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स्टॉक इन्वेस्टिंग का सबसे बड़ा रिस्क!

स्टॉक इन्वेस्टिंग की एक बात ऐसी है जिसे नज़रअंदाज़ करेंगे तो बड़ी क़ीमत चुकाएंगे, क्या है ये फ़ैक्टर जानने के लिए पढ़िए

स्टॉक इन्वेस्टिंग की एक बात ऐसी है जिसे नज़रअंदाज़ करेंगे तो बड़ी क़ीमत चुकाएंगे, क्या है ये फ़ैक्टर जानने के लिए पढ़िए

Overvalued Stocks यानी महंगे स्‍टॉक्स! स्‍टॉक इन्‍वेस्टिंग की दुनिया में इस टर्म का इस्तेमाल काफ़ी होता है. अगर आप स्‍टॉक में इन्‍वेस्ट करने जा रहे हैं, तो ज़ाहिर है आपको एक अच्छा और निवेश लायक़ स्टॉक चुनना होगा. ऐसे में आपको ये पता होना चाहिए कि कहीं आपका स्टॉक महंगा तो नहीं. स्टॉक की वैल्यू की पहचान का हुनर, आपकी हार और जीत के बीच का अंतर हो सकता है. तो आइये, समझते हैं कि महंगे या ओवर वैल्‍यू वाले स्‍टॉक की क्या पहचान है?

क्या होती है ओवर वैल्‍यू
ओवरवैल्‍यूड स्‍टॉक ऐसा स्‍टॉक होता है, जिनसे निवेशकों की बढ़ी हुई उम्मीदों के चलते, दाम बढ़ा रहता है. ये स्‍टॉक आमतौर पर ऊंचे PE (price to earnings ratio) और PB (price to book) रेशियो पर ट्रेड करते हैं, और ये काफ़ी कम डिविडेंट या लाभांश देते हैं.

आसान शब्‍दों में कहें, तो ओवर वैल्‍यूड स्‍टॉक वो स्‍टॉक हैं जिनकी वैल्‍यू उनके उनके असल मूल्य (intrinsic value) से ज़्यादा होती है. अगर आप ऐसे स्टॉक को ख़रीदेंगे तो आप उसे महंगा यानी ओवर-वैल्यूड ख़रीदेंगे. असल मूल्य या intrinsic value कंपनी की असल क़ीमत होती है जो कंपनी की कुल एसेट और भविष्‍य में ग्रोथ की संभावनाओं के आधार पर तय होती है।

इसलिए जो बातें स्‍टॉक की क़ीमत को प्रभावित करती हैं, उनको बाहरी फ़ैक्‍टर कहते हैं. इनमें स्‍टॉक की मांग का गिरना, बढ़ना, मार्केट के उतार-चढ़ाव, निवेशकों का बिना मज़बूत आधार के फैसला करना, जैसे कई कारण हो सकते हैं जो किसी स्टॉक की क़ीमत बढ़ा सकते हैं.

इसके अलावा, स्‍टॉक तब भी महंगा हो सकता है, जब कंपनी किसी वित्तीय संकट का सामना कर रही हो.

कई मार्केट एक्‍सपर्ट स्‍टॉक की ग़लत वैल्‍यूएशन यानी अंडर वैल्‍यूएशन और ओवर वैल्‍यूएशन को नहीं मानते हैं. हालांकि, जाने-माने मार्केट गुरू वॉरेन बफ़े और बेंजामिन ग्राहम ने वैल्‍यू इन्‍वेस्टिंग को काफ़ी अहमियत दी है. वैल्‍यू इन्‍वेस्टिंग को आप इन दो टर्म से ही समझ सकते हैं, पहला, अंडर वैल्‍यूड स्टॉक में निवेश और दूसरा, स्टॉक का ओवर वैल्‍यूड स्‍टॉक्‍स में निवेश.

इसे कैसे पहचानें कैसे
ओवर वैल्‍यूड स्‍टॉक की पहचान का कोई सटीक पैमाना नहीं है. इसके लिए काफ़ी रिसर्च और एनालिसिस की ज़रूरत होती है. ओवर वैल्‍यूड स्‍टॉक को पहचानने का सबसे आसान तरीक़ा PE रेशियो देखना है. PE आपको प्रति शेयर होने वाली कमाई के हिसाब से कंपनी के मौजूदा शेयर प्राइस के बारे में बताता है. अब चुनी हुई कंपनी के PE को उसके जैसी दूसरी कंपनियों के साथ तुलना करेंगे, तो आपको पता चल जाएगा कि उस कंपनी के शेयर ओवर वैल्यूड हैं या अंडर वैल्यूड.

ओवर वैल्‍यूड स्‍टॉक को पहचानने का एक और तरीक़ा है, कंपनी की कमाई बढ़ने की संभावनाओं की जांच करना. अगर किसी कंपनी का मौजूदा स्‍टॉक प्राइस, उसकी ग्रोथ की संभावनाओं की तुलना में ज़्यादा है, तो कंपनी ओवर वैल्‍यूड हो सकती है.

नोट: वैल्‍यूएशन के आंकड़े 16-2-2023 के हैं। ये आंकड़े रोज बदलते हैं।

अडानी एंटरप्राइजेज की वैल्‍यूएशन देखने पर पता चलता है कि कंपनी का P/E उसकी तरह की दूसरी कंपनियों की तुलना में तीन गुना से भी अधिक है। और ये तब है जब हाल में अडानी एंटरप्राइजेज के स्‍टॉक्‍स में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। साफ है कि अब भी ये स्‍टॉक काफी ओवर वैल्‍यूड है।

इसमें रिस्‍क क्या है
आमतौर पर स्‍टॉक मार्केट में ये स्‍टॉक बहुत लोकप्रिय होते हैं. लेकिन इनमें सेफ़्टी मार्जिन बहुत कम होता है. इसकी वज़ह ये है कि निवेशक ऐसे स्‍टॉक्‍स में बड़े पैमाने पर निवेश करना चाहते हैं. इनके साथ सबसे बड़ा रिस्‍क है कि अगर किसी वजह से, कंपनी के साथ कुछ गड़बड़ हो जाता है तो ये स्‍टॉक बहुत तेज़ी से गिरते हैं. मिसाल के तौर पर, अडानी ग्रुप की कंपनियों के साथ अभी हाल में ऐसा ही कुछ हुआ है जिसमें इस ग्रुप की कंपनियों के स्‍टॉक बहुत तेज़ी से गिरे हैं.

आपके काम की बात
हमारा मानना है कि ओवर वैल्‍यूड स्‍टॉक ख़रीदने से बचना ही चाहिए . सही क़ीमत पर स्‍टॉक ख़रीदना अच्‍छा मुनाफ़ा हासिल करने के लिहाज़ से बेहद अहम बात है.

ये लेख पहली बार फ़रवरी 16, 2023 को पब्लिश हुआ.

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