
पिछले लेख में हमने 60-70 साल की उम्र वालों की ज़रूरत के हिसाब से बनाई इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटजी के बारे में बात की थी. इस बार हम जानेंगे, 40 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए अपने उत्तराधिकारी को लेकर प्लानिंग करना कितना ज़रूरी है. और ये बात सभी के लिए है, उनके लिए भी, जो बहुत अमीर नहीं हैं. 72 साल के आनंद गायकवाड़ अब रिटायर हो चुके हैं और उनके पास अच्छी-ख़ासी पूंजी जमा है. रिटायरमेंट के बाद वो शांति से अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं. लेकिन इस शांति और संतोष के बीच उन्हें एक चिंता हमेशा रहती है कि उनके न रहने पर, उनके परिवार का भविष्य क्या और कैसा होगा. पिता के निधन के बाद संपत्ति को लेकर हुए पारिवारिक विवाद की कड़वी यादें अब भी उनके ज़ेहन में ताज़ा हैं. श्री गायकवाड़ की कई साल के दौरान जोड़ी गई संपत्ति एक अच्छे से सजी हुई गई थाली जैसी है: म्यूचुअल फ़ंड का एक बड़ा पोर्टफ़ोलियो, उनका अपना मकान और पुश्तैनी ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा. इसलिए, इस मामले में वे अपने दोस्त अनूप की मदद लेते हैं क्योंकि दोस्त होने के साथ-साथ अनूप एक अनुभवी वेल्थ एडवाइज़र भी हैं. आनंद: अनूप, तुम जानते हो कि मैंने अपनी संपत्ति बड़ी मेहनत और सोच-समझकर खड़ी की है. पर मुझे चिंता है कि जब मैं नहीं रहूंगा तो मेरे परिवार का क्या होगा... अनूप: मुझे ख़ुशी है कि तुम एस्टेट प्लानिंग की सोच रहे हो. इंडिया में लाखों करोड़ रुपये लावारिस हालत में सिर्फ़ इसलिए पड़े हैं क्योंकि कई लोगों को अपने परिवार की विरासत या संपत्ति के बारे में पता ही नहीं है. ये अच्छी बात है कि तुम्हारा पैसा इस लावारिस हालत में नहीं रहेगा. तुम्हारे (आनंद गायकवाड़ के) मामले में हिंदू उत्तराधिकार क़ानून, 1956 के तहत बंटवारा होगा. बौद्ध, जैन और सिख भी इस क़ानून के हिसाब से चलते हैं. आनंद: इस क़ानून के तहत मेरी संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा? अनूप: ये क़ानून थोड़ा पेचीदा है. प
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