फ़र्स्ट पेज

वैल्यू, तेज़ी और मंदी

तेज़ी के बाज़ार में समझदारी और संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत

वैल्यू, तेज़ी और मंदीAnand Kumar

back back back
6:32

भारतीय शेयर मार्केट में लगातार चल रही तेज़ी को देखते हुए, मैं वैल्यू इन्वेस्टिंग के उन सिद्धांतों के बारे में सोचने से ख़ुद को रोक नहीं पा रहा हूं, जिन्होंने तीन दशकों से ज़्यादा एक विश्लेषक और लेखक के तौर पर मेरे काम की दिशा तय की है. किसी भी सुलझी हुई बातचीत में, शायद ही कोई ये साबित करने की कोशिश करता है कि स्टॉक की क़ीमतों के ऊपर-नीचे होने की वजह क्या हैं. लगता है मौजूदा ऊंचा वैल्युएशन लोगों को अचरज में डाल रहा हैं और उनकी चिंताएं बढ़ी हुई हैं. आज, वैल्यू इन्वेस्टिंग के शाश्वत सिद्धातों को याद रखना और उनकी तरफ़ लौटना पहले से कहीं ज़्यादा अहम हो गया है. मुझे वैल्यू इन्वेस्टिंग की सबसे सम्मानित आवाज़ों में से एक, हेज फ़ंड मैनेजर, सेथ क्लारमैन का कालातीत ज्ञान याद आ रहा है.

मैंने हाल ही में क्लारमैन का वो पत्र दोबारा पढ़ा जो वैश्विक वित्तीय संकट के तुरंत बाद 2009 के अंत या 2010 की शुरुआत में उन्होंने निवेशकों को लिखा था. उनका नज़रिया और सबक़ आज भी बड़ी अहमियत रखते हैं. हालांकि मार्केट की स्थिति इसके ठीक उलट है. मुझे वैल्यू इन्वेस्टिंग पर क्लारमैन का नज़रिया हमेशा बहुत समझदारी भरा लगा है, मैं इसे एक तरह की आनुवंशिक प्रवृत्ति की तरह देखता हूं. बरसों के अपने अनुभव में, मैंने वैसी ही घटनाएं देखी है जिसका ज़िक्र उन्होंने किया है - कुछ निवेशक वैल्यू इन्वेस्टिंग के सिद्धांतों को तुरंत समझ लेते हैं, जबकि कुछ दूसरे उन्हें समझने या स्वीकार करने में संघर्ष करते हैं.

ये भी पढ़िए - 2008 क्रैश के सही और ग़लत सबक़

ये दिखाता है कि निवेश को अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान के साथ मिला कर देखने की क्लारमैन की समझ कितनी सही है. एक तरफ़, हमारे पास "आसान" वाला हिस्सा है: मूल्य का विश्लेषण. इसमें फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट का गहरा अध्ययन, बिज़नस के मॉडल को समझना और भविष्य में कैश फ़्लो का अनुमान शामिल होता है. समय के साथ इन बातों को सीखा और पारंगत हुआ जा सकता है.

लेकिन फिर एक 'मुश्किल' वाला हिस्सा है जिस पर क्लारमैन ज़ोर देते हैं: व्यक्तिगत मनोविज्ञान. इसे लेकर अनुभवी से अनुभवी निवेशक भी लड़खड़ा जाते हैं. आपको कितना निवेश करना चाहिए? मार्केट में उतरने का सही समय क्या है? क्या बेहतर मौक़ों का इंतज़ार करना चाहिए या थोड़ा-थोड़ा करके निवेश जारी रखना चाहिए? ये सवाल हर निवेशक को परेशान करते हैं, और अक्सर इनके जवाब स्प्रेडशीट या मार्केट के आंकड़ों में नहीं बल्कि हमारे अपने मन से जुड़े होते हैं.

ये भी पढ़िए - कैटेगरी बदलने वाले निवेशक

2009 का क्लारमैन का पत्र क़ीमती सबक़ देता है जो ख़ासतौर से आज के ऊंचे वैल्युएशन वाले माहौल में बहुत मायने रखता है. इसके सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है, कंज़रवेटिव रहना. उन्होंने बताया, "कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि निवेशकों को संभावित मुनाफ़ा के आख़िरी डॉलर तक कमाने की कोशिश करनी चाहिए; रिटर्न की चाहत को रिस्क पर कभी हावी नहीं होने देना चाहिए." संतुलित रहना और सतर्कता बनाए रखने से संकट के दौरान हम अपनी सोच सधी हुई रख सकते हैं और निवेश के नए मौक़ों पर ध्यान दे सकते हैं, जबकि दूसरों का ध्यान भटक सकता है यहां तक कि वो अपना निवेश भी बेचने पर मजबूर हो जाते हैं.

