
कुछ ख़बरों के मुताबिक़, SEBI म्यूचुअल फ़ंड की फ़ीस को परफ़ॉर्मेंस से जोड़ने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है. इस समय, म्यूचुअल फ़ंड जो पैसा मैनेज करते हैं उसका एक फ़्लैट परसंटेज, फ़ीस के तौर पर चार्ज किया जाता है. चाहे निवेशक को ज़्यादा रिटर्न मिले, कम मिले या फिर नुक़सान ही क्यों न हो. इस नए प्रस्ताव के बारे में अब तक जो भी सुना गया है उसके मुताबिक़, फ़ंड्स के पास पैसे चार्ज करने के विकल्प का एक अलग स्ट्रक्चर होगा, जिसमें एक तरह की परफ़ॉर्मेंस फ़ीस भी शामिल होगी. इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट की दुनिया में, परफ़ॉर्मेंस फ़ीस का मतलब होता है, फ़ंड को रिटर्न का एक प्रतिशत मिलना. यानी, जितना ऊंचा रिटर्न, उतना ज़्यादा पैसा वो पाते हैं. आमतौर पर, ज़्यादातर—सभी नहीं—ऐसे फ़ंड मैनेजमेंट फ़ीस भी चार्ज करते हैं.
ये किस तरह से काम करता है? इसे एक मिसाल के तौर पर बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता है. फ़ीस के स्ट्रक्चर को अक्सर तीन नंबरों से समझा जाता है, उदाहरण के तौर पर, 2/8/20. इस मिसाल का मतलब है कि फ़ंड मैनेजमेंट फ़ीस के तौर पर 2 प्रतिशत सालाना चार्ज लेगा, प्लस 8 प्रतिशत से ज़्यादा के रिटर्न वाले हिस्से में से 20 प्रतिशत भी लेगा. इस 8 प्रतिशत को हर्डल रेट (hurdle rate) कहा जाता है. ये रेट भारतीय म्यूचुअल फ़ंड इन्वेस्टर को किसी डकैती जैसा लगेगा, पर मैं यक़ीन दिलाता हूं कि ये एक आम बात है. कुछ साल बाद, सभी परफ़ॉर्मेंस फ़ीस एक डकैती ही लगती हैं और ऐसा इसलिए क्योंकि ये डकैती ही हैं.
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फ़ंड मैनेजमेंट इंडस्ट्री का कहना है कि परफ़ॉर्मेंस फ़ीस एक अच्छी चीज़ है क्योंकि इसमें निवेशक और फ़ंड के हितों का एक साथ अलाइनमेंट हो जाता है—अगर निवेशक ज़्यादा पैसे बनाता है, तो फ़ंड भी ज़्यादा पैसे बनाता है. ये आइडिया निहायत बेईमान और बेकार है. इसे इस तरह कहना सही होगा: उन सालों के दौरान जब निवेशक ज़्यादा पैसे बनाता है, तो फ़ंड ज़्यादा पैसे बनाता है. मगर उन सालों में जब निवेशक पैसे गंवाता है, तो फ़ंड थोड़े पैसे बनाता है (मैनेजमेंट फ़ीस के ज़रिए). अगर मैनेजमेंट फ़ीस ज़ीरो हो, तब भी फ़ंड पैसे नहीं गंवाता. फ़ंड आपके मुनाफ़े का हिस्सेदार है मगर आपके नुक़सान का नहीं. क्या ये आपको 'इनसेंटिव का सही अलाइनमेंट' लगता है? नहीं, इसे अलाइनमेंट कहना एक क्रूर मज़ाक होगा.
इसका एक बड़ा कारण है कि अगर फ़ंड मैनेजमेंट ज़्यादा रिस्क लेता है, तो इससे आंकड़े निवेशक के ख़िलाफ़ जाकर उसे लूटने वाले हो जाते हैं. ऊंचे रिस्क लेने के साथ-साथ, आपके निवेश का उतार-चढ़ाव भी ज़्यादा हो जाता है, और ये बात हर इक्विटी निवेशक समझता है. यानी, आपको कहीं ज़्यादा ऊंचे रिटर्न देखने को मिल सकते हैं जिसकी क़ीमत आप नुक़सान वाले दौर में और ज़्यादा नुक़सान से चुकाते हैं. क्योंकि परफ़ॉर्मेंस फ़ीस फ़ंड को आपके मुनाफ़े का हिस्सेदार बना देता है मगर नुक़सान का नहीं. इस तरह, ये फ़ंड के लिए ज़्यादा पैसे बनाने का आसान ज़रिया बन जाता है. ग्लोबल मार्केट में, कई साल के ख़राब प्रदर्शन ने कई फ़ंड्स को मजबूर कर दिया है कि वो इसका कोई हल दें, मगर सच तो ये है कि निवेशक इस व्यवस्था में कम पैसा बनाते हैं.
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इसके अलावा एक और बड़ी मुश्किल है, परफ़ॉर्मेंस फ़ीस निवेश के पैसे पर लगातार बुरा असर डालती है. वो सारा पैसा, जो फ़ंड्स मुनाफ़े के सालों में काट लेते हैं, आगे की ग्रोथ के लिए उपलब्ध नहीं होता, इससे रिटर्न या मुनाफ़ा और कम हो जाता है. असल में, इससे तो इक्विटी फ़ंड फ़िक्स्ड डिपॉज़िट जैसे हो जाते हैं, जहां सरकार हर साल TDS काटती है और रिटर्न कम कर देती है.
किसी भी सूरत में, पूरे फ़ंड से सालाना कटौती, जो कि एक 'ग्लोबल स्टैंडर्ड' है, एक निवेशक के सरासर ख़िलाफ़ है और म्यूचुअल फ़ंड निवेश की भावना से बिल्कुल उलट. अगर कुछ होना ही है, तो परफ़ॉरमेंस फ़ीस को बहुत छोटा होना चाहिए और इसे एक ही बार, एग्ज़िट फ़ीस के तौर पर लिया जाना चाहिए जब निवेशक अपने निवेश से बाहर निकले.
क्या परफ़ॉर्मेंस फ़ीस का कोई भी मतलब बनता है? इसका जवाब एक शब्द का है यानी नहीं. जिन्होंने फ़ंड इंडस्ट्री को लंबे समय तक देखा है वो अच्छी तरह से जानते हैं कि सबसे बढ़िया और असरदार परफ़ॉर्मेंस इनसेंटिव पहले से ही मौजूद है. ऐसे फ़ंड जो अच्छा प्रदर्शन करते हैं उन्हें ज़्यादा पैसे मिलते हैं. उन्हें ज़्यादा ग्राहक मिलते हैं और साथ ही ख़ुश ग्राहक उन्हें निवेश के तौर पर और पैसे देते हैं. जैसे-जैसे एसेट बढ़ती हैं, उसी हिसाब से मैनेजमेंट की फ़ीस बढ़ती जाती है, और इस तरह, फ़ंड कंपनी का मुनाफ़ा भी बढ़ता है. जो परफ़ॉर्मेंस इनसेंटिव ख़ुश और संतुष्ट ग्राहक देते हैं, वो कहीं ज़्यादा समय तक चलने वाला और स्थाई होता है. बजाए 'इनसेंटिव के अलाइनमेंट' के झूठ से ग्राहकों की जेब काटने में भागीदार होने के, रेग्युलेटर को इसी तरह के इनसेंटिव को बढ़ावा देना चाहिए.
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