
PGIM इंडिया म्यूचुअल फ़ंड के चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर (CIO) विनय पहाड़िया पिछले 17 साल से म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं. वे इस फ़ंड हाउस के 9 इक्विटी और हाइब्रिड प्लान में ₹20,300 करोड़ का एसेट मैनेज करते हैं.
जिन इक्विटी प्लान को वे मैनेज करते हैं उनमें से PGIM इंडिया स्मॉल कैप फ़ंड और PGIM इंडिया मिडकैप अपॉर्चुनिटीज़ फ़ंड को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जो पिछले एक साल में 31 स्मॉल-कैप और 38 मिड-कैप फ़ंड्स की लिस्ट में सबसे नीचे रहे हैं.
इस इंटरव्यू में उन्होंने फ़ंड मैनेजमेंट स्तर पर किए गए बदलावों, तेज़ी और मंदी वाले मार्केट से मिली सीख और फ़ंड के ख़राब प्रदर्शन के कारणों के बारे में बात की. इस इंटरव्यू के संपादित अंश नीचे दिए जा रहे हैं:
आप 20 साल से भी ज्यादा वक़्त से फ़ाइनेंस इंडस्ट्री में हैं. किस चीज़ ने इक्विटी सेगमेंट में आपकी रुचि जगाई?
मैं अपने परिवार में इन्वेस्टमेंट और मार्केट के उतार-चढ़ाव की बातें बचपन से ही सुनता आया हूं. पर मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इसमें अपना करियर बनाऊंगा. MBA की पढ़ाई के दौरान मुझे एहसास हुआ कि स्टॉक मार्केट में भी करियर है. MBA के पहले साल तक मेरे पास कोई साफ़ लक्ष्य नहीं था कि मैं कौन सी स्ट्रीम चुनूंगा. गर्मी के महीनों में दिए गए कुछ इंटरव्यू में से एक के दौरान मैंने अपने इंटरव्यू लेने वाले को बताया कि मुझे इक्विटी मार्केट में दिलचस्पी है. इसलिए, उन्होंने मुझे पीटर लिंच की किताब 'One Up on Wall Street' पढ़ने का सुझाव दिया. किताब में जो लिखा था उसमें मेरी गहरी दिलचस्पी थी. किताब ने इस बारे में मेरी आंखें खोल दीं कि निवेश क्या होता है और शेयरों के ऊपर-नीचे होने की वजह क्या है. बाद में, मैंने वॉरेन बफे़ और जोएल ग्रीनब्लाट के लेख भी पढ़े. पर मुझे लगता है कि लिंच की किताब ही वो असली ट्रिगर था जिसने मुझे इक्विटी मार्केट की तरफ़ खींचा.
2002 में आपका करियर शुरू हुआ और आपने शुरुआती दौर में ही तेज़ी वाले मार्केट और वैश्विक संकटों का सामना किया है (2007 में फ़ंड मैनेजमेंट शुरू किया था). उन अनुभवों से आपने क्या सीखा?
चाहे वो तेज़ी वाला मार्केट हो या मंदी वाला, दोनों अलग-अलग भावनाओं से जुड़े होते हैं और अलग तरह की सीख और समझ देते हैं. बुल मार्केट में लालच आप पर हावी हो जाता है. मैंने जाना कि बुल मार्केट में आपका अनुभव बेकार हो जाता है; यही आपका दुश्मन बन जाता है. आपके पास जितना कम अनुभव होगा, आपका प्रदर्शन उतना ही बेहतर होगा क्योंकि तब आप मैनेजमेंट की क्वालिटी, कंपनी या बिज़नस की क्वालिटी को नहीं देखते हैं. आप सिर्फ़ भविष्य पर ध्यान देते हैं. इसलिए, मैंने जो सबक़ सीखे, उनमें से एक ये है कि पूर्वाग्रहों को कम करना चाहिए और ज़रूरी जांच-पड़ताल कर लेनी चाहिए. बुल मार्केट में आप ज़रूरी जांच-पड़ताल को लेकर सावधानी नहीं बरतते हैं क्योंकि हर जगह से अच्छा रिटर्न मिलता है. मुझे लगता है कि ये बहुत बड़ी ग़लती है.
एक और सबक़ है कि शॉर्ट-टर्म ट्रेंड्स को ज्यादा तूल न दें. उदाहरण के लिए, शुरुआती इंफ्रास्ट्रक्चर बूम या पॉवर बूम (2006-08) के दौरान, ज़्यादातर लोग ये उम्मीद कर रहे थे कि थर्मल एनर्जी के लिए बिजली की डिमांड बहुत ज़्यादा बढ़ेगी. इसी तरह, IT बूम में लोगों ने सॉफ़्टवेयर बिज़नस में 100 फ़ीसदी ग्रोथ का अनुमान लगाया था. हमें याद रखना होगा कि पेड़ आसमान नहीं छू सकते. मुझे लगता है कि बुल मार्केट के दौर में ये कुछ बड़े सबक़ थे जो मैंने सीखे.