क्लारमैन से सीखने के लिए एक और अहम सबक़ है और वो है रिस्क और क़ीमत के आपसी संबंध को समझना. उन्होंने चतुराई से कहा, "रिस्क किसी निवेश में नहीं होता; ये हमेशा अदा की गई क़ीमत के अनुपात में होता है." ये एक महीन, मगर महत्वपूर्ण अंतर है जिसे कई निवेशक अनदेखा कर देते हैं. इसी तरह, हमें ये पहचानना चाहिए कि अनिश्चितता और रिस्क एक जैसे नहीं हैं. क्लारमैन का तर्क है कि बहुत ज़्यादा अनिश्चितता का दौर अक्सर क़ीमतों को ऐसे स्तर पर ले जाता है जो सिक्योरिटीज़ को कम रिस्क वाला निवेश बना देता है. और, आज की स्थिति ऐसी ही है. लगातार बढ़ते स्टॉक हर चीज़ को रिस्की बना देते हैं.

उस समय, क्लारमैन ने सलाह दी थी, "आपको नीचे जाते समय ख़रीदना चाहिए. वापस उठने की तुलना में नीचे जाते समय मात्रा बहुत ज़्यादा होती है और ख़रीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बहुत कम होती है." फिर से देखिए कि क्या आज की परिस्थिति के हिसाब से हमें इसी तर्क को उलट कर नहीं देखना चाहिए?

ये भी पढ़िए - आप किसी इन्वेस्टमेंट प्रोफ़ेशनल से बेहतर हैं

इन सिद्धांतों को मौजूदा भारतीय बाज़ार पर लागू करने के लिए एक नाज़ुक संतुलन की ज़रूरत है. आज हम जो ऊंचा वैल्युएशन देख रहे हैं, उसके लिए सावधानी से वैल्यू इन्वेस्टिंग के लेंस से विश्लेषण किया जाना चाहिए. निवेश के मौक़े मिल सकते हैं, लेकिन हमें सोच-समझ कर उन पर अमल करना चाहिए, हमेशा उन बुनियादी सिद्धांतों के बारे में सोचना चाहिए जो अनगिनत मार्केट साइकिल में वैल्यू इन्वेस्टरों को रास्ता दिखाते हैं.

लंबे समय का नज़रिया बनाए रखना ज़रूरी है, ख़ासकर तेज़ी के समय में. मार्केट चढ़ना जारी रख सकते हैं, लेकिन इतिहास ने हमें बार-बार दिखाया है कि वैल्युएशन अंततः अपने औसत पर वापस आ जाता है. वैल्यू इन्वेस्टर के तौर पर, हमारा काम अनुशासित और धैर्यवान बने रहना, और अपने निवेश के आंतरिक मूल्य पर ध्यान केंद्रित करना है, न कि थोड़े समय में आने वाले मार्केट के उछालों में फंसना है.

वैल्यू इन्वेस्टंग के स्वभाव को समझकर, निवेश का विश्लेषण और व्यक्तिगत मनोविज्ञान, इनके दोहरे पहलुओं को पहचानकर, और पिछली मुश्किलों से सीखे गए सबक़ को लागू करके, हम बेहद चुनौती भरे बाज़ार में भी बच सकते हैं. जैसा कि हम भारतीय मार्केट को नई ऊंचाइयों पर चढ़ते हुए देख रहे हैं, आइए क्लारमैन की समझदारी याद रखें: सच्ची वैल्यू मार्केट की क़ीमतों में नहीं बल्कि उन व्यवसायों के बुनियादी मूल्य में है जिनमें हम निवेश करते हैं. तेज़ उछाल वाला मार्केट बिज़नस की बुनियादी बातों से उतने ही दूर हैं जितने क्रैश करते हुए मार्केट होते हैं.

ये भी पढ़िए - निवेश की शुरुआत करने वाले की यात्रा

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

20% रिटर्न, हर महीने ₹1 लाख: क्या ऐसी उम्मीद लगाना सही है?

पढ़ने का समय 6 मिनटअभिषेक राणा

मिडिल ईस्ट में युद्ध और असर आपकी जेब पर

पढ़ने का समय 6 मिनटउदयप्रकाश

‘मेरे पोर्टफ़ोलियो में 25 फ़ंड हैं. शुरुआत कहां से करूं?’

पढ़ने का समय 5 मिनटउदयप्रकाश

इमरजेंसी फ़ंड की समस्या

पढ़ने का समय 5 मिनटअमेय सत्यवादी

क्या आपका म्यूचुअल फ़ंड सच में आपके लिए काम कर रहा है?

पढ़ने का समय 5 मिनटअमेय सत्यवादी

स्टॉक पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

फ्रॉड के शिकार लोगों के लिए दो नियम

फ्रॉड के शिकार लोगों के लिए दो नियम

जब ताक़तवर लोगों के साथ लूट होती है तो न्याय तेज़ी से मिलता है. बाक़ी लोगों के लिए, ऐसा नहीं है

दूसरी कैटेगरी