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मार्केट क्रैश: हावर्ड मार्क्स की नज़र में डरने का नहीं सोचने का वक़्त

दिग्गज अमेरिकी निवेशक मानते हैं कि ज़्यादा गिरावट 'jump in' का समय है! जानिए लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर्स के लिए उनके क्या हैं सबसे अहम सबक़

दिग्गज अमेरिकी निवेशक मानते हैं कि ज़्यादा गिरावट 'jump in' का समय है! जानिए लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर्स के लिए उनके क्या हैं सबसे अहम सबक़Adobe Stock

शेयर बाज़ार में हाल में तेज़ गिरावट दिख रही है. ग्लोबल स्तर पर अनिश्चितता बढ़ी है, और अमेरिका ने दशकों में सबसे ऊंचे टैरिफ़ लागू कर दिए हैं. ऐसे वक़्त में निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है — अब क्या करें?

क्या ये मौक़ा है डरने का? या यही वो समय है जब सही सोच के साथ मज़बूत क़दम उठाने चाहिए? मैंने एक इंटरव्यू देखा जो जाने-माने अमेरिकी निवेशक हावर्ड मार्क्स ने एक न्यूज़ चैनल को दिया. उसे सुनते हुए मुझे लगा कि उनकी बातें हमें आप तक भी लानी चाहिए. तो यहां पेश हैं उस इंटरव्यू में मार्क्स की कही वो बातें जो एक आम भारतीय निवेशक के सही नज़रिए बनाए रखने में बड़ी कारगर होगी, ख़ासतौर पर एक बड़ी उथल-पुथल और गिरावट के इस मौजूदा दौर में.

कौन हैं हावर्ड मार्क्स?

हावर्ड मार्क्स (Howard Marks) दुनिया के सबसे सम्मानित और समझदार निवेशकों में गिने जाते हैं. पिछले लगभग 50 साल से वो निवेश की दुनिया में सक्रिय रहे हैं और उन्होंने रिस्क मैनेजमेंट और वैल्यू इन्वेस्टिंग को लेकर गहरी समझ विकसित की है. वो ओकट्री कैपिटल (Oaktree Capital) के को-फ़ाउंडर और को-चेयरमैन हैं. ओकट्री कैपिटल एक ऐसी इन्वेस्टमेंट फ़र्म है जो दुनिया भर में वैल्यू ओरिएंटेड क्रेडिट स्ट्रैटेजी के लिए जानी जाती है.

मार्क्स के विचार कितने प्रभावशाली हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ख़ुद वॉरेन बफ़े (Warren Buffett) कहते हैं — "जब मार्क्स का मेमो आता है, तो मैं बाक़ी सब कुछ छोड़कर सबसे पहले उन्हें पढ़ता हूं." उनका हर निवेश परिप्रेक्ष्य न केवल अमेरिकी, बल्कि पूरी दुनिया के निवेशकों को दिशा देने वाला रहा है — और भारत जैसे उभरते बाज़ार के निवेशकों को भी इससे बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है.

ये भी पढ़ेंः हावर्ड मार्क्स की रिस्क मैनेजमेंट की कला

हावर्ड मार्क्स कहते हैं: "ये डिस्लोकेशन का दौर है"

मार्क्स ने एक बातचीत के दौरान शेयर बाज़ार की इस गिरावट पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा, "ये दौर डिस्लोकेशन का है. क़ीमतें नीचे आई हैं, और ये तय करना कि वे ज़्यादा गिरी हैं या कम — आसान नहीं है. लेकिन अगर ये गिरावट बहुत ज़्यादा है, तो 'दोनों पैरों को जोड़ कर इसमें गोता लगा देने का समय है."

"मार्केट सेल पर है - लेकिन लोग डर कर भाग रहे हैं"

बातचीत के दौरान मार्क्स ने एक दिलचस्प तुलना की: "सोचिए, ब्लूमिंगडेल्स (एक बड़ा अमेरिकी डिपार्टमेंट स्टोर) में सब कुछ सेल पर है. क़ीमतें गिरी हुई हैं, तो लोग ख़रीदारी करते हैं. लेकिन जब शेयर बाज़ार गिरता है, तो लोग डरकर भागते हैं. जबकि असल में ये तो सेल का ही दूसरा रूप है."

