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FII भारत से पैसा निकाल रहे हैं. लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है

चार महीनों में ₹1.92 लाख करोड़ बेचे. लेकिन कहां बेच रहे हैं, क्यों और आपके फ़ंड पर इसका क्या असर होगा, यह तीन अलग-अलग सवाल हैं

fiis-selling-india-sector-rotation-ai-impact-mutual-fundsAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः FII भारतीय शेयर बाज़ार में पिछले साल से भी तेज़ रफ़्तार से बिकवाली कर रहे हैं. लेकिन कहां बेच रहे हैं, कहां नहीं और आपके पोर्टफ़ोलियो पर इसका क्या असर होगा, ये तीन बिल्कुल अलग बातें हैं.

2026 के शुरुआती चार महीनों में विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों से ₹1.92 लाख करोड़ निकाले. यह पूरे कैलेंडर वर्ष 2025 में की गई ₹1.66 लाख करोड़ की बिकवाली से बड़ा आंकड़ा है. भारतीय शेयरों में विदेशी हिस्सेदारी अब 16.7% है, जो 16 साल में सबसे कम है. आख़िरी बार इतना कम आंकड़ा 2010 में था.

यह घबराहट नहीं है. यह 2008 नहीं है. यह कुछ ज़्यादा दिलचस्प और टिकाऊ है: कुछ ख़ास भारतीय सेक्टर से निकलकर कुछ ख़ास देशों में जाना. अगर आपके पास इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड हैं, तो आप पहले से इस बदलाव में हैं. चाहे आपको पता हो या नहीं.

यहां है पूरा नक्शा.

कहां बेच रहे हैं

तीन सेक्टर में सबसे ज़्यादा बिकवाली है.

#1 इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी: सबसे भारी और लगातार बिकवाली. फ़रवरी में, जब विदेशी कुल मिलाकर थोड़े समय के लिए नेट ख़रीदार भी रहे, उन्होंने IT से अकेले ₹16,949 करोड़ निकाले. वजह साइकिल नहीं है. यह AI की दौड़ है. भारतीय IT सर्विसेज़ AI से फ़ायदा उठाने वाली नहीं, बल्कि AI से ख़तरे में दिखती हैं. कोरियाई मेमोरी और ताइवानी सेमीकंडक्टर कंपनियों में इसी दौड़ में ख़रीदारी दिख रही है.

#2 FMCG: लंबे समय की बढ़त के बाद वैल्यूएशन महंगी और साथ में खपत कमज़ोर हो गई है. Hindustan Unilever, Nestle India और Britannia सब पिछड़े हैं.

#3 BFSI: जहां से बड़े आंकड़े आ रहे हैं. मार्च में फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ से ₹60,655 करोड़ निकले, जो इस महीने की कुल विदेशी बिकवाली का आधे से ज़्यादा आंकड़ा है. अप्रैल के पहले हफ़्ते में और ₹19,152 करोड़ निकल गए. HDFC बैंक अकेले मार्च में 17.6% गिरा. BFSI की निफ़्टी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए जब विदेशी भारत में अपनी हिस्सेदारी घटाते हैं, तो यहां सबसे पहले कटौती करते हैं.

कहां नहीं बेच रहे

यह वो हिस्सा है जो ज़्यादातर ख़बरों में छूट जाता है. कैपिटल गुड्स में 2026 के हर महीने FPI का पैसा आया, जो अकेले फ़रवरी में ₹12,135 करोड़ रहा. बिजली और यूटिलिटी टिके रहे. मेटल में रणनीतिक ख़रीदारी हुई. चुनिंदा ऑटो मज़बूत रहे. विदेशी निवेशक भारत की कैपेक्स कहानी में लंबे समय के ख़रीदार दिखते हैं.

आखिर क्यों

सबसे टिकाऊ वजह AI दौड़ का बदलाव है. कोरियाई और ताइवानी टेक कंपनियों को वो वैश्विक पैसा मिल रहा है जो पहले भारतीय IT को मिलता था. यह बुनियादी बदलाव है. 

