मैनेजर स्पीक

“ज़्यादा टैक्स और महंगाई असली रिटर्न नेगेटिव कर देते हैं”

PPFAS म्यूचुअल फ़ंड के CIO राजीव ठक्कर से ख़ास बातचीत

“ज़्यादा टैक्स और महंगाई असली रिटर्न नेगेटिव कर देते हैं”

कई साल, भारत के म्यूचुअल फ़ंड बाज़ार पर ज़्यादातर बड़े बैंकों और ग्रुप कंपनियों से जुड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) का वर्चस्व रहा. हालांकि, इंडस्ट्री के इन दिग्गजों के बीच, PPFAS म्यूचुअल फ़ंड (यानी पराग पारिख म्यूचुअल फ़ंड) एक गज़ब का खिलाड़ी साबित हुआ है. पिछले एक दशक में इसने सभी रुकावटों को पार करते हुए शानदार ग्रोथ दर्ज की. हाल ही में, हमें PPFAS म्यूचुअल फ़ंड के चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर और फ़ंड मैनेजर श्री राजीव ठक्कर से बात करने का मौक़ा मिला. उनके मार्गदर्शन में पराग पारिख फ़्लेक्सी कैप फ़ंड, सबसे बड़े एक्टिव इक्विटी फ़ंड्स में से एक बन कर उभरा, जिसका साइज़ और लोकप्रियता दोनों बढ़ती जा रही हैं. हमारे साथ बातचीत में, श्री ठक्कर ने वर्तमान ग्लोबल मैक्रो ट्रेंड्स, एक बड़े साइज़ के एसेट के मैनेजमेंट के फ़ायदे, विदेश की तुलना में भारत में निवेश करने के अपने ख़ास नज़रिये पर विचार साझा किए और पोर्टफ़ोलियो से जुड़े अपने कुछ फ़ैसलों पर भी बात की. हाल के दौर में अमेरिका के बेतरतीब तरीके से किए गए ख़र्च और समय-समय पर डेट सीलिंग (debt ceiling) में बढ़ोतरी देखें, तो लगता है कि डॉलर धीरे-धीरे वर्ल्ड रिज़र्व करेंसी की हैसियत खो रहा है. इस बारे में, आप ख़ासकर अमेरिका में विदेशी इक्विटी में अपने निवेश की संभावनाओं का मूल्यांकन कैसे करते हैं? अमेरिकी कंपनियों में सीधे निवेश करने वाले भारतीय निवेशकों के सामने कौन से बड़े जोखिम हैं? मुझे लगता है कि लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं में तभी से राजकोषीय नासमझी बनी हुई है, जब हमने कागज़ी मुद्रा या कानूनी मुद्रा का इस्तेमाल करना शुरू किया था. पहले अमेरिकी डॉलर का गोल्ड के साथ कुछ संबंध हुआ करता था, लेकिन फिर वो अपने पास मौजूद सोने से ज़्यादा करंसी प्रिंट करने लगे. और अंत में उन्होंने गोल्ड को डॉलर का स्टैंडर्ड होने का दावा भी छोड़ दिया. इसलिए, जहां कहीं भी टैक्स से जुटाए गए पैसों से ज़्यादा ख़र्च करने की ज़रूरत होती है, वहां के राजनेता अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हैं. दरअसल, इससे वोटरों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती है. हालांकि, ये एक तरह से आर्थिक नाकामी है. आख़िर में, उन निवेशकों का क्या होगा जिनके पास फ़िक्स्ड-इनकम सिक्योरिटीज़ बड़ी मात्रा में हैं. इनमें बैंक फ़िक्स्ड डिपॉजिट, सरकारी बॉन्ड या ऐसी कई और सिक्योरिटी हो सकती हैं, जिनमें आपको मिलने वाले रिटर्न को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस रिटर्न में ज़्यादातर हिस्सा महंगाई का है, और असल मुनाफ़ा तो बहुत कम है. और कभी-कभी तो टैक्स और महंगाई इतनी ज़्यादा होती है कि असल रिटर्न निगेटिव में होता है. बफ़े ने इस बारे में कई मौकों पर विस्तार से बात की है. वो इसे लेकर पर्सनल स्किल का हवाला भी देते हैं. वो कहते हैं कि अगर आप शहर के सबसे अच्छे सर्जन हैं, तो लोग आपकी सर्विस के लिए करंसी और महंगाई की परवाह किए बिना फ़ीस देंगे. और उस फ़ीस से आप लग्ज़री के साथ जिंदगी जीने का ख़र्च उठा सकते हैं. इसलिए, आपको महंगाई की ज़्यादा चिंता करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि अगर बाक़ी चीज़ों की क़ीमतें बढ़ती हैं तो आपकी सर्विस की क़ीमत भी बढ़ जाएगी. इसीलिए, हम प्राइसिंग पावर वाले ऐसे बिज़नस में निवेश करने की कोशिश कर रहे हैं, जो ज़्यादा कॉम्पिटिशन वाले सेक्टर में नहीं हैं, या उनका अपना एक अलग प्रोडक्ट है या जिनमें कुछ एंट्री बैरियर है, ताकि वो महंगाई के साथ तालमेल बिठा सकें. जिओपॉलिटिकल टेंशन के साथ-साथ, दुनिया में मल्टी-पोलर स्थिति भी है, जहां एक तरफ़ पश्चिमी देश फ़ाइनेंशियल सिस्टम तक रू

ये लेख पहली बार जून 19, 2023 को पब्लिश हुआ.

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