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बुरी ख़बरों को छोड़ना बेहतर

हम दुनिया भर से बुरी ख़बरें आने के असाधारण दौर से गुज़र रहे हैं, पर बुरी ख़बरों में कुछ भी असाधारण है क्या?

बुरी ख़बरों को छोड़ना बेहतर

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महामारी, युद्ध, बैंकों का फ़ेल होना, और जब तक आप ये कॉलम पढ़ेंगे तब तक कुछ और घटनाएं हो चुकी होंगी. ऐसा लगता है जैसे ये समय असाधारण उथल-पुथल का है. ये समय अभूतपूर्व लग सकता है, पर असल में है नहीं. पिछले 30-40 साल के इतिहास पर नज़र डालिए, आपको एहसास होगा कि सब कुछ सामान्य है. असल में, अगर हमारे पास तीन-चार शांति के साल होते, जिनमें कोई त्रासदी या दुर्घटनाएं नहीं होतीं, तो मैं घबराने लगता कि अब इस शांति के जवाब में क्या ग़ज़ब होने जा रहा है. वाक़ई ये भूकंप जैसा है कि कुछ छोटे-छोटे भूकंप असल में भू-गर्भीय तनाव कम कर देते हैं और ऐसे में किसी बड़े भूकंप की संभावना कम हो जाती है.

तो, आइए पिछली आधी सदी को देखते हैं. 1973 में, स्थिति काफ़ी ख़राब थी. भारत आर्थिक तौर पर बदहाल था, एक युद्ध के बाद सैन्य जीत तो मिली थी, पर ये आर्थिक तौर पर महंगा पड़ा था. इसके ठीक बाद आया पहला तेल का झटका. जिसमें कच्चे तेल के दाम कुछ ही महीनों में क़रीब USD 2 से USD 12 के पास पहुंच गए. सालों की महंगाई और राजनैतिक उठा-पटक दुनिया भर में छाई थी. अमेरिका में, 70 के दशक के दूसरे हिस्से में महंगाई से मुक़ाबला करने के लिए ब्याज दरें अचानक बहुत बढ़ गईं थीं.

इसका असर ये हुआ था कि बाद के कुछ साल में अमेरिका की 3000 'सेविंग्स और लोन्स असोसिएशन्स' में से क़रीब एक-तिहाई फ़ेल हो गईं. भारत के कोऑपरेटिव बैंकों की तरह S&L का स्वामित्व भी मेंबरों के पास होता है, ये डिपॉज़िट लेती हैं और क़र्ज़ देती हैं. क्या इन घटनाओं का सिलसिला कुछ याद दिलाता है? अमेरिका की ऊंची महंगाई दर > फ़ेडरल बैंक का बड़े रूप में रेट बढ़ाना > कमज़ोर बैंकों का भरभरा कर गिरना. जी, आप सही हैं. आप जो कुछ आज देख रहे हैं, वो उसी तरह की घटनाओं का एक्शन रिप्ले है, जो पहले हो चुकी हैं और इसमें कोई शक़ नहीं कि आगे भी होंगी.

क़रीब-क़रीब हर साल कोई-न-कोई संकट रहा है. और ये वाली लिस्ट कुछ ही बड़े संकटों तक सीमित है, जैसे - 1980 की शुरुआत में पश्चिम की मंदी. 1991 में भारत का आर्थिक संकट. हर्षद मेहता और वैसे ही दूसरे स्कैम. 1997 का तथाकथित 'एशियन' संकट और 1998 में रूसी अर्थव्यवस्था का ढह जाना. 2001 का डॉटकॉम क्रैश, जो 9/11 के संकट से और गहरा गया था. 2003-2008 के तेल के दामों का बबल. 2007-2009 की ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस. 2012 के आस-पास यूरोपियन सॉवरिन डेट क्राइसिस शुरु हुई और 2019 में ख़ासतौर पर ग्रीस और दूसरी कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं में अपने चरम पर पहुंच गई. उसके बाद कोविड लॉकडाउन हुए और उनसे पैदा हुए कई तरह की आर्थिक तबाही सामने आईं. हमारे पड़ोस में ही देखिए, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश ने किस तरह की मुश्किलें झेलीं. हालांकि इनमें से हर किसी के लिए—ख़ासतौर पर पाकिस्तान के लिए—दूसरे राष्ट्रीय संकट बढ़ गए. इसमें कोई शक़ नहीं कि कोविड लॉकडाउन ने इसमें अपना योगदान दिया.

तो, कुछ न कुछ हमेशा ही चलता रहता है. नोट करें कि असल लिस्ट इससे कहीं ज़्यादा लंबी होगी; और यहां सिर्फ़ बड़ी-बड़ी घटनाएं ही गिनाई गई हैं. अगर कोई ये नहीं जानता कि इस दौरान इक्विटी इन्वेस्टमेंट कैसे रहे, तो इस लिस्ट को देख लें, इसे देखकर बुरी ख़बरों से प्रभावित लोग यही कहेंगे कि ऐसी स्थिति में तो कोई भी पैसा नहीं बना सकता था. यहां तक कि इक्विटी इन्वेस्टर अपनी शुरुआत में देर-सबेर दिवालिया हो ही गए होंगे. मगर हम आज यहां इस मुक़ाम पर खड़े हैं. इसी दौर में इक्विटी ने निवेश के दूसरे सभी तरीक़ों में ख़ुद को अव्वल साबित किया है.

एक निवेशक के तौर पर अगर आप आजकल की घटनाओं से डरे हुए हैं, तो आपको आगे क्या करना चाहिए? मैं कहूंगा कि आप इतिहास पर एक नज़र डालें और समझें कि आपके डर बेबुनियाद हैं. ख़बरें ज़रूर पढ़िए पर इसे अपने निवेश के नज़रिए पर हावी मत होने दीजिए. हमारे-आपके पास भविष्य में झांक कर देखने का कोई तरीक़ा नहीं है. हम ये नहीं पता लगा सकते कि ग्लोबल बैंकिंग में, यूरोप के झगड़े में, या और कहीं भी क्या होगा. हालांकि, याद रखने वाली अहम बात है कि हमें ये सब जानने की ज़रूरत ही नहीं है, अगर हम पंटर नहीं हैं जो कुछ ही दिनों के भीतर स्टॉक को ख़रीदते-बेचते हैं.

इसमें कोई शक़ नहीं कि ऐसी घटनाओं की वजह से स्टॉक्स में उतार-चढ़ाव और बड़ी गिरावटें आती ही रहेंगी. पर, आज भारतीय अर्थव्यवस्था और हमारे मार्केट पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं. भारतीय बाज़ार में अब भारतीयों का पैसा कहीं ज़्यादा लग रहा है, ख़ासतौर पर इक्विटी SIP और EPFO के ज़रिए, और ये भारतीय बाज़ार में स्थिरता की वजह बना है. कुछ रुकावटें तो रहेंगी ही, मगर निवेशक अपने निवेश की क्वालिटी पर फ़ोकस बनाए रखें, और स्टॉक के दाम कम होने पर उसका फ़ायदा उठाएं, तो ये उनके निवेश के लिए बेहतर रहेगा. अगर आप ऐसा करते हैं और क्वालिटी पर फ़ोकस बनाए रखते हैं, तो ये निवेश करने का अच्छा समय है, जो हमेशा ही रहता है.

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