दूसरी वजह वैल्यूएशन है. भारत का फ़ॉरवर्ड P/E क़रीब 22 है. MSCI उभरते बाज़ार इंडेक्स 13 पर है. भारत के लिए हमेशा से ग्रोथ का प्रीमियम रहा है. लेकिन इतना बड़ा फ़ासला बचाना मुश्किल है.

बाकी अस्थायी शोर है: रुपया ₹95 पर, तेल $100 से ऊपर, अमेरिकी 10 साल का ट्रेज़री यील्ड 4.5% छू रहा है. ये भू-राजनीति के साथ पलट जाएंगे.

घरेलू जवाब

जहां विदेशियों ने ₹1.92 लाख करोड़ बेचे, घरेलू संस्थानों ने क़रीब ₹1.7 लाख करोड़ ख़रीदे. SIP में हर महीने ₹30,000 करोड़ से ज़्यादा आ रहे हैं. मार्च में घरेलू म्यूचुअल फ़ंड ने क़रीब ₹1.05 लाख करोड़ की रिकॉर्ड मासिक इक्विटी ख़रीद की. सबसे ज़्यादा ख़रीदे गए पांचों शेयर बैंक थे. अकेले HDFC बैंक को ₹15,800 करोड़ मिले.

इसीलिए मार्च में निफ़्टी 30% नहीं, 9% गिरा. घरेलू बाज़ार ने विदेशी बिकवाली को झेल लिया. जो बाज़ार 2008 में धड़ाम हो जाता, वो 2026 में बस एक तरफ़ खड़ा रहा.

आपके फ़ंड पर क्या असर

अपने हर इक्विटी फ़ंड की फ़ैक्ट शीट खोलिए और IT सेक्टर का हिस्सा देखिए. अगर 25% से ज़्यादा है, तो आपको एक सोचा-समझा फ़ैसला लेना है. क़ीमत पहले ही गिर चुकी है. सवाल घबराने का नहीं है. सवाल यह है कि क्या आपका AI बाधा पर कोई नज़रिया है और क्या आपके फ़ंड मैनेजर का है.

अगर आपके पास फ़्लेक्सी-कैप या मल्टी-कैप फ़ंड है, तो उसे छोड़िए. फ़ंड मैनेजर आपके लिए यह बदलाव कर रहा है. इसीलिए तो आप 1.2% देते हैं.

अगर आपके पास सेक्टोरल IT फ़ंड है, तो आप एक ऐसे सवाल पर केंद्रित दांव लगा रहे हैं जिसका जवाब ज़्यादातर निवेशकों को देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. या तो पूरा भरोसा रखिए, या निकल जाइए.

अगर आप नई SIP शुरू कर रहे हैं, तो इंडेक्स फ़ंड इस सवाल से पूरी तरह बच जाता है.

संकेत सही पढ़िए

FY26 से FY28 के लिए भारत का अर्निंग्स का अनुमान अभी भी क़रीब 16% सालाना ग्रोथ पर है. निफ़्टी धड़ाम नहीं हुआ. 27 मार्च के सबसे नीचे के स्तर पर भी इंडेक्स फ़रवरी के शिखर से 10% से कम नीचे था. विदेशी जो कहानी बता रहे हैं वो यह नहीं है कि भारत काम नहीं करता. यह है कि भारत उस पोर्टफ़ोलियो में कैसे फ़िट होता है जो अब ज़्यादा कोरिया, ज़्यादा ताइवान, ज़्यादा US टेक चाहता है.

यह जानना काम की बात है. इसकी नकल करना नहीं.

FPI के IT सेक्टर में बिकवाली की वजह से अपने IT फ़ंड मत बेचिए. बिकवाली हो चुकी है. क़ीमत में यह दिख चुका है. जो निवेशक FPI फ़्लो डेटा पर प्रतिक्रिया करता है वो मई में वो करता है जो जनवरी में काम का होता, और फ़रवरी में नुकसानदेह. ज़्यादातर वक़्त, सही जवाब कुछ न करना है और अपने फ़ंड मैनेजरों को आपके लिए काम करने देना है.

इसीलिए तो आपने उन्हें रखा है.

यह भी पढ़ें: फ़ाइनेंशियल समिट में हर स्पीकर कुछ बेचने आता है

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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