
हम अपनी रोज़मर्रा की दिनचर्या में चाहे जो भी कर रहे हों, उसमें नये ज़माने (new age) की कंपनियों का रोल रहता ही है. ज़ोमाटो पर खाना ऑर्डर करने लेकर डेल्हीवरी के ज़रिए से नायका पर फ़ैशन से जुड़ी ख़रीदारी करने तक, पॉलिसीबाज़ार से बीमा लेने से लेकर पेटीएम मनी के ज़रिए से निवेश करने तक, ये नए ज़माने की कंपनियां हमारी ज़िंदगी में घुली-मिली हुई हैं. हैरत नहीं कि ये नए बिज़नस सस्ते निवेश बड़ी संभावनाओं से भरे लग रहे हैं, और इसीलिए म्यूचुअल फ़ंड्स भी इस दौड़ में शामिल हो गए हैं. आपमें से कुछ लोग इसे हाइप का नाम भी दे सकते हैं, और ये नज़रिए की बात है. बिखरा हुआ अतीत इसे हाइप इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि ये हाइप अपने उफ़ान पर थी, जब टेक के बूते पर चलने वाली ये कंपनियां पहली बार पब्लिक हुईं. इसी विषय पर SBI म्यूचुअल फ़ंड में इक्विटी के फ़ंड मैनेजर दिनेश बालाचंद्रन ने कहा था: "नए ज़माने के शेयरों को लेकर बहुत ज़्यादा क्रेज़ था, और लोग कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार थे. उस लेवल पर मेरे लिए सुरक्षा की कोई गुंजाइश नहीं थी.' उसके बाद असलियत से सामना हुआ. एक्सचेंज पर लिस्टिड होने के एकदम बाद इन कंपनियों को सामूहिक गिरावट का सामना करना पड़ा, और निवेशकों का बड़ा पैसा ग़ायब हो गया. लेकिन ये तब की बात थी. गर्म लोहे पर हथौड़ा एक आदमी का नुक़सान दूसरे आदमी का मुनाफ़ा था, और इस मामले में, वो म्यूचुअल फ़ंड ही थे जिन्होंने इन पिटे हुए शेयरों में निवेश करना शुरू किया. अब फ़ास्ट-फ़ॉर्वर्ड करके मौजूदा समय में आते हैं, जहां इन्होंने अपनी चमक बनाए रखी है. चाहे ज़ोमाटो हो, पॉलिसीबाज़ार ( PB Fintech के रूप में लिस्टिड) है या पेटीएम ( One97 Communications ), फ़ंड हाउस इन्हें भुनाने लगे
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