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पोर्टफ़ोलियो है या चिड़ियाघर? जानें असल डाइवर्सिफ़िकेशन का सच!

एक शानदार डायवर्सिफ़िकेशन का भ्रम कैसा होता है, आइए विस्तार से समझते हैं

आपका पोर्टफ़ोलियो है या चिड़ियाघर? ओवर-डाइवर्सिफ़िकेशन से बचें: समझदारी से निवेश करेंAditya Roy/AI-Generated Image

आज के दौर में, निवेश एक फैंसी शब्द बन गया है और हर दूसरा व्यक्ति SIP कर रहा है, नया फ़ंड ले रहा है और पोर्टफ़ोलियो अपडेट कर रहा है. लेकिन जब आप किसी निवेशक से पूछें "आपने इतने फ़ंड क्यों चुने?" तो अक्सर जवाब होता है: "डाइवर्सिफिकेशन ज़रूरी है ना!" क्यों हर जगह यही सुनने को मिलता है -  सारे अंडे एक ही टोकरी में मत रखो, थोड़ा और डाइवर्सिफ़ाई करो, गोल्ड, रियल एस्टेट, इंटरनेशनल फ़ंड्स भी जोड़ लो. क्या ये सब सुरक्षा के नाम पर सिर्फ़ एक भ्रम है?

असल में, ये वही शब्द है जिसका सहारा लेकर लोग अपने पोर्टफ़ोलियो में 10–12 फ़ंड यानी, 700 से ज़्यादा कंपनियों में एक साथ निवेश कर रहे हैं.

लेकिन हकीकत में इस तरह से डाइवर्सिफ़िकेशन नहीं होता, बल्कि पोर्टफ़ोलियो ये एक “वित्तीय चिड़ियाघर” बन जाता है. जहां आपने हर कैटेगरी के फ़ंड्स सजा रखे हैं - ना कोई स्ट्रैटेजी है, ना दिशा और ना ही भविष्य का उद्देश्य . आप समझते हैं कि आप एक समझदार निवेशक हैं, लेकिन असल में आप “फ़ंड कलेक्टर” बन चुके हैं. आप कल्पना कीजिए, जब आप 10,000 की रक़म 700  कंपनियों में लगते हैं तