
हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक ने मॉनिटरी पॉलिसी की समीक्षा बैठक में महंगाई पर लगाम कसने के लिए ब्याज दरें बढ़ा दी हैं. इसकी वजह से कई डेट सिक्योरिटीज़ की यील्ड बढ़ रही है. बहुत से फ़ंड मैनेजरों को उम्मीद है कि ब्याज दरों में अब और इज़ाफ़ा नहीं होगा और आने वाले महीनों में ये ट्रेंड उलटा हो जाएगा, यानी ब्याज दरों में कटौती होगी. ये उम्मीद इसलिए है, क्योंकि महंगाई में गिरावट है और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की ग्रोथ सुधर रही है.
हालांकि, कुछ निवेशक सोचेंगे कि क्या ये सही समय है जब लंबे समय के डेट फ़ंड के बारे में सोचा जाए. गिरती ब्याज दरों के परिदृश्य में लॉन्ग-ड्यूरेशन फ़ंड ऊचा रिटर्न दे सकते हैं. लेकिन ये शॉर्ट- ड्यूरेशन फ़ंड की तुलना में ज्यादा तेज़ उतार-चढ़ाव वाले भी हो सकते हैं. इसीलिए वैल्यू रिसर्च में हम शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड को ही प्राथमिकता दे रहे हैं.
लॉन्ग-ड्यूरेशन फ़ंड ज़्यादा आकर्षक लग सकते हैं
डेट फ़ंड पर रिटर्न, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है. हाल के महीनों में, लॉन्ग-ड्यूरेशन फ़ंड ने बढ़ती ब्याज दरों की वज़ह से बहुत कम या नेगेटिव रिटर्न दिया है. हालांकि ब्याज दरों में गिरावट आने पर लॉन्ग-ड्यूरेशन फ़ंड बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. बॉन्ड की क़ीमतों और उसकी ब्याज दरों में उलटा रिश्ता होता है. जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो बॉन्ड की क़ीमतें गिरती हैं और जब ब्याज दरें गिरती हैं, तो बॉन्ड की क़ीमतें बढ़ती हैं.
प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के लिए ग्रोथ की संभावनाएं बेहतर हो रही हैं, और महंगाई, गिरावट की ओर है. ऐसे में कुछ फ़ंड मैनेजरों को ब्याज दरों में गिरावट की उम्मीद है. इससे लॉन्ग-ड्यूरेशन फ़ंड को फ़ायदा हो सकता है. असल में कुछ टॉप फ़ंड हाउस ने लॉन्ग ड्यूरेशन फ़ंड लॉन्च किए हैं. उनका मानना है कि ब्याज दरें बढ़ने का साइकल ख़त्म हो चुका है. लेकिन इस बात पर ग़ौर किया जाना चाहिए कि लॉन्ग ड्यूरेशन फ़ंड, शॉर्ट ड्यूरेशन फ़ंड की तुलना में ज़्यादा तेज़ उतार-चढ़ाव वाले हो सकते हैं.
डेट फ़ंड के रिटर्न
तमाम फ़ंड कैटेगरी का पिछले कुछ सालों का रिटर्न एनेलाइज़ करने के बाद, ये पाया गया कि शॉर्ट-टर्म फ़़ंड, लॉन्ग-टर्म और मीडियम-टू-लॉन्ग टर्म फ़ंड की तुलना में कम तेज़ उतार-चढ़ाव वाले हैं. अगर हम 10 साल के शॉर्ट ड्यूरेशन फ़ंड के एक साल के औसत रोलिंग रिटर्न पर गौर करें, तो पाएंगे कि रिटर्न की रेंज 2.से रही है. इसके विपरीत, लॉन्ग-टर्म फ़ंड काफ़ी तेज उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं और इनके रिटर्न की रेंज -1.7% से 20% रही है. वहीं मीडियम-टू-लॉन्ग टर्म फ़ंड की बात करें, तो इन फ़ंड्स ने 1%-15% के बीच रिटर्न दिया है. (1 साल और 5 साल के औसत रोलिंग रिटर्न का ग्राफ़ देखें)
आप क्या करें
अगर भारतीय रिज़र्व बैंक, ब्याज दरों में कटौती शुरू करता है तो लॉन्ग-ड्यूरेशन फ़ंड ज़्यादा आकर्षक बन सकते हैं. आने वाले महीनों में ये फ़ंड फ़ायदेमंद भी हो सकते हैं. लेकिन निवेशकों को ब्याज दरें बढ़ने पर इनको बेचने के लिए तैयार रहना चाहिए. लॉन्ग-टर्म फ़ंड के निवेश में टाइमिंग अहम होती है. और सदाबहार डेट फ़ंड की तलाश कर रहे निवेशकों के लिए बेहतर होगा कि वो शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड में निवेश बनाए रखें.
तो कुल मिला कर इसका नतीजा है कि लॉन्ग-ड्यूरेशन फ़ंड ऊंचा रिटर्न दे सकते हैं. लेकिन वो कम समय के तेज़ उतार-चढ़ाव का रिस्क लिए हुए होते हैं. दूसरी तरफ़, शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड बहुत ज़्यादा रिटर्न भले ही न दे सकें, लेकिन अंदाजे के मुताबिक रिटर्न देते हैं. ज़्यादा स्थिरता वाले निवेश की तलाश कर रहे निवेशकों के लिए ये अच्छा विकल्प हो सकते हैं.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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