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IEX का शेयर अपने पीक से 65% गिरा, क्या सबसे बुरा दौर बीत गया है?

रेगुलेशन से जुड़े एक बदलाव ने कंपनी की बढ़त ख़त्म कर दी. निवेशकों को अब किन बातों पर नज़र रखनी चाहिए.

रेगुलेशन से जुड़े एक बदलाव ने कंपनी की बढ़त ख़त्म कर दी. निवेशकों को अब किन बातों पर नज़र रखनी चाहिए.Vinayak Pathak/AI-Generated Image

सारांश: IEX का शेयर टूटा नहीं है. मुनाफ़ा अभी भी है. लेकिन रेगुलेशन से जुड़े एक फ़ैसले ने वो चीज़ छीन ली जो इस कारोबार को टक्कर देना मुश्क़िल बनाती थी. जो बचा है वो एक ठीक-ठाक कंपनी है, ठीक-ठाक क़ीमत पर, लेकिन एक सवाल का जवाब बाज़ार ने अभी तक नहीं दिया है.

पिछले एक साल में IEX का शेयर 30 प्रतिशत से ज़्यादा गिर चुका है. 2021 के शिख़र से यह 65 प्रतिशत से ज़्यादा नीचे है. उस शिख़र पर निवेशक इस शेयर के लिए अर्निंग्स की तुलना में 100 गुना से ज़्यादा पैसा चुका रहे थे. आज वो क़रीब 24 गुना दे रहे हैं.

कारोबार मुश्किल में नहीं है. मुनाफ़ा अभी भी है. जो बदला है वो रेगुलेशन से जुड़ा एक फ़ैसला है. और उस एक फ़ैसले ने पूरी निवेश की कहानी फिर से लिख दी है.

IEX असल में क्या करती है

IEX को वैसे ही समझिए जैसे BSE या NSE को समझते हैं, बस फ़र्क़ यह है कि यहां शेयरों की जगह बिजली ख़रीदी-बेची जाती है.

IEX (इंडियन एनर्जी एक्सचेंज), 2008 में एक प्रतियोगी PXIL यानी पावर एक्सचेंज इंडिया के साथ शुरू हुआ. लेकिन IEX जल्दी आगे निकल गया. इसने बाज़ार में सबसे ज़्यादा ख़रीदारों और बेचने वालों को जोड़ा, और ज़्यादा लोग आते हैं तो और ज़्यादा आते हैं. अगर आप बिजली के बड़े ख़रीदार या बेचने वाले थे और एक ऐसा बाज़ार चाहते थे जहां बड़े ऑर्डर बिना क़ीमत हिलाए लगाए जा सकें, तो IEX ही एकमात्र असली विकल्प था. यही लिक्विडिटी की बढ़त उसका सुरक्षा घेरा (moat)  थी. वो चीज़ जो प्रतियोगियों को दूर रखती थी.

मार्केट कपलिंग ने इसी खाई पर सीधा हमला किया.

मार्केट कपलिंग का मतलब क्या है और यह क्यों मायने रखता है

पहले क़ीमत एक ही एक्सचेंज के अंदर तय होती थी. IEX की ऑर्डर बुक, यानी सभी ख़रीद और बिक्री बोलियों का मिला-जुला रिकॉर्ड, वहीं बिजली की क़ीमत तय होती थी. जिसके पास सबसे ज़्यादा ख़रीदार और बेचने वाले थे वो क़ीमत तय करता था. IEX के पास सबसे ज़्यादा थे. IEX क़ीमत तय करता था.

भारत के बिजली क्षेत्र के रेगुलेटर CERC यानी सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन ने यह बदल दिया. मार्केट कपलिंग के तहत सभी एक्सचेंजों की बोलियां एक साथ जोड़ी जाती हैं, इसलिए क़ीमत एक साथ सभी जगहों पर तय होती है. नतीजा: अब इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप किस एक्सचेंज पर ट्रेड करते हैं. हर जगह एक जैसी क़ीमत और एक जैसी गहराई मिलती है.

IEX की लिक्विडिटी की बढ़त ख़त्म हो गई. सुरक्षा घेरा खत्म हो गया.

बाज़ार ने यह तुरंत समझ लिया. शेयर तेज़ी से गिरा, इसलिए नहीं कि कारोबार खत्म हो गया, बल्कि इसलिए कि वो बुनियादी बढ़त चली गई जो प्रीमियम वैल्यूएशन को सही ठहराती थी.

रेगुलेशन का साया भी नहीं हटा है. फ़रवरी 2026 में अपीलीय ट्रिब्यूनल APTEL ने एक क़ानूनी चुनौती निपटाई, लेकिन साफ़ किया कि रेगुलेशन 39 के तहत ख़ास नियम अभी बने नहीं हैं. IEX के पास अभी भी उन नियमों को आने के बाद चुनौती देने का अधिकार है. जोखिम ख़त्म नहीं हुआ. यह बस तत्काल ख़तरे से हटकर धीमे, रेगुलेशन-आधारित साए में बदल गया है जो हर तिमाही पर मंडरा रहा है.

