड का चुनाव करने के लिए पहले के मुक़ाबले ज़्यादा काम करना होगा, मगर फिर भी ज़्यादातर लोग इसे कर सकते हैं।

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