
कुछ दिनों पहले, सेबी ने एक प्रेस रिलीज़ में बताया कि उन्होंने सोशल मीडिया के ज़रिए स्टॉक-मार्केट को अपनी धोखाधड़ी से प्रभावित करने वाली स्कीम पकड़ी है। इसके लिए सेबी ने कई जगह छापे मारे और काफ़ी बड़ा सोशल मीडिया रैकेट बंद करवा दिया। सोशल मीडिया के ज़रिए मार्केट प्रभावित करने वाला ये गैंग, 9 टेलिग्राम चैनल चला रहा था और इनके 50 लाख सबस्क्राईबर थे। इनके काम का तरीक़ा कुछ ऐसा था कि ये किसी स्टॉक को बड़े पैमाने पर ख़रीदते, फिर अपने ढेर सारे फ़ॉलोअर्स को भी वही स्टॉक ख़रीदने के लिए उकसाते थे। जब तेज़ ख़रीद से स्टॉक के दाम चढ़ने लगते, तो ये लोग उस स्टॉक को भारी मुनाफ़े पर बेच दिया करते।
स्टॉक्स में हेराफ़ेरी का ये तरीक़ा नया नहीं-बल्कि मार्केट जितना पुराना है। पहले स्टॉक ख़रीदो, फिर ‘टिप्स’ के तौर पर अफ़वाह फैला कर दाम बढ़वा दो। इतने साल में अगर कुछ बदला है, तो लोगों तक ये ‘टिप्स’ पहुंचाने का माध्यम बदला है। साथ ही लोगों तक पहुंच बनाने के तरीक़ों में बदलाव आया है और बातों को कहने की स्पीड पहले से बहुत तेज़ हो गई है। और हां, इस तरह की हेराफेरियों का पता लगाना अब पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल हो गया है। पहले तो आपस में बातचीत से ये सब किया जाता था, फिर SMS से होने लगा, और अब सोशल मीडिया ने तो हद ही कर दी है।
हालांकि, ट्रेडर्स के क़ारनामे देख कर लगता है कि असंगठित तरीक़े से दाम प्रभावित करने के मुक़ाबले, संगठित रेकेट कहीं कम ख़तरनाक़ हैं। 2020 के अंत से लेकर 2021 की शुरुआत में यूएस के ‘गेमस्टॉप’ की कहानी एक ऐसा ही क्लासिक केस है। गेमस्टॉप एक यूएस स्टोर चेन है जो कंप्यूटर गेम बेचती है। वक़्त के साथ ऑनलाईन गेम डिलिवरी में आने वाले बदलावों और वायरस की वजह से इसके स्टोर बंद होने लगे। माना जा रहा था कि ये बिज़नस ख़त्म हो चला है। मेल्विन कैपिटल्स नाम के हेज फ़ंड ने बड़े स्तर पर शॉर्ट-सेल करना शुरु कर दिया। तभी रिडिट (Reddit) ऑनलाईन कम्यूनिटी के लोग, ख़ासतौर पर ‘वॉलस्ट्रीटबेट्स’ के सबरिडिट वाले लोग समझ गए कि मेल्विन, स्टॉक को बड़े पैमाने पर शॉर्ट-सेल कर रहा है। इसके बाद वॉलस्ट्रीटबेट्स ने अपनी कम्यूनिटी में ऑनलाईन कैंपेन चलानी शुरु कर दी कि लोग स्टॉक ख़रीदें और मेल्विन को ‘शॉर्ट स्क्वीज़’ में फ़ंसा दें। ‘वॉलस्ट्रीटबेट्स’ के तीस लाख मेंबर हैं और उनकी ये कैंपेन बेहद सफल रही। गेम्सस्टॉप स्टॉक एक ही महीने के भीतर 10x हो गया और शॉर्ट-सेल करने वालों को इस दौरान 5 बिलियन डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा। सोशल मीडिया किस तरह से निवेश मार्केट में भीड़ को प्रभावित कर सकता है इसकी पूरी समझ अब तक नहीं हो पाई है, बस कुछ झलक ही मिलनी शुरु हुई है।
भारत में खुले तौर पर तो अब तक ऐसा नहीं हुआ है, मगर सोशल मीडिया का टिप देने वाले कई ट्रेडिंग रिंग्स मौजूद हैं जो अब भी असंगठित ही लगते हैं, हालांकि उनके प्रभाव में काफ़ी विस्तार हुआ है। जो लोग इनका हिस्सा हैं, वो इनमें दी जाने वाली जानकारियों के प्राईज़ पर पड़ने वाले असर को समझते हैं। मगर फिर भी, ये सब किसी संगठित व्यवस्था का हिस्सा नहीं लगता क्योंकि इस जानकारी का इस्तेमाल करने वाले बहुत से लोग अपने आईडिया भी शेयर करते हैं और उस पर विमर्ष (झगड़ते) भी करते हैं। इस तरह का सार्वजनिक एक्शन ट्विटर पर काफ़ी है, और कुछ-कुछ फ़ेसबुक पर भी मौजूद है। लेकिन ये विश्वास करना मुश्किल है कि इस सबका लोगों के निवेश के नज़रिए पर कोई असर नहीं हो रहा है।
‘टिप’ के लेन-देन का पुराना मनोवैज्ञानिक मॉडल अभी भी क़ायम है-ये दावा करने वाले ऐसे लोग है जो स्टॉक्स के ऊपर-नीचे जाने का सीक्रेट जानते हैं, बस, अगर वो मुझे बता दें तो मैं भी पैसे बनाना चाहूंगा। इसके अलावा, सोशल मीडिया ने कंट्रोल का एक भ्रमजाल खड़ा कर दिया है। लोग इस भ्रम में हैं कि सारी जानकारी वो ख़ुद ही तलाश रहे हैं और अपनी ख़ुद की ‘रिसर्च’ कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वो अपनी इस रिसर्च से कम्यूनिटी में योगदान भी दे रहे हैं। दो दशक पहले, जब बिज़नस के टीवी चैनल चल पड़े, तो उनके एंकर जिस यक़ीन से इंडेक्स के साधारण उतार-चढ़ावों पर टिप्पणियां करते और बेतरतीब बातों में भी तथ्य तलाश लेते थे, वो सब देख कर मुझे आश्चर्य होता था। मुझे लगता, ये जानकारी की अधिकता है, और लोगों को उनके निवेश के बारे में साफ़ तौर पर नहीं सोचने देगी। अब, जब सोशल मीडिया छा गया है, तब ये सारा शोर कई सौ गुना बढ़ गया है।
एक मुश्किल और है कि सोशल मीडिया पर दिए जा रहे ओपीनियन और ज़्यादा दृढ़ हो गए हैं। कोविड से क्रिकेट से यूक्रेन से निवेश तक, लोग हर बात पर पहले से और ज़्यादा पक्के नज़र आ रहे हैं, और अक्सर बिना किसी आधार के। कुल मिला कर ये कतई साफ़ नहीं है कि वो निवेशक जो निवेश के उसूलों पर पक्के नहीं हैं, क्या सोशल मीडिया उन पर कोई सकारात्मक प्रभाव कर रहा है? सेबी धोखाधड़ी करने वालों को तो बंद कर देगी, मगर अपने व्यवहार को रेग्युलेट करने का काम तो निवेशकों को ख़ुद ही करना होगा।





