
पिछले साल अंतरराष्ट्रीय फ़ंड फ़ायदे का सौदा रहे. हालांकि, सफ़र आसान नहीं था. पहले तो साल 2022 में इन फ़ंड्स का प्रदर्शन ख़राब रहा, और फिर 2023 की शुरुआत में टैक्स नियमों के बदलावों से निवेशकों को एक बड़ा झटका लगा. लेकिन इन मुश्किलों के बावजूद, जिन लोगों ने हमारी सलाह मानी और अंतरराष्ट्रीय फ़ंड में निवेश बनाए रखा, उन्हें सब्र का मीठा फल तगड़े रिटर्न के तौर पर मिला. पर आज जब, एक बड़ी रैली पहले ही आ चुकी है और कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मंदी की चपेट में हैं, तो क्या आपको अंतरराष्ट्रीय फ़ंड में निवेश जारी रखना चाहिए? इस लेख में हम इस कैटेगरी को लेकर बात कर रहे हैं और ये भी बता रहे हैं कि आगे क्या करना चाहिए. दमदार प्रदर्शन साल 2023 ग्लोबल इक्विटी मार्केट के लिए काफ़ी हद तक फ़ायदेमंद रहा. कई देशों में महंगाई कम हुई, तो इस साल बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ब्याज़ दरों में कटौती कर सकती हैं, जिससे निवेशकों के मन में उम्मीद बनी हुई है. ख़ास तौर से अमेरिका ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था कई मुश्किलों के बावजूद न सिर्फ़ मज़बूत हुई है, बल्कि निवेशकों के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद भी साबित हुई है. नैस्डैक 100 इंडेक्स ने 2023 में दमदार 55 फ़ीसदी रिटर्न दिया, जो हमारे घरेलू BSE स्मॉलकैप इंडेक्स के (उसी अवधि में) 47.5 फ़ीसदी रिटर्न से भी ज़्यादा है. पर ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है. ब्रिटेन और जापान की अर्थव्यवस्थाएं पिछली दो तिमाहियों में काफ़ी ख़राब दौर से गुज़री हैं और आधिकारिक तौर पर मंदी की चपेट में हैं. चीनी (Chinese) इक्विटी भी दबाव झेल रही है. इसलिए, अंतरराष्ट्रीय नज़रिए से, फ़ाइनेंशियल मुश्किलें अभी ख़त्म नहीं हुई हैं, यहां तक कि अमेरिका के लिए भी नहीं. निवेश की रफ़्तार लगातार घट रही है विदेशी रेमिटेंस की लिमिट बढ़ाने को लेकर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की ओर से अभी भी कोई अपडेट नहीं आया है. इसके अलावा, पिछले साल के बजट में अंतरराष्ट्रीय फ़ंड के इंडेक्सेशन फ़ायदों को हटाने से कैटेगरी का इनफ़्लो (निवेश की रफ़्तार) घटा है. जैसा कि ग्राफ़ में साफ़ दिख रहा है, टैक्सेशन के झटके के बाद कैटेगरी का इनफ़्लो मोटे तौर पर नेगेटिव बना
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