
मेरे एक मित्र हैं LM, वो अपना पैसा ऐसी AMC में निवेश करना पसंद करते हैं, जो नंबर वन हो। इस तरह से वो अपनी सारी पूंजी ऐसी AMC के फ़ंड में रखते हैं, जो सबसे ज़्यादा रक़म मैनेज कर रही हो। हाल ही में उनको अपना निवेश एक AMC से दूसरी AMC में लगातार शिफ्ट करना पड़ा। बरसों तक UTI के प्रभुत्व के बाद, जनवरी में रिलायंस सबसे बड़ी AMC बन गई। अगले महीने ICICI प्रूडेंशियल सबसे बड़ी कंपनी बन गई। और मार्च में फिर से रिलायंस सबसे बड़ी AMC बन गई। अब मेरे मित्र, निवेश को शिफ़्ट करने में मुश्किल का सामना कर रहे हैं। क्योंकि नंबर वन का ताज किसी के एक AMC सिर पर नहीं टिक रहा, इसलिए वो भी एक कंपनी से दूसरी कंपनी में आ-जा रहे हैं।
वास्तव में, उन्हें अब किस फ़ंड में निवेश करना है, इसका फ़ैसला करने की रणनीति में बड़ा बदलाव करने पर विचार करने लगे हैं। हालांकि वो पूरी तरह से ये तय नहीं कर पाए हैं, लेकिन हो सकता है अब वो AMC का साइज़ देख कर फ़ंड चुनने के बजाए, उसके निवेश के ट्रैक रिकॉर्ड पर फ़ंड चुनेंगे। उनका ये ख़याल काफ़ी क्रांतिकारी है, और साफ़-साफ़ कहूं, तो मैंने उन्हें सलाह दी है कि वे इस फ़ैसले पर सतर्कता से आगे बढ़ें। हालांकि मुझे लगता है कि LM का धैर्य जवाब दे चुका है और उन्होंने तय करलिया है कि अगर अब नंबर वन AMC एक बार और बदलती है, तो वो सबसे बड़ी AMC के फ़ंड में निवेश की रणनीति से प्रदर्शन की रणनीति पर शिफ़्ट कर जाएंगे।
हमारा कोई भी पाठक समझ सकता है कि ये कहानी एक मज़ाक भर है, लेकिन ऐसा लगता है कि फ़ंड इंडस्ट्री और फ़ाइनेंशियल मीडिया में काम करने वाले ये नहीं समझते। और कम-से-कम तब तो ऐसा ही लगता है, जब इस बात पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया जाता है कि कौन सी AMC नंबर वन है। मेरा अंदाज़ा है कि इंडस्ट्री में काफ़ी ऐसे लोग हैं जो LM की तरह हैं। शायद मैं गलत हो सकता हूं, शायद ऐसे लोग हों, जो नंबर के आधार पर अपना निवेश शिफ्ट न करते हों, लेकिन वो इस नंबर की होड़ से प्रभावित हो जाते हों।
इसके पीछे तर्क ये हो सकता है कि सबसे बड़ी AMC, बड़ी इसलिए बनी क्योंकि इसने निवेशकों की रक़म बेहतर ढंग मैनेज की। अगर ऐसा है, तो ये तर्क ख़ामियों से भरा है। AMC का साइज़ बड़ा होने के कई कारण हो सकते है। और ये बात, किसी छोटे साइज़ की AMC के लिए भी सही हो सकती है, जिसने इस बिजनस में कम समय बिताया हो। AMC के एसेट का स्वभाव भी अलग हो सकता है। UTI के पास शायद बड़ी संख्या में छोटे निवेशकों की पुरानी रक़म है। ICICI प्रूडेंशियल के पास रिलायंस की तुलना में शार्ट-डेट-इन्वेस्टमेंट काफ़ी ज़्यादा है, और रिलायंस के पास इक्विटी का पैसा ज्यादा है। इन AMC चलाने वालों पर, इस तरह के क़ारोबारी असर होते ही हैं। मिसाल के तौर पर, इक्विटी, डेट की तुलना में ज़्यादा मुनाफ़ा देने वाली एसेट-क्लास है, और बड़े निवेश, शायद छोटे निवेशों की तुलना में ज़्यादा मुनाफ़ा देने वाले होते हैं, लेकिन ये अपने निवेश में स्थिर नहीं होते।
हालांकि, निवेशकों के लिए इसमें से कुछ भी मायने नहीं रखना चाहिए। फ़ंड कंपनी का साइज़ आपके लिए तभी मायने रखना चाहिए, जब उस कंपनी में आपकी हिस्सेदारी हो। वास्तव में, अगर मुंबई में चल रही दिलचस्प कहानी सच है, तो ये आपके लिए उस सूरत में भी मायने रखता है, जब आपका भाई कंपनी का मालिक हो। स्पष्ट है, जब अनिल अंबानी की कंपनी 'रिलायंस म्यूचुअल', ज़नवरी में नंबर वन हो गई, तो कंपनी इसका प्रचार ज़ोर-शोर से करने लगी। उसी समय उनके भाई ने एक बड़ी रक़म ICICI प्रूडेंशियल में शिफ़्ट करते हुए, ये पक्का कर दिया कि दूसरी AMC नंबर वन हो जाए। ये एक तथ्य है, वो AMC बहुत थोड़े समय के लिए ही नंबर वन इसलिए बनी, क्योंकि इसके लिक्विड-फ़ंड का साइज़ तेज़ी से बढ़ा था। हालांकि, ये भी कम समय के लिए ही हुआ। बाक़ी सब अफ़वाह है, और कुछ भी हो जाए निवेशकों के लिए भाइयों की प्रतिद्वंदिता, AMC के साइज़ से भी कम मायने रखनी चाहिए।