
आर जानकीरमन फ़्रैंकलिन टेंपलटन एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) के डिप्टी CIO और सीनियर पोर्टफ़ोलियो मैनेजर (इक्विटीज) हैं और साल 2008 से इस फ़ंड हाउस के स्मॉल और मिड-कैप फ़ंड मैनेज कर रहे हैं. उन्होंने न सिर्फ 2008 की ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस का सामना किया, बल्कि उन्होंने अपने ही देश में 2020 की डेट क्राइसिस को भी देखा. उनके लंबे अनुभव को देखते हुए, हमने उनकी निवेश रणनीतियों, मिड और स्मॉल-कैप सेक्टर की वर्तमान स्थिति और फ़्रैंकलिन इंडिया प्राइमा फ़ंड के प्रदर्शन को बेहतर बनाने की योजना के बारे में जानने के लिए उनसे ख़ास बातचीत की. इस बातचीत के संपादित अंश…
आप ख़ुद को एक निवेशक के रूप में कैसे देखते हैं? किस प्रकार के स्टॉक्स या मार्केट आपको आकर्षित करते हैं?
सामान्य रूप से, मैं ख़ुद को एक सतर्क निवेशक के रूप में देखता हूं. मेरा लक्ष्य हमेशा अच्छी क्वालिटी वाले बिज़नस और टिकाऊ कंपाउंडर्स में निवेश करके रिटर्न कमाने का रहा है. जब भी मैं स्टॉक्स का एनालिसिस करता हूं तो कुछ ऑपरेशनल फ़ाइनेंशियल पैरामीटर्स का ध्यान रखता हूं. लेकिन इस तरह की रणनीति में, स्टॉक्स चुनने के अच्छे मौक़े बाज़ार में मंदी (बियर मार्केट्स) के दौरान ही मिलते हैं. यही वो वक़्त होता है (जैसे कि 2012-13 और 2018-19 का) जब अच्छी क्वालिटी वाले बिज़नस अपनी आंतरिक वैल्यू से नीचे कारोबार कर रहे होते हैं.
आप अपने पोर्टफ़ोलियो में किसी स्टॉक कब सेल करते हैं?
मैं स्मॉल-कैप में काफ़ी ज़्यादा काम करता हूं, और अच्छी क्वालिटी वाले बिज़नस और मिड और स्मॉल-कैप स्टॉक्स के वैल्युएशन में अच्छा उछाल देखने को मिला था. इस कारण, इन बिज़नस के वैल्युएशन को लेकर हमारी टीम टॉलरेंस लेवल भी बढ़ा था. ब्याज़ की लागत का कम होना भी इस उम्मीद के पीछे एक कारण था. दरअसल, उचित वैल्युएशन मीट्रिक का पता लगाने में ब्याज़ और पूंजी की लागत (कॉस्ट ऑफ़ कैपिटल) अहम भूमिका निभाती हैं. इसके बावज़ूद, मुझे लगता है कि कई मामलों में वैल्युएशन हमारी उम्मीदों पर ख़रा नहीं उतर पाया है.
तो हमने इस स्थिति से निपटने के लिए स्टैंडर्ड डेविएशन जैसी रणनीति का सहारा लिया. यदि कोई बहुत अच्छी क्वालिटी वाला बिज़नस है जिसमें अगले दो या तीन वर्षों तक अच्छी कमाई की संभावना है, तो हम उस बिज़नस की वैल्युएशन के लगभग वन-सिग्मा स्टैंडर्ड डेविएशन तक अपनी पोजिशन बनाए रखते हैं. और जब ये डेविएशन और आगे बढ़ने लगता है, तो मेरे हिसाब से यहीं से किसी भी निवेशक के लिए चीज़ें ख़राब होनी शुरू हो जाती हैं. ऐसी स्थिति आने पर हम भी इन शेयरों में अपना एक्सपोज़र कम करना शुरू कर देते हैं.
मतलब, एक स्टैंडर्ड डेविएशन के बाद हम अपना एक्सपोज़र कम करना शुरू कर देते हैं.
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आपने फ़रवरी 2008 में ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के वक़्त मिड और स्मॉल-कैप फ़ंड मैनेज करना शुरू किया था. आपने इस दौरान कौन से सबक़ सीखे?
उदाहरण के लिए, अगर आप टॉप के आधे से ज़्यादा मिड-कैप को देखें, तो बिज़नस की क्वालिटी, प्रदर्शन में स्थिरता और इन कंपनियों के बारे में अच्छी-ख़ासी रिसर्च और जानकारी का उपलब्ध होना अच्छी बात है. मुझे लगता है कि ये ज़्यादातर लार्ज-कैप कंपनियों जितना ही अच्छा है.
और अगर 2018 की तुलना में 2023 के स्मॉल-कैप की भी बात करें, तो इनके प्रमोटर्स के नज़रिये में अच्छा-ख़ासा फ़र्क़ नज़र आया है. मुझे लगता है कि स्मॉल-कैप कंपनियों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है. इनके प्रमोटर्स के लिए मार्केट कैप बहुत मायने रखती है, जबकि पहले ऐसा कम ही नज़र आता था.