मंदी वाला मार्केट आपके लिए चुनौतियां और अवसर दोनों लेकर आता है, और मुझे लगता है कि ये निवेशकों के लिए एक मौक़ा लेकर आता है. बेयर मार्केट की चुनौतियां आप पर भावनात्मक रूप से ज़्यादा हावी रहती हैं क्योंकि तब आप अपनी कड़ी मेहनत की कमाई को मार्केट में दिन-ब-दिन घटते हुए देख रहे होते हैं, जो काफ़ी मुश्किल काम है. लेकिन ये एक ऐसा मार्केट होता है जहां आपको निवेश के बहुत ज़्यादा अवसर मिलते हैं क्योंकि लोग कंपनियों की वैल्यूएशन और शेयरों की सही क़ीमत को नज़रअंदाज कर रहे होते हैं. ऐसे वक़्त में कुछ भी काम नहीं कर रहा होता है और चाहे क़ीमत कुछ भी हो, लोग बस मार्केट से बाहर निकलने की सोचते हैं क्योंकि ये भावनात्मक रूप से बहुत चुनौती भरा दौर होता है. अगर मैं ख़ुद को किसी निवेशक की जगह रखकर देखूं, तो शायद मैं भी डर के मारे यही करता. लेकिन मुझे लगता है कि पेशेवर निवेशकों के रूप में, हम इस हलचल को नज़रअंदाज करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं. और मुझे लगता है कि मंदी के मार्केट से हम यही सीखते हैं.
आप अपने निवेश के स्टाइल को कैसे परिभाषित करेंगे? कौन से ख़ास स्टॉक या स्थितियां आपका ध्यान खींचती हैं?
पहले मैं दूसरे सवाल का जवाब दूंगा. मंदी के मार्केट ज़्यादा रोमांचक होते हैं क्योंकि इसमें आपको हमेशा वही मिलता है जो आप चाहते हैं, और इसके बाद अच्छे रिटर्न की संभावना ज़्यादा होती है. इसलिए, मंदी के मार्केट एक निवेशक के लिए बेहतरीन अवसर होते हैं. लेकिन, जैसा कि मैंने पहले बताया, इस मार्केट की अपनी चुनौतियां हैं. जहां तक मेरी इन्वेस्टमेंट फ़िलॉसफ़ी की बात हैं, ये कभी न रुकने वाली प्रक्रिया है; इसमें आप सीखते रहते हैं और अपनी फ़िलॉसफ़ी को नया आकार देते रहते हैं. उदाहरण के लिए, इस वक़्त हमने एक बहुत ही सीधी और आसान फ़िलॉसफ़ी अपनाई हुई है, जो कि भारतीय मार्केट के लॉन्ग-टर्म अध्ययन से भी साफ़ पता चलती है. हमने भारतीय मार्केट का 20-25 साल का लॉन्ग-टर्म अध्ययन किया है ताकि ये जाना जा सके कि किन टिकाऊ फ़ैक्टरों ने सबसे बेहतर रिटर्न दिया है. और ये फ़ैक्टर समय-समय पर या साइकिल (चक्र) के हिसाब से नहीं बदलते हैं. ये फ़ैक्टर टिकाऊ हैं और एक निवेशक इन्हें अपनाकर पोर्टफ़ोलियो बना सकता है. हमने रिसर्च के ज़रिए पता लगाया कि औसत से ज़्यादा मज़बूत ग्रोथ या कॉलिटी (रिटर्न ऑन इक्विटी) वाली कंपनियों ने लॉन्ग टर्म (तीन से पांच साल की अवधि) में मार्केट की तुलना में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है.
इससे ये पता चलता है कि हम किस फ़िलॉसफ़ी का पालन करते हैं. इसके अलावा, हम ये पक्का करना चाहते हैं कि हम पोर्टफ़ोलियो को डाइवर्सिफ़ाई करें और कंपनियों को लंबे समय तक होल्ड करें.