IEX के पक्ष में तर्क, लेकिन शर्तों के साथ

IEX को पूरी तरह नकारने का मन करता है. लेकिन आंकड़े एक उलझी हुई कहानी बताते हैं.

फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में भारत ने 1,830 अरब यूनिट बिजली बनाई. इसमें से सिर्फ़ 144 अरब यूनिट, यानी क़रीब 8 प्रतिशत, एक्सचेंजों के ज़रिए ट्रेड हुई. IEX के पास उस वॉल्यूम का 75 प्रतिशत से ज़्यादा था.

अब सोचिए क्या होगा अगर एक्सचेंज के ज़रिए बिजली ट्रेडिंग 15 प्रतिशत तक पहुंच जाए, जो सरकार के बिजली की बाज़ार-आधारित प्राइसिंग पर जोर को देखते हुए बेतुका नहीं है. तब एक्सचेंज-ट्रेडेड वॉल्यूम 274 अरब यूनिट हो जाएगा. यहां तक कि अगर IEX की बाज़ार हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक गिर जाए, यानी 25 से ज़्यादा प्रतिशत पॉइंट की गिरावट, तब भी यह 27 प्रतिशत की वॉल्यूम बढ़त दिखाएगा.

यही बुल केस है. इतनी बड़ी बाज़ार हिस्सेदारी खोने के बाद भी IEX आज से बड़ा होगा.

बुल केस क्यों असहज करता है

समस्या यह है कि यह पूरी तरह उन मान्यताओं पर टिका है जिन पर IEX का कोई वश नहीं है.

मार्केट कपलिंग ने मैदान बराबर कर दिया है. नए एक्सचेंज अब लिक्विडिटी के नुक़सान के बिना आ सकते हैं. वो रुकावट अब नहीं रही. कोई भी कॉम्पिटिटर कंपनी कम ट्रांज़ैक्शन फ़ीस देकर भी, पहले दिन से मुकाबला कर सकता है. IEX ने अपना दबदबा बड़े स्तर पर कायम किया था. लेकिन, यह अब बुनियादी बढ़त नहीं रही.

बुल केस को जिस पेनेट्रेशन ग्रोथ की ज़रूरत है वो असली है लेकिन अनिश्चित है. रिन्यूएबल एनर्जी का बढ़ना और बिजली के लंबे समय के समझौतों से छोटी अवधि की ट्रेडिंग की तरफ़ धीरे-धीरे शिफ़्ट होना, दोनों पेनेट्रेशन बढ़ा सकते हैं. लेकिन ये नीति के फ़ैसले हैं, कारोबार के नहीं. ये पूरी तरह IEX के बाहर हैं.

किन बातों पर नज़र रखें

दो बातें तय करेंगी कि यह कहानी कहां जाती है.

पहली, एक्सचेंज पेनेट्रेशन: क्या एक्सचेंजों पर ट्रेड होने वाली बिजली का हिस्सा बढ़ रहा है? दूसरी, बाज़ार हिस्सेदारी: IEX की कॉम्पिटिटर कंपनियों को कितना और कितनी तेज़ी से दे रहा है?

ये दोनों अलग-अलग नहीं चलते. अगर पैठ बढ़ती है और बाज़ार हिस्सेदारी टिकी रहती है, तो वॉल्यूम का गणित IEX के पक्ष में काम करता है. अगर हिस्सेदारी की गिरावट पैठ में बढ़ोतरी से आगे निकल जाती है, तो नहीं. क़रीब 24 गुना अर्निंग पर मौजूदा वैल्यूएशन दोनों में से किसी का भी पक्का जवाब नहीं देती.

IEX जैसे शेयर एक असहज दोराहे पर खड़े हैं. कारोबार ठीक है, सुरक्षा घेरे को नुक़सान पहुंचा है और वैल्यूएशन अब साफ़ तौर पर ग़लत नहीं है. इस तरह की उलझन में क्या करें यह उतना आसान नहीं जितना लगता है. वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र ठीक ऐसी ही परिस्थितियों पर नज़र रखता है, ताकि बाज़ार के कोई फ़ैसला लेने से पहले आप यह तय कर सकें कि होल्ड करें, निकलें या इंतज़ार करें.

बाज़ार जिसका इंतज़ार कर रहा है वो है प्रमाण. बाज़ार में पैठ का डेटा और प्रतिस्पर्धा की दिशा साफ़ दिखने से पहले यह साया नहीं हटेगा. समझ लीजिए, तब तक रेगुलेशन जोख़िम ख़त्म नहीं हुआ है. यह बस थोड़ा आगे खिसक गया है.

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