मार्क्स का मानना है कि जब क़ीमतें गिरती हैं, तो वो रिस्क का संकेत नहीं, बल्कि मौक़ा हो सकता है — बशर्ते आप समझदारी से सोचें.

"दुनिया बदल रही है — और हमें नहीं पता आगे क्या होगा"

मार्क्स एक और अहम बात कहते हैं जो क़रीब-क़रीब हर निवेशक के लिए एक बड़ी चुनौती होती है. और वो है, भविष्य में झांक कर देखने की चाहत. उन्होंने भविष्य के अनिश्चित होने पर कहा कि "हम आमतौर पर मानकर चलते हैं कि भविष्य अतीत जैसा ही होगा. लेकिन अभी वो नियम नहीं चल रहा. दुनिया जैसे एक स्नो ग्लोब की तरह हिल चुकी है — और कोई नहीं जानता कि अब क्या आकार लेगी."

इसलिए वे कहते हैं कि इस समय कोई भी भविष्यवाणी कमज़ोर होगी. "किसी भी भविष्यवाणी या फ़ोरकास्ट की वैल्यू तभी होती है जब आपको उसके सच होने की संभावना भी पता हो. और आज के दौर में किसी भी अनुमान के सच होने की संभावना पहले से कहीं कम है."

ग्लोबलाइज़ेशन का पलटना और महंगाई का बढ़ना

हावर्ड मार्क्स ने ट्रेड व ग्लोबल सप्लाई चेन पर भी चिंता जताई. उनका मानना है कि अमेरिका जिस दिशा में जा रहा है — यानि प्रोटेक्शनिज्म और ट्रेड वॉर — उससे महंगाई फिर से बढ़ सकती है. "जब हम विदेश से सस्ते सामान ख़रीदते थे, तो अमेरिका में महंगाई क़ाबू में रहती थी. अब टैरिफ़ लागू हो रहे हैं — यानि क़ीमतें बढ़ेंगी. और ये बढ़ा हुआ ख़र्च कोई न कोई भुगतेगा — शायद उपभोक्ता."

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भारतीय निवेशकों के लिए क्या मतलब?

हावर्ड मार्क्स की ये बातें सीधे भारतीय निवेशकों को कई संकेत देती हैं:

  • गिरावट डरने का नहीं, सोचने का मौक़ा है. अगर आपकी नज़र लॉन्ग टर्म पर है और कंपनियों की क्वालिटी पर भरोसा है, तो ये वक्त पैनिक का नहीं, पेशंस यानि धैर्य दिखाने का है.
  • क्रेडिट या डेट इन्वेस्टमेंट को कम मत आंकिए. जिस तरह मार्क्स ने बताया, उसमें रिटर्न के साथ-साथ अनुमान का भरोसा भी है — ख़ासकर जब इक्विटी बेहद अस्थिर हो.
  • वैल्यूएशन को नज़रअंदाज़ मत कीजिए. सिर्फ़ इसलिए मत ख़रीदिए कि मार्केट गिरा है. समझिए कि गिरावट के बावजूद, कुछ चीज़ें अब भी सस्ती नहीं हैं.
  • भविष्य का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है — इसलिए तैयारी रखिए. दुनिया में अभी बहुत कुछ अनिश्चित है — यही समय है अपने पोर्टफ़ोलियो को डाइवर्सिफ़ाई करने का और एसेट एलोकेशन पर ध्यान देने का.

अंत में...

हावर्ड मार्क्स कहते हैं — "आपने जब 100 पर ख़रीदा था और अब वो 90 पर है, तो बायकॉट करना करना यानि उससे किनारा करना बेवकूफ़ी है. आपको उनकी इस बात पर गहराई से सोचना चाहिए."

शेयर बाज़ार की गिरावट भले ही डरावनी लगे, लेकिन इतिहास गवाह है — हर गिरावट, निवेशकों के लिए एक मौक़ा भी लेकर आती है. बस ज़रूरत है धैर्य और विवेक की.

अगर आप भी इस दौर में अपने निवेश को लेकर उलझन में हैं, तो हावर्ड मार्क्स की तरह सोचना शुरू कीजिए — डरिए मत, समझिए. वैल्यू रिसर्च पर हम आगे भी आपके लिए ऐसे ही विचार लाते रहेंगे जो आपकी निवेश यात्रा को मज़बूत बनाएंगे.

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