और मार्केट कैप को लेकर आए इस बदलाव के कारण, स्मॉल-कैप में ट्रांसपरेंसी और कम्युनिकेशन में भी इज़ाफ़ा हुआ है. हालांकि, रिसर्च क्वालिटी का स्तर अभी भी बहुत अच्छा नहीं है. लेकिन मैं ये कह सकता हूं कि कंपनियां अब निवेशकों से बात करने और उनके साथ जानकारी साझा करने के मामले में संजीदा रहती हैं.
स्मॉल-कैप बेशक बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं, पर मैं फिर भी कहूंगा इनके बिज़नस की औसत क्वालिटी में इज़ाफ़ा हुआ है.
और चूंकि हम मिड और स्मॉल-कैप के बारे में बात कर रहे हैं, क्या आपको लगता है कि मौजूदा वैल्युएशन चिंता में डालने वाले स्तर पर हैं?
सभी मिड और स्मॉल-कैप को एक ही नज़रिये से (महंगे) नहीं देखा जा सकता. हमारे पास मिड और स्मॉल-कैप दोनों में उचित वैल्युएशन के ठीक-ठाक मौक़े अभी भी उपलब्ध हैं. कोई भी निवेशक उन ज़रूरत से ज़्यादा वैल्युएशन वाले स्टॉक्स को अनदेखा करके भी अपना एक बढ़िया और प्रभावी पोर्टफ़ोलियो बना सकता है.
दूसरा फ़ैक्ट ये भी है कि मैं वैल्युएशन को अर्निंग ग्रोथ के साथ जोड़कर देखना पसंद करता हूं.
पिछले दशक में हमने तुलनात्मक रूप से मामूली अर्निंग ग्रोथ देखी, जिसका एक कारण ये भी था कि अर्थव्यवस्था के साइक्लिकल भाग- रियल एस्टेटऔर इंडस्ट्रियल कैपेक्स काम नहीं कर रहे थे.
मुझे लगता है कि इन दोनों में पिछले दो वर्षों के दौरान सुधार हुआ है, जिसका मतलब है कि आने वाले तीन वर्षों में इनकी स्थिति काफ़ी बेहतर होगी; और इसका असर ख़ासकर मिड और स्मॉल-कैप अर्निंग ग्रोथ भी नज़र आएगा. अगर इस बेहतर अर्निंग ग्रोथ की संभावना को ध्यान में रखें, तो क्या मौजूदा हाई वैल्युएशन को सही ठहराया जा सकता है? इसका जवाब शायद 'हां' है.
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फ़्रैंकलिन डेट फ़ंड क्राइसिस के कारण लोगों ने आपके इक्विटी फ़ंड से भी विड्रॉल करना शुरू कर दिया था.
हमारी टीम में कुछ बदलाव हुए थे. दो पोर्टफ़ोलियो मैनेजर्स और लगभग चार एनालिस्ट्स की हमारी टीम से विदाई हो गई थी.
अब हमारे पास रिसर्च के लिए 11 से ज़्यादा लोग हैं. फ़्रैंकलिन के साथ काम करते हुए उनका औसत अनुभव लगभग पांच या छह साल का है. इस औसत में वे लोग भी शामिल हैं जो पिछले दो वर्षों में हमसे जुड़े हैं. इसलिए, मुझे लगता है कि कुछ हद तक लीडर्स के सकारात्मक रवैये की वज़ह से टीम को 2020-21 के दौरान ज़्यादा मुश्किल दौर का सामना नहीं करना पड़ा.
बेशक हमने रिडेम्शन देखा और उम्मीद के मुताबिक़ इनफ़्लो नहीं आए. लेकिन, देर से ही सही, अब हमें हाल ही में कुछ इन्फ़्लो दिखने शुरू हुए हैं.
प्राइमा फ़ंड के प्रदर्शन पर आपका क्या कहना है?
एक बात सच है कि मैंने कुछ ख़राब प्रदर्शन करने वाले शेयरों में ज़रूरत से ज़्यादा समय तक पोजिशन बनाए रखी.
दूसरी बात ये है कि अगर हम अतीत पर ग़ौर करें, तो भले ही प्राइमा का प्रदर्शन पूरे साइकल के दौरान इंडेक्स की तुलना में काफ़ी संतोषजनक रहा है, लेकिन आम तौर पर सपाट या थोड़े कमजोर बाजार में अच्छा प्रदर्शन करता है. इसलिए, थोड़ा ज़्यादा सतर्क रणनीति के कारण ये एक बेहद मजबूत बाजार में पिछड़ जाएगा.
इसीलिए, मैं कहूंगा कि मार्केट के मजबूत दौर के बाद हमारे प्रदर्शन का आकलन करना उचित नहीं है; हो सकता है कि एक बार जब हम साइकल पूरा कर लें, तो एक सही तस्वीर सामने आ सकती है.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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