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बीमा, बीमारी और हत्या

स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के ख़िलाफ़ लोगों का ग़ुस्सा सिर्फ़ अमेरिका तक सीमित नहीं

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यूनाइटेड हेल्थ की बीमा यूनिट के सीईओ ब्रायन थॉम्पसन की 4 दिसंबर, 2024 को न्यूयॉर्क के एक होटल के बाहर एक हमले में हत्या कर दी गई. उस समय थॉम्पसन एक निवेशक सम्मेलन में भाग लेने जा रहे थे. हमलावर, जिसे हथियार चलाने में माहिर बताया गया, घात लगाए बैठा था और उसने साइलेंसर लगी बंदूक से थॉम्पसन को गोली मार दी. गोलीबारी के चलते पुलिस बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चला रही है. हत्या के मक़सद की जांच अभी भी जारी है, लेकिन माना जा रहा है कि इसका संबंध स्वास्थ्य बीमा उद्योग में ब्रायन थॉम्पसन की भूमिका है.

घटनास्थल पर गोलियों के खोल पर ''deny,' 'defend,' and 'depose,' ('इनकार,' 'बचाव,' और 'ख़त्म करो,') जैसे शब्द लिखे हुए थे, जो इशारा करते हैं कि हत्या वजह बीमे के कामकाज से जुड़ी हो सकती है. ये स्वास्थ्य बीमा उद्योग पर लिखी एक प्रसिद्ध किताब, 'Delay Deny Defend: Why Insurance Companies Don't Pay Claims and What You Can Do About It' के संदर्भ में लगता है. शीर्षक ख़ुद ही पूरी कहानी साफ़ कर देता है. इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं में बीमे के दावों को अस्वीकार किए जाने को लेकर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है.

इस विषय में जो कुछ मैंने देखा, वो ये था कि सोशल मीडिया पर ब्रायन थॉम्पसन की हत्या पर काफ़ी लोगों का रवैया था कि 'जो हुआ अच्छा हुआ'. ये स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को लेकर गहरी निराशा दिखाता है, जो अक्सर दावों को अस्वीकार करने और मरीज़ की देखभाल के बजाए मुनाफ़ा कमाने को प्राथमिकता देने के लिए आलोचना पाती हैं. बेशक़, यहां मेरा मक़सद किसी आपराधिक घटना की बारीकियों पर नुक्ता-चीनी करना नहीं हैं - हो सकता है, deny/defend वाली बातें एक चाल हो. लेकिन, हत्यारे का असली मक़सद चाहे जो भी हो, सोशल मीडिया पर मिलने वाली प्रतिक्रियाएं चेतावनी के संकेत से कुछ ज़्यादा हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के स्वास्थ्य बीमा उद्योग ने भी वही रास्ता अपनाया है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के विवादास्पद तौर-तरीक़े दिखाता है. अक्सर बीमा कंपनियां आक्रामक ढ़ंग से दावों को नकार देती हैं, जिससे कई मरीज़ आर्थिक तौर पर तनावग्रस्त हो जाते हैं या ज़रूरी ईलाज ही नहीं करा पाते. लगता है जैसे बाक़ी की बीमा इंडस्ट्री की तरह, ये सिस्टम भी ग्राहकों की सेवा करने के बजाय उनसे उगाही के लिए डिज़ाइन किया गया है. थॉम्पसन की मौत को लेकर ऑनलाइन व्यक्त की जा रही भावनाओं में यही दिखाई देता है.

स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में कई स्तरों पर मौजूद ख़ामियों के कारण स्थिति और भी ख़राब हो गई है. अस्पताल और बीमा कंपनियां एक-दूसरे पर अपने फ़ायदे के लिए ग़लत तरीक़े अपनाने का आरोप लगाती रहती हैं. जहां तक लोगों का सवाल है, वो बस इतना जानते हैं कि बीमारी उद्योग और बीमा उद्योग, दोनों का ये ताक़तवर गिरोह पीड़ितों की जेब से सब कुछ निकाल लेने के लिए समर्पित है. इस हत्या पर जनता की प्रतिक्रिया पर ध्यान दिया ही जाना चाहिए. एक सीईओ की हत्या होना एक अति है, मगर ये भारत सहित वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य बीमा सेक्टर में गहरी निराशा और सिस्टम में तुंरत बदलाव लाने की ज़रूरत उजागर करती है.

कड़वी सच्चाई ये है कि स्वास्थ्य बीमा, जिसे मेडिकल इमरजेंसी में मन को ढांढस बंधाना चाहिए, वो इसके बजाय कई भारतीयों के लिए चिंता का कारण है. ये कहानियां बहुत ही दुखद हैं - तकनीकी कारणों से दावों को अस्वीकार होना, डॉक्टर की सिफ़ारिशों के बावजूद ईलाज को 'चिकित्सा के लिए ज़रूरी नहीं' के तौर पर लेबल करना, और पॉलिसीधारकों को परेशान करने के लिए डिज़ाइन किए अंतहीन दस्तावेज़ों की मांग करना. पहले से ही मेडिकल इमरजेंसी से जूझ रहे परिवारों को बीमा करने वालों से लड़ाई लड़ने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए.

स्वास्थ्य बीमा उत्पादों के मानक तय करने के लिए हाल ही में रेग्युलेशन आगे बढ़ाए गए हैं और ये सही दिशा में उठाया गया क़दम है. लेकिन इसे और स्पष्टता की ज़रूरत है. हमें स्वास्थ्य बीमा चलाने के तरीक़ों को लेकर नई और मौलिक सोच की ज़रूरत है. इसमें दावा अस्वीकार करने की दरों में पारदर्शिता और ईलाज का स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल शामिल हो सकते हैं जिन्हें मनमाने ढंग से अस्वीकार नहीं किया जा सकता हो. साथ ही एक स्वतंत्र अपील करने का सिस्टम होना चाहिए जो स्वाभाविक तौर पर ही बीमाकर्ता के पक्ष में नहीं खड़ा होता हो, फिर चाहे कुछ बीमाकर्ता ये तर्क दें कि धोखाधड़ी रोकने और प्रीमियम बहुत महंगा होने से रोकने के लिए दावों की सख़्त जांच ज़रूरी है. जहां धोखाधड़ी रोकना अहम है, वहीं ये काम सही दावों की क़ीमत पर नहीं किया जाना चाहिए. अमेरिकी कमेंटेटरों के मुताबिक़ अमेरिका में सभी स्वास्थ्य बीमाकर्ताओं में से, यूनाइटेडहेल्थ का दावा-ख़ारिज करने अनुपात अब तक सबसे ज़्यादा, 32 प्रतिशत था, जो अमेरिकी राष्ट्रीय औसत से क़रीब दोगुना है.

बीमा कंपनियों को लेकर जो ग़ुस्सा हम देख रहे हैं, उससे उपजने वाली हिंसा कभी सही नहीं ठहराई जा सकती, मगर ये एक चेतावनी है. इस इंडस्ट्री को ये समझने की ज़रूरत है कि उसका मौजूदा रास्ता ज़्यादा दूर नहीं ले जाएगा. एक बार भरोसा खो देने के बाद उसे फिर से पाना बेहद मुश्किल होता है. बीमा कंपनियों को 'पहले इनकार करो, बाद में सवाल पूछो' की संस्कृति से हटकर ऐसी संस्कृति अपनानी चाहिए जिसमें असली ग्राहक सेवा हो और निष्पक्ष दावा निपटाने को प्राथमिकता दी जाए.

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