इसके अलावा, हम सिर्फ़ P/E मल्टीपल को नहीं देखते हैं क्योंकि P/E मल्टीपल चार फ़ैक्टरों का नतीजा होता है: फ़ॉरवर्ड अर्निंग ग्रोथ, फ़ॉरवर्ड रिटर्न ऑन इक्विटी, इंटरेस्ट रेट और अंडरलाइंग बिज़नस का जोख़िम. ये चारों फ़ैक्टर मिलकर हरेक कंपनी के लिए एक ख़ास मल्टीपल बनाते हैं; ये एक इंसान के फ़िंगरप्रिंट की तरह होता है. हर किसी का फ़िंगरप्रिंट अनोखा होता है. तो, इसी तरह, किसी विशेष समय पर हरेक बिज़नस का एक ख़ास मल्टीपल होता है. इसलिए, हमारा मक़सद ऐसे स्टॉक ख़रीदना होता है जिनकी क़ीमत उनकी वास्तविक क़ीमत से थोड़ी कम हो, और जो पांच साल की अवधि में ज़्यादा संभावना वाले हों. हमारे फ़ंड हाउस में लगभग 180 कंपनियां हैं जिनमें ये विशेषता है, यानी उनकी अर्निंग ग्रोथ और रिटर्न ऑन इक्विटी औसत से ज़्यादा बेहतर है. इस वक़्त हमारे पास इन सभी 180 कंपनियों के लिए उचित क़ीमतें हैं. मार्केट प्राइज़ के आधार पर, हम संभावित तेज़ी को देखते हैं. हम इन कंपनियों को पांच साल की अवधि में तब तक होल्ड करते हैं जब तक उचित क़ीमत मौजूदा मार्केट वैल्यू से कम होती है और तब बाहर निकल जाते हैं जब उचित क़ीमत मार्केट वैल्यू से ऊपर हो जाती है.
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आप लगभग एक साल से PGIM म्यूचुअल फ़ंड के साथ जुड़े हैं. क्या आपने रिसर्च या स्टॉक चुनने की प्रक्रिया में कोई बड़ा बदलाव किया है?
PGIM एक ऐसा फ़ंड हाउस है जिसने भारत में अपना ऑपरेशन शुरू करने के बाद से ग्रोथ एट रिज़नेबल प्राइज़ (GARP) फ़िलॉसफ़ी का पालन किया है. जब मैं इससे जुड़ा तो मेरा मक़सद ये पक्का करना था कि मैं इस निवेश प्रक्रिया में और निखार लाया जाए, ज़्यादा प्रमाण-आधारित निवेश प्रक्रिया अपनाई जाए, और इस कला का प्रदर्शन वैज्ञानिक आधार पर किया जाए. मैंने क्वालिटी में एक फ़िल्टर भी लगाया. हालांकि हमारी फ़िलॉसफ़ी ग्रोथ एट रिज़नेबल प्राइज़ है, पर हमने इसे क्वालिटी ग्रोथ एट रिज़नेबल प्राइज़ के रूप में अपनाया है. इसलिए हमने उस ज़रूरी क्वालिटी फ़िल्टर को शामिल किया, और हमने फ़ंड हाउस की हरेक कंपनी के लिए फ़ेयर वैल्यू फ़्रेमवर्क को भी शामिल किया. इसका मतलब ये है कि उचित क़ीमत पर ख़रीदने के लिए सिर्फ़ P/E मल्टीपल देखने के बजाय, हम हरेक कंपनी की फ़ेयर वैल्यू भी देखते हैं. इसलिए, मुझे लगता है कि मैं इस सारी प्रक्रिया को कड़ा करने का काम कर रहा हूं और अपना ज़्यादातर समय इसी पर ख़र्च कर रहा हूं.
आपके कुछ इक्विटी फ़ंड्स के प्रदर्शन में हाल ही में गिरावट देखी गई है. आप उनकी वापसी की क्या योजना बना रहे हैं?
मुझे लगता है कि हमारा प्रदर्शन कमज़ोर रहा है, ख़ासकर इस वित्तीय वर्ष में. इस साल का ट्रेंड वाकई में अनोखा रहा है जहां औसत से कम ग्रोथ और क्वालिटी वाली कंपनियों ने औसत से बेहतर ग्रोथ और क्वालिटी वाली कंपनियों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है.
हमने NSE 500 कंपनियों का भी वही अध्ययन किया, और हमने औसत से कम ग्रोथ और क्वालिटी वाली कंपनियों के मीडियन रिटर्न की तुलना, औसत से बेहतर ग्रोथ और क्वालिटी वाली कंपनियों से की. क़मज़ोर कंपनियों ने 65 फ़ीसदी रिटर्न दिया है, जबकि अच्छी क्वालिटी वाली कंपनियों ने 35 फ़ीसदी रिटर्न दिया है; ये अंतर 30 फ़ीसदी का है, जो कि काफ़ी ज़्यादा है. ऐसा पहली बार हुआ है क्योंकि इससे पहले हमने मार्केट के इन दोनों सेग्मेंट्स में इतना बड़ा अंतर कभी नहीं देखा. हालांकि ऐसे कई मौक़े आए हैं जब कम क्वालिटी वाली कंपनियों ने अच्छी कंपनियों से शायद 7-8 फ़ीसदी तक बेहतर प्रदर्शन किया.
