
'पिछले 4 महीनों में सबसे ज़्यादा निवेश देखा गया', कुछ दिनों पहले एक अख़बार में ये पढ़ा. इस लेख में इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स में लोगों के निवेश को लेकर बात हो रही थी. इसी को लेकर कुछ आंकड़े इस तरह से हैं कि इक्विटी फ़ंड्स का नवंबर 2022 में कुल निवेश ₹2,258 करोड़ के निचले स्तर पर पहुंच गया था. पर दिसंबर में ये बड़ी तेज़ी से बढ़ा और ₹7,303 करोड़ पर पहुंच गया, और जनवरी में ₹12,546 करोड़ हो गया. मार्च तक, 12 महीनों में ये निवेश बढ़ कर ₹28,463 करोड़ हो गया था.
नवंबर से लेकर मार्च तक का ये बदलाव बहुत बड़ा है. इसमें सबसे निचले और सबसे ऊंचे स्तर का फ़र्क़ 12 गुना है! नोट करें, ये कुल निवेश या नेट इनफ़्लो है. मतलब, इसमें पैसे निकाला जाना या आउटफ़्लो शामिल नहीं है. यानी, जहां ये उतार-चढ़ाव जारी हैं, वहीं SIP (Systematic Investment Plan) के ज़रिए क़िश्तों में किया जाने वाला निवेश लगातार बढ़ रहा है. दिसंबर में SIP से होने वाला निवेश ₹13,573 करोड़ रहा, जो अब तक का सबसे ज़्यादा था, और जनवरी में ये थोड़ा और बढ़ गया, जो एक रिकॉर्ड है.
मोटे तौर पर भारतीय इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स का अब यही पैटर्न है. ये SIP और EPFO (Employees' Provident Fund Organisation) के ज़रिए बड़ा (बढ़ता हुआ) और लगातार आने वाला इनफ़्लो है. इसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है और ऐसा निवेशकों के पैसा निकलने के कारण होता है. हालांकि, नवंबर में जब ज़्यादा पैसे निकाले गए, पर तब भी जमा होने वाले पैसे निकाले गए पैसों से ज़्यादा ही रहे.
अब सवाल है कि किसी एक ही समय पर निवेशक ज़्यादा पैसे क्यों निकालते हैं. इसके कई कारण हैं, मगर ज़्यादातर लोगों का नवंबर में निवेश से बाहर निकलना दिखाता है कि मार्केट के उछाल के साथ बढ़ने वाले पैसे ही इसकी वजह होंगे. अगर आप पिछले साल के दौरान मार्केट के उतार-चढ़ाव देखेंगे तो पाएंगे कि नवंबर में वापसी करने के बाद इक्विटी मार्केट ऊंचाई पर था. यही वो वक़्त था जब घबराने वाले निवेशकों ने राहत की सांस ली और अपना पैसा तुरंत निकाल लिया. प्रॉफ़िट-बुकिंग जैसे खोखले आइडिया के चलते निवेश से निकलने के इस रवैये से निवेशकों को काफ़ी नुक़सान होता है. पर शायद इसे लेकर कुछ नहीं किया जा सकता. और हां, म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों के दूसरी तरह के दोयम दर्जे वाले फ़ैसलों में फ़ंड बेचने वालों का हाथ होता है.
दूसरा मसला SIP के प्रति नकारात्मक रवैया है. इसे फ़ंड बेचने वाले और कुछ फ़िन-फ़्यूएंसर (फ़ाइनांस-इन्फ़्लुएंसर) टाइप के लोग बढ़ावा देते हैं. विरोधाभासी विचार हमेशा ही लोगों का ध्यान खींचते हैं और पॉपुलर आइडिया की आलोचना लोगों को आकर्षित करने का अच्छा तरीक़ा होती है. अक्सर आप सुनेंगे कि जब आप काफ़ी लंबे समय से निवेश कर रहे हों, तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपने SIP के ज़रिए निवेश किया है या एक ही बार में सारे पैसे लगाए हैं. फ़ेसबुक और सोशल मीडिया पर इसी बात को कहते हुए कई पोस्ट मिल जाएंगी. कुछ फ़ंड डिस्ट्रिब्यूटर भी यही प्रमोट करते हैं और इसके कारण साफ़ हैं. आख़िर, SIP निवेश का एकमुश्त निवेश के अनुपात में ही घटना-बढ़ना कोई नई खोज नहीं है. अगर आपके फ़ंड में ₹1 लाख जमा हैं और उस फ़ंड का NAV 10 प्रतिशत गिर जाए तो उसकी वैल्यू ₹90,000 ही होगी, चाहे आपने क़िश्तों में निवेश किया हो या एक ही बार में सारे पैसे लगाए हों. ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है.
मुनाफ़ा पाने की पहली शर्त है कि निवेश किया जाए, और अपनी आमदनी का हिस्सा लगातार निवेश किया जाए, और उस पैसे के किसी दूसरे इस्तेमाल के लालच से बचा जाए. ऊपर दिया डेटा दिखाता है कि जो निवेशक SIP के ज़रिए निवेश करते हैं, वो अपना निवेश जारी रखते हैं. जबकि एक ही बार में सारा पैसा निवेश करने वाले अक्सर निवेश बंद कर देते हैं. हर महीने दी जाने वाली SIP, ख़र्च की औसत वाले गणित से ज़्यादा बड़ी बात है. असल में ये बिना रुकावट, लगातार और धीरे-धीरे निवेश करने के मनोविज्ञान की बात है. इस तरह से क़िश्तों में किया गया निवेश आपकी आमदनी के पैटर्न से मेल खाता है और अक्सर जब निवेश की शुरुआत ऐसे की जाती है तो आप रुकते नहीं हैं. चाहे SIP का IRR (internal rate of return ) एक बार में करने वाले निवेश से बेहतर है या नहीं, एक अकादमिक सवाल है जो सिर्फ़ अकादमिक लेखों के ही लिए है. जिनको हर महीने तनख़्वाह मिलती है उनके पास एक ही बार में बड़ी रक़म निवेश करने का विकल्प नहीं होता. यही वजह है कि SIP से पैसा बनता है। बहुत ज़्यादा फेरबदल करने वाले निवेश के तरीक़े से नहीं.




