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थोड़ा ये और थोड़ा वो वाला फ़ंड

बहुत सारे इक्विटी निवेशकों को एसेट एलोकेशन तभी याद आता है जब इक्विटी मार्केट में कोई बड़ी हलचल हो जाए. यहां एक सीधा और असरदार तरीक़ा दिया जा रहा है जो हमेशा काम करता है.

थोड़ा ये और थोड़ा वो वाला फ़ंडAnand Kumar

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पिछले कुछ साल में, हमने बड़ी और नाटकीय घटनाओं का एक अंतहीन सिलिसला देखा है. इन घटनाओं ने इक्विटी निवेशकों के लिए अनिश्चित और अस्थिर माहौल बना दिया है. ये सारी घटनाएं भले ही ब्लैक स्वान जैसी लगती हैं, पर निवेशकों को अपने-आप को बचाने के लिए जिस नज़रिए की ज़रूरत है वो सीधा-सादा भी है और जाना-पहचाना भी.

अजीब बात है कि कुछ निवेशकों के लिए इन घटनाओं से उपजी बेचैनी लंबे समय से चले आ रहे रुझानों में कुछ समय के उलटफेर ने बढ़ा दी है. आप में से जो लोग मुझे लंबे समय से पढ़ते रहे हैं उन्होंने फ़िक्स्ड इनकम वाले निवेशों पर भारतीयों की पारंपरिक निर्भरता पर मेरे विचार पढ़े ही होंगे कि भारत में लोग आदतन पब्लिक प्रॉविडेंट फ़ंड (PPF), बैंक और पोस्ट ऑफ़िस डिपॉज़िट को ही अपनी बचत के लिए चुनते हैं. मैं कई बार, लॉन्ग-टर्म सेविंग के कुछ हिस्से को इक्विटी या इक्विटी वाले म्यूचुअल फ़ंड्स में रखने की अहमियत पर ज़ोर देता रहा हूं.

हालांकि, बचत करने वाले युवाओं के एक वर्ग में इक्विटी निवेश को लेकर अतिउत्साह की प्रवृत्ति उभर रही है. जो युवा अपने निवेश की शुरुआत इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स से करते हैं और जिन्हें शुरुआत में ही अच्छे नतीजे मिलने लगते हैं, वे अक्सर अपने पूरे पोर्टफ़ोलियो को इक्विटी में बदल देते हैं, कभी-कभी तो शत प्रतिशत तक. अब, ये कोई घातक ग़लती नहीं है, लेकिन फ़रवरी 2020 के बाद से दुनिया भर में होने वाली गंभीर घटनाओं का सिलसिला देखते हुए, कुछ संयम बरतने की ज़रूरत है. जैसे-जैसे महामारी कम हुई, तो पहले यूरोप और अब इज़रायल और आसपास के देशों में संघर्ष बढ़ गया, जिसका नतीजा वैश्विक मुद्रास्फीति, मुद्रा में उतार-चढ़ाव, अस्थिर शेयर बाज़ार, केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों में बढ़ोतरी, पश्चिमी प्रतिबंध, चीन की बीमारी/ आर्थिक संघर्ष, घटती मांग और मंदी का संकट मंडराने लगा है. इस मंदी ने सब पर असर डाला है. इन घटनाओं ने कई निवेशकों को - यहां तक कि अनुभवी निवेशकों को भी - थोड़ा बेचैन कर दिया है, और वो सोचने लगे हैं कि क्या निवेश रणनीति में कोई बदलाव किए जाने की ज़रूरत है.

इस साइकल की शुरुआत में, महामारी के शुरुआती रिस्पॉन्स के तौर पर इक्विटी में भारी बिकवाली देखी गई, लेकिन बाद में बाज़ार में उतार-चढ़ाव के कारण शॉर्ट-टर्म भविष्यवाणियों और सामान्य घबराहट की वजह से अनियमित निवेश हुआ. लगातार आने वाले संकटों ने पारंपरिक निवेश के संतुलन में रुकावट पैदा की, और कम से कम इस रुकावट का आभास तो दिया ही. इसके अलावा, दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में फ़िक्स्ड इनकम रिटर्न से ऊंची मुद्रास्फ़ीति की दरों ने नई चुनौतियां पेश की हैं.

