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निवेश की मेरी ग़लती

अपनी गलती को स्‍वीकार करना और इससे सीखना सफल निवेशक बनने के लिए बहुत अहम है

निवेश की मेरी ग़लती


जब आप इस बार की वैल्थ इनसाइट मैगज़ीन खोलेंगे, तो आप में से कुछ लोगों को लगेगा कि वॉरेन बफ़ेट और हममें कुछ भी एक जैसा नहीं है। जिस बर्कशायर हैथवे के ज़रिए वो निवेश करते हैं, उसमें 145 बिलियन डॉलर के क़रीब कैश है, जिसे कभी भी निवेश किया जा सकता है। ये रक़म कमोबेश, 12 लाख करोड़ रुपए बैठती है। मैं समझता हूं, मेरे, और मेरे सभी पाठकों के सारे पैसे मिला लें, तो भी इससे कम ही होंगे। तो, ऐसा कैसे है कि हम बफ़ेट या मंगर या बर्कशायर से कुछ सीख सकते हैं? हमारी तुलना में तो उनकी प्रजाति ही अलग नज़र आती है।

पर क्या ये सच है? नहीं! ये तो वही बात होगी कि स्कूल का एक युवा क्रिकेटर, सचिन तेंदुलकर के वीडियो से कुछ नहीं सीख सकता। हमारे पास पैसा भले ही बफ़ेट से कुछ कम हो, मगर हमारे और उनके निवेश के सिद्धांत तो एक जैसे ही हैं न? कैसे? आप मुझे इसकी एक मिसाल देने का मौक़ा दीजिए।

अगर एक बेहतर निवेशक होना है (किसी से भी बेहतर), तो अहम है कि हम अपनी ग़लतियों से सीखें। और ये बात समझना भी बहुत मुश्किल नहीं कि ग़लतियों से सीखने के लिए, ग़लतियों का एहसास होना ज़रूरी है। पर क्या बफ़ेट और मंगर को ऐसा कोई ऐहसास होता है? आगे की बात, इस सवाल का जवाब ख़ुद दे देगी।

“मुझे पसंद है कि लोग ख़ुद स्वीकारें कि वो अव्वल दर्जे के बेवकूफ़ रहे हैं। मैं जानता हूं कि मैं बेहतर प्रदर्शन करूंगा, अगर मैं अपनी अपनी नाक अपनी ग़लतियों में रगड़ता हूं। कुछ सीखने की ये ट्रिक, ग़ज़ब की है।”

ये शब्द हैं 98-साल के चार्ली मंगर के, जिनमें उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई देती है। आप समझ ही गए होंगे कि बिज़नस की दुनिया के किसी बड़े लीडर की तरह, मंगर अपने शब्दों को किसी गरिमा के पुलिंदे में लपेट कर पेश नहीं करते। इसीका नतीजा है कि किसी नामी-गिरामी बिज़नस वाले की सपाट और बेमानी चकल्लस के बजाए, उनकी बातें असल में दिलचस्प और काम की लगती हैं।

अपनी ग़लतियों को पहचानने और मानने की ख़ूबी, बफ़ेट और मंगर में अक्सर झलकती है। ग़लतियों को लेकर उनकी बातें कोरी गप्पबाज़ी नहीं। जहां एक आम बिज़नस वाला कभी अपनी ग़लती नहीं मानता, वहीं ये दोनों ग़लतियां स्वीकार करने के लिए उत्साह से भरे दिखाई देते हैं। एक-दशक पुराने उनके फ़ैसले, उनकी सबसे बड़ी ग़लतियां कही जाती हैं। जैसे, IBM में निवेश करना उनका ख़राब प्रदर्शन रहा और एप्पल में निवेश करने में उन्होंने बहुत देर की—हालांकि इसे लेकर बाद में उन्होंने काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया।

पर, इससे भी बुरा तब हुआ कि वो शुरुआत में गूगल ख़रीदने से चूक गए, इस ग़लती को बफ़ेट और मंगर ने अपनी सबसे बड़ी विफलता माना। साल 2004 के आसपास, उनकी अपनी इंश्योरेंस कंपनी ने गूगल की नई-नई एडवरटाइज़िंग सर्विस के ज़बर्दस्त फ़ायदा लिया था। ये बात उन्हें समझ भी आ गई थी कि गूगल एक शानदार बिज़नस है। इस पर उनकी नज़र भी रही, इस विषय में बातचीत भी की गई थी, दोनों ने समझ लिया था कि गूगल में बड़ी ज़बर्दस्त संभावनाएं हैं, और इस सबके बावजूद उन्होंने कभी निवेश नहीं किया। “गूगल में निवेश न करने पर मंगर ने कहा था, हम बस बैठ कर अपना अंगूठा चूसते रहे।”

बहुत से निवेशक—जिनके निवेश का स्तर चाहे कुछ भी हो—निवेश के अपने फ़ैसलों को तर्कसंगत और सही ठहराने में जुटे रहते हैं। ज़्यादातर प्रोफ़ेशनल फ़ंड मैनेजर भी अपनी नौकरी बचाने के लिए अपनी ग़लतियों को ढकने की जुगत में लगे रहते हैं। पर, बफ़ेट और मंगर ने कभी ऐसा नहीं किया—न सिर्फ़ उन्होंने ख़ुद अपनी ग़लतियां मानी, बल्कि एप्पल के मामले में अपनी ग़लती को सही करने के लिए एप्पल के शेयर बड़ी संख्या में ख़रीदे। इससे भी बड़ी बात है कि सालाना शेयरहोल्डरों की बैठक में उन्होंने अपनी ग़लती सारी दुनिया के सामने सरेआम स्वीकार की और उस पर सवालों के जवाब भी दिए। कुल मिला कर इसका नतीजा हुआ है कि उनकी कंपनी और उसके शेयरहोल्डरों ने बेहतर किया है और अपने निवेश से बड़े मुनाफ़े वाला नतीजा पाया। यानि, ग़लतियां मान लेना, बेहतर होने का रास्ता खोलता है।

और हां, आमतौर पर जिस तरह होता है कि मंगर की बातें सिर्फ़ निवेश के पाठ (investment lessons) तक सीमित नहीं रहते, वो असल ज़िंदगी की सीख (life lessons) बन जाते हैं। ग़लतियां सब करते हैं, पर हममें से ज़्यादातर के लिए अपनी ग़लतियां स्वीकार करना मुश्किल होता है। हालांकि, निवेश की ग़लतियां ऐसी होती हैं जिन्हें हम चुपचाप जान-समझ सकते हैं और दुरुस्त कर सकते हैं। और न सिर्फ़ हम उन्हें ठीक कर सकते हैं, बल्कि उनसे कुछ सीख भी सकते हैं, और भविष्य में बेहतर रिटर्न का रास्ता साफ़ कर सकते हैं। मार्च और अप्रैल में जब कोविड शुरु हुआ, तब के घबराहट भरे फ़ैसलों पर एक नज़र डालिए। क्या वो एक ग़लती थी? हालांकि, उस वक़्त तो ऐसा नहीं लग रहा था। पर इससे भी बेहतर सवाल ये है: क्या हमने उससे कुछ सीखा? या हम उसे फिर से दोहराने वाले हैं?

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