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2008 क्रैश के सही और ग़लत सबक़

प्रसिद्ध वैल्यू इन्वेस्टर सेथ क्लारमैन का एक दशक पुराना एक पत्र आज दोबारा पढ़े जाने की ज़रूरत है

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कुछ दिनों पहले, मेरी नज़र से एक ऐसा लेख गुज़रा जो लिखा तो एक दशक पहले गया था, मगर जिसे आज दोबारा पढ़े जाने की ज़रूरत है। इस लेख में उस पत्र के अंश थे, जो यूएस फ़ंड मैनेजर सेथ क्लारमैन ने निवेशकों को लिखा था। 2009 के आख़िर में या 2010 की शुरुआत में लिखा गया ये पत्र उस सबक़ की बात करता है, जो 2008-2009 के ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्रैश के दौरान, मार्केट के ज़्यादातर लोगों ने या तो कभी सीखे ही नहीं या जिन्हें भुला दिया। ऐसे 20 सबक़ हैं, और इसके अलावा 10 सबक़ वो भी हैं, जो ग़लत क़िस्म की सीख हैं, यानि झूठे सबक़ हैं।
आप गूगल पर इस पत्र को पूरा पढ़ सकते हैं, मगर इनमें से कुछ बातें मुझे भारतीय इक्विटी इन्वेस्टर्स के लिए ख़ासतौर पर बड़े काम की लगती हैं-न केवल आज के संदर्भ में बल्कि हमेशा के लिए।
एक सबक़ है: ये कहीं नहीं लिखा कि निवेशकों को अपना हरेक डॉलर संभावित मुनाफ़े में बदलने के लिए जुट ही जाना चाहिए; रिस्क को रिटर्न से छोटा समझना सही नहीं। किसी संकट के आने पर कंज़रवेटिव रहना अहम होता है: इससे लंबे समय तक निवेश का रवैया तय करने में, अपनी सोच सही रखने में, और नए अवसरों पर ध्यान केंद्रित करने में आपको मदद मिलती है, जब कि उसी समय में दूसरे लोग भ्रमित होते हैं, यहां तक कि अपने निवेश बेचने के लिए मजबूर हो रहे होते हैं।
यही वजह है कि डाइवर्सिफ़िकेशन और एसेट एलोकेशन जैसे सिद्धांत हरेक निवेश के लिए मायने रखते हैं। अगर आपको रिस्क लेने से परहेज़ नहीं है और आप आक्रामक तरीक़े से निवेश करना चाहते हैं, तो याद रखने वाली बात है कि ऐसे इन्वेस्टर जो मार्केट की स्थितियों को नज़रअंदाज़ कर, रिस्क वाली शैली ही हमेशा अपनाए रहते हैं, वो शायद ही कभी अच्छा कर पाते हैं। चाहे जो हो, कुछ निवेश दूसरों की बनिस्‍बत ज़्यादा सुरक्षित होते ही हैं, कुछ कम गिरते हैं और आसानी से रिकवर कर जाते हैं। निवेशक जानते हैं कि ये कौन से निवेश हैं। इसलिए हर किसी को कुछ कंज़रवेटिव या सुरक्षित निवेश करने ही चाहिए। सबसे ज़रूरी बात जो क्लारमैन कहते हैं, वो ये कि अगर आप तब तक इंतज़ार करते हैं जब उनकी ज़रूरत होगी, तब बहुत देर हो जाएगी।
एक और सबक़: रिस्क निवेश में अंतर्निहित नहीं है; ये हमेशा अदा किए दाम के परिप्रेक्ष्य में होता है। अनिश्चितता और रिस्क एक ही नहीं है। अगर अनिश्चितता बहुत बड़ी है - जैसे 2008 का क्रैश - तब सेक्यूरिटीज़ के दाम कहीं कम हो जाते हैं, और ऐसे में इन्वेस्टमेंट करने में रिस्क कम हो जाता है।
इसी से जुड़ा एक और प्वाइंट है: आप तब ज़रूर ख़रीदें जब दाम नीचे जा रहे हों। जब दाम कम हो रहे होते हैं तो वॉल्यूम कहीं ज़्यादा होता है बजाए, जब दाम चढ़ रहे होते हैं, और ऐसे में ख़रीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा भी काफ़ी कम होती है। क़रीब-क़रीब हमेशा ही बेहतर रहता है अगर आप कुछ जल्दी ख़रीद कर लें, बजाए ख़रीदने में देर करने के। पर हां, गिरावट के समय ख़रीदने पर वैल्यू के कुछ और नीचे जाने के लिए भी आपको तैयार रहना चाहिए।
यहां, क्लारमैन एक प्रसिद्ध कहावत को आगे बढ़ा रहे हैं कि ख़रीदने का सही वक़्त वही है जब सड़कों पर ख़ून हो। किसी भी निवेश के लिए ये कहना सही ही रहेगा कि दाम जितना ऊंचा होगा, रिस्क उतना ज़्यादा होगा। नतीजतन, प्राइस जितना कम होगा, उतना कम रिस्क। और जब मार्केट कमज़ोर पड़ने लगते हैं, तब रिस्क बढ़ने लगता है। मगर हेडलाइन्स में हमेशा इसका उलटा ही क्यों दिखाई देता है? वो इसलिए, क्योंकि वो पूरी तरह से पंटर के लिए सोच रहे होते हैं न कि निवेशक के लिए। ये कहना कि अनिश्चितता (और उतार-चढ़ाव) रिस्क नहीं है, स्वीकार करना ज़रा मुश्किल तो है, पर ज़रूरी है, क्योंकि रिस्क की औपचारिक परिभाषा हमेशा ही उतार-चढ़ाव पर केंद्रित रहती है।
अब एक ग़लत सबक़ की मिसाल: बुरी चीज़ें होती हैं, मगर बहुत बुरी चीज़ें नहीं होती। गिरावट में ज़रूर ख़रीदो, ख़ासतौर पर सबसे कम क्वालिटी की सेक्यूरिटीज़ जब वो प्रेशर में हों, क्योंकि गिरावट जल्द ही उलट जाएगी।
ये झूठा सबक़, एक उलटवांसी की तरह है, ये आपको पिछले सबक़ पर बहुत ज़्यादा विश्वास करने से सावधान करता है। हां, ये सही है कि कम दाम का मतलब है कम रिस्क, मगर ये सिर्फ़ उन एसेट्स के लिए सही है जो पहले से अच्छे एसेट हों। क्योंकि सस्ता कबाड़, कबाड़ ही रहता है। असल में, जब उछाल के बाद मार्केट क्रैश करते हैं, तो कुछ स्टॉक ऐसे भी होते हैं जो कभी रिकवर नहीं कर पाते। यही बात, 2008 में उन भारतीय निवेशकों के लिए शत-प्रतिशत सही साबित हो गई, जब कुछ इंफ़्रा और टेलिकॉम स्टॉक के साथ ऐसा हुआ। जिन लोगों ने इनमें निवेश जारी रखा या क्रैश के बाद के कम दामों पर ये सोच कर ख़रीदा था कि वो वैल्यू इन्वेस्टिंग कर रहे हैं, उन्होंने अपने निवेश की सारी वैल्यू खो दी।
जब दुनिया अनिश्चितता के एक और दौर की तरफ़ चल पड़ी है, ऐसे में पिछले मुश्किल दौर की तरफ़ देखना मौजूदा स्थिति से निपटने के कई अहम तरीके सामने ला सकता है।

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