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भविष्‍य की झलक

एक युवा के लिए, जिसने कमाना शुरू किया है, उसे खर्च और बचत में कैसे संतुलन बनाना चाहिए

भविष्‍य की झलक

मीडिया या सोशल मीडिया में बचत और निवेश को लेकर सारी सार्वजनिक चर्चा ग़लत बातों पर केंद्रित रहती है। सबसे अहम सवाल है कि निवेश कहां किया जाए। इस समय किस स्टॉक को लेना बेहतर रहेगा? कौन सा म्यूचुअल फ़ंड सबसे अच्छा है? और भगवान न करे पर, कौन सी क्रिप्टोकरंसी सबसे सही है? एक युवा जिसने अभी कमाना शुरु ही किया है, और निवेश के इस विषय को अपने लिए बेहतर निवेश चुनने के लिए देख रहा है, उसके लिए ये सब काफ़ी भ्रामक है। असल समस्या है, ज़्यादातर लोग या तो निवेश ही नहीं कर रहे या बहुत कम निवेश कर रहे हैं। या तो वो निवेश की शुरुआत बहुत देर से करते हैं, कभी-कभी तो शुरू ही नहीं करते, और करते भी हैं तो बहुत ही थोड़ा।
युवाओं को बचत की अहमियत सिखाना वित्तीय साक्षरता (financial literacy) का बड़ा हिस्सा है। हालांकि कुछ साल पहले मुझे एक ऐसा अनुभव मिला, जिसने बचत को लेकर नई नौकरी शुरू करने वालों की सोच का एक नया पहलू दिखाया। ये सवाल एक टीवी शो में सवाल-जवाब के दौरान किसी ने पूछा था। सवाल पूछने वाले युवा ने कमाना शुरू ही किया था और जानना चाहता था कि वो अपने पैसों के साथ क्या करे। बरसों से उसकी सबसे बड़ी तमन्ना थी, ₹1.5 लाख की एक मोटरसाइकल ख़रीदने की। कई साल से इस सपने को उसने उस वक़्त के लिए छोड़ रखा था जब वो कमाना शुरू करेगा। इस सपने में कोई असामान्य बात नहीं थी।
वो जानना चाहता था कि बाइक ख़रीदने लायक़ पैसा इकठ्ठा करने का सबसे तेज़ तरीक़ा क्या है। इसके जवाब में उसे सरल और समझदारी भरी सलाह मिली, जो पूरे कैलकुलेशन के साथ थी कि उसे कितनी बचत करनी होगी, रिटर्न क्या होंगे, और वो मोटरसाइकल कब ले पाएगा। एक कंज़रवेटिव इन्वेस्टमेंट एडवाइज़र के तौर पर, मुझे इस नज़रिए से सहमत होना चाहिए था। मन की इच्छाओं को टालना, पैसे को लेकर समझदारी भरे व्यवहार का अहम पहलू है। मगर, मैं सोचने लगा कि अगर अभी बचत शुरू करता है, तो वो 30 साल का होगा जब ख़रीद पाएगा और जिस तरह बाइक सवारी का मज़े एक युवा लेने चाहिए, वैसे मौज-मज़े की उम्र गुज़र चुकी होगी। असल में, तब उसे बाइक चाहिए ही नहीं होगी। तो शायद उसे अच्छे पैसों को लेकर समझदारी भरे बर्ताव का रूल तोड़ देना चाहिए, और पैसे उधार लेकर, बाइक अभी ख़रीद लेनी चाहिए, यानि, EMI पर ले लेनी चाहिए।
तो इसका मतलब है उसे बचत करनी ही नहीं चाहिए? आख़िरकार, बचत करने का क्या मतलब रह जाता है, अगर आपको लोन चुकाने हों। मगर फिर भी, मेरा ख़याल है कि ऐसे व्यक्ति को थोड़ी ही सही, पर बचत ज़रूर करनी चाहिए। चाहे सिर्फ़ ₹1,000 महीने की ही हो। चाहे बैंक के साधारण रिकरिंग डिपॉज़िट में ही हो।
इसकी मूल वजह है कि अपने गणित में बचत, सिर्फ़ रिटर्न और ब्याज दरों और ऐसी ही तमाम बातों तक सीमित नहीं है। असल में ये एक नज़रिया होता है, एक आदत होती है। अगर कोई शख़्स, हर महीने ₹1,000 जैसी छोटी रक़म की बचत करे, तो वो शख़्स बुनियादी तौर पर उससे अलग होगा, जो पूरे पैसे ख़र्च कर देता है।
मैं जो कह रहा हूं, वो बात सही फ़ाइनेंशियल एडवाइज़ का टेस्ट भले ही न पास करे, मगर मैं नहीं समझता कि ऐसी चीज़ पर ख़र्च करना बुरा है जिसे आप अच्छी तरह समझते हुए लेना चाहते हैं कि ये आपके मौज-मज़े के लिए है। मगर ऐसी चीज़े लेने के साथ-साथ बचत करना भी शुरू कर देना चाहिए। एक बार आपको अपनी बचत में कंपाउंडिंग का जादू पता चल जाएगा, यानि जब आप समझ जाएंगे कि पैसा ख़ुद-ब-ख़ुद मल्टीप्लाई होता है, तो ये अनुभव किसी भी वित्तीय साक्षरता की किसी भी क्लास से कहीं ज़्यादा क़ारगर साबित होगा। अंततोगत्वा, होगा ये कि बचत बढ़ेगी, इसे देख कर और ज़्यादा बचत की जाएगी और ये इसी से एक समझदारी भरा सकारात्मक चक्र चल पड़ेगा।

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