इस साल अच्छी कंपनियों के ख़राब प्रदर्शन के नतीजे काफ़ी ज़्यादा मिले हैं. जैसा कि मैंने पहले भी कहा, हम मुख्य रूप से अच्छी क्वालिटी और ग्रोथ वाली कंपनियों पर निवेश करने पर फ़ोकस करते हैं. इस वजह से हमारे फ़ंड्स का प्रदर्शन कमज़ोर रहा है.
इसलिए, मुझे लगता है कि ये साल हमारी इन्वेस्टमेंट फ़िलॉसफ़ी के लिए ख़ासतौर से चुनौती भरा रहा है. और सेक्टोर के प्रदर्शन जैसे कुछ दूसरे फ़ैक्टर भी रहे हैं जिन्होंने प्रदर्शन पर असर डाला है. उदाहरण के लिए, हम कंज़्यूमर डिस्क्रिशनरी और फ़ाइनेंशियल सेक्टर में ओवरवेट रहे हैं, जिन्होंने मार्केट में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है. दूसरी ओर, जिन सेक्टरों ने अच्छा प्रदर्शन किया है, जैसे यूटिलिटीज़ और इंडस्ट्रियल्स, उनमें हम अंडरवेट रहे हैं. इसलिए, दोनों तरह की स्थिति ने हमारे प्रदर्शन पर असर डाला है. अब हमारे पास कमोबेश संतुलित पोर्टफ़ोलियो हैं. इसलिए, सेक्टर पोज़िशनिंग अब हम पर असर नहीं डालती है. हलांकि, स्टॉक चयन एक ऐसा विषय है जहां हम इस साल काफ़ी प्रभावित हुए.
मुझे लगता है कि ये चीज़ लंबे समय तक नहीं चल सकती और इसके पीछे एक आसान सी वजह है - स्टॉक की क़ीमत सिर्फ़ कमाई पर निर्भर करती हैं. आपको कुछ और डेटा की मदद से एक उदाहरण देता हूं: साल 2018 से 2023 के बीच, NSE 100, जो एक लार्ज-कैप बेंचमार्क है, ने 11 फ़ीसदी की अर्निंग ग्रोथ दी, और इंडेक्स ने भी 11 फ़ीसदी का रिटर्न दिया. इसी तरह, मिड और स्मॉल-कैप बेंचमार्क में लगभग 8 और 9 फ़ीसदी की अर्निंग ग्रोथ देखी गई, और रिटर्न भी लगभग अर्निंग ग्रोथ जितना ही था.
लेकिन इस वित्त वर्ष में क्या हुआ? हमने देखा है कि NSE 100 ने 45 फ़ीसदी का रिटर्न दिया (1 अप्रैल 2023 - 29 फ़रवरी 2024), जबकि अंडरलाइंग अर्निंग ग्रोथ सिर्फ़ 27 फ़ीसदी थी, यानी लगभग 20 फ़ीसदी का अंतर था.
मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स ने तो वाक़ई सभी हदें पार कर ली: उनकी अर्निंग में तो 25 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ पर मिड-कैप ने 57 फ़ीसदी और स्मॉल-कैप ने 70 फ़ीसदी का रिटर्न दिया. इसलिए, मुझे लगता है कि बेंचमार्क साफ़ तौर से पकड़ में आ जाएंगे; हमें भविष्य में अच्छा रिटर्न मिलेगा. आगे चलकर, कई कम क्वालिटी और ग्रोथ वाले स्मॉल कैप और मिड कैप स्टॉक्स में या तो टाइम करेक्शन होगा या प्राइज़ करेक्शन होगा. अच्छी क्वालिटी और ग्रोथ वाले मिड कैप, स्मॉल कैप और लार्ज कैप स्टॉक्स अभी भी उचित वैल्यूएशन पर उपलब्ध हैं.
क्या आपको लगता है कि मार्केट के मिड- और स्माल कैप सेगमेंट्स में एक बबल बना हुआ है?
हमारा मानना है कि कम क्वालिटी और ग्रोथ वाले स्माल और मिड-कैप शेयरों में छोटे बबल बन रहे हैं. ऐसा ही एक दूसरा सेगमेंट नई लिस्ट हुई इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग (IPO) कंपनियां भी हैं. तीसरा, कुछ पब्लिक सेक्टर कंपनियां है, जो अपनी अंडरलाइंग अर्निंग से काफ़ी आगे निकल गई हैं. चौथी हैं रियल एस्टेट कंपनियां, ख़ासकर रेज़िडेंशियल रियल एस्टेट कंपनियां. पांचवां इंडस्ट्रियल और कैपिटल गुड्स सेगमेंट है, जिसमें रेलवे सेगमेंट की कंपनियां भी शामिल हैं. आख़िरी, माइक्रो-कैप और स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज़ (SME) में भी बबल बना हुआ है. तो, ये विशेष क्षेत्र हैं जहां हमें लगता है कि एक ख़तरे का संकेत है और बड़े नुक़सान की संभावना है.
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