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ऐसे समय में पारंपरिक सलाह ये होगी कि आप अपने एसेट एलोकेशन एडजस्ट करें, ये ऐसी रेकमेंडेशन है जिसके पक्ष में मैंने अक्सर बात की है. इसका सिद्धांत सीधा है: अगर आपके पोर्टफ़ोलियो का बैलेंस गड़बड़ा गया है, तो इसे ठीक करें. लेकिन एक आम व्यक्ति के लिए ये कहना जितना आसान है, करना उतना आसान नहीं है. टैक्स से जुड़ी बातों को लेकर किसी का पोर्टफ़ोलियो ट्रैक और एडजस्ट करना मुश्किल काम है, क्योंकि इक्विटी और डेट मार्केट असंगत दरों पर बढ़ रहे हैं और हर लेनदेन पर टैक्स का असर होता है.

तो, निवेशकों के लिए व्यावहारिक और असरदार समाधान क्या है? कुल मिला कर, व्यावहारिक रूप से किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसा कोई तर्क नहीं है कि उनके पास कोई फ़िक्स्ड इनकम वाला निवेश न हो. एकमात्र सवाल ये है कि किस तरह का हो. ऐसे व्यक्तियों के लिए जो इसे सरल रखना पसंद करते हैं, उन्हें उनकी ज़रूरत की पूरी चीज़ हाइब्रिड म्यूचुअल फंड के भीतर मिल सकती है. हालांकि, ये पूरी निवेश रणनीति नहीं है - इसमें और भी बहुत कुछ शामिल है. सुरक्षा और पहुंच पक्की करने के लिए अगले तीन से पांच साल के भीतर ज़रूरत की किसी भी रक़म को फ़िक्स्ड इनकम में सुरक्षित किया जाना चाहिए. इस सुरक्षित तरीक़े और हाइब्रिड फ़ंड्स के बीच एलोकेशन से, निवेशक कम समय और थोड़ी कोशिशों में ही अपने एसेट एलोकेशन की ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं - और हो सकता है ज़्यादातर लोगों के लिए ऐसा करना काफ़ी हो.

मैं समझता हूं कि हाइब्रिड फ़ंड्स में निवेश की ख़ूबियों को समझने में एक तरह की कमी है. इक्विटी फ़ंड या डेट फ़ंड अपने आप में सरल तरीक़े हैं. देखा जाए तो उनका एक ही मक़सद है - पहला ज़्यादा रिटर्न के लिए है और दूसरा ज़्यादा सुरक्षा के लिए. हाइब्रिड फ़ंड में थोड़ा सा ये और थोड़ा सा वो होता है. उनके पास कभी भी बेस्ट रिटर्न नहीं होता, और उनके पास कभी भी सबसे ज़्यादा सुरक्षा नहीं होती. इसके बावजूद, वो ज़्यादा लोगों के लिए, ज़्यादा समय के लिए मायने रखते हैं. ये कुछ ऐसा है जिसकी ख़ूबी समझने के लिए थोड़ी कोशिश करनी पड़ती है.

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हाइब्रिड फ़ंड्स की वास्तविक दुनिया में व्यावहारिकता तब स्पष्ट हो जाती है जब किसी आम निवेशक की मुश्किलों - समय, समझ और उतार-चढ़ाव झेलने की क्षमता - के बारे में सोचा जाता है. हाइब्रिड फ़ंड इन लोगों के लिए, 'सेट-एंड-फ़ॉरगेट' की स्ट्रेटजी पेश करते हैं जिसके लिए रोज़-रोज़ सोचने की ज़रूरत नहीं होती. ये निवेश का एक ऐसा तरीक़ा है जो बाज़ार के साथ निवेशक के जुड़ाव को आसान बनाता है और फ़रवरी 2020 से हमने जिस तरह का माहौल देखा है, उससे जुड़े तनाव को भी कम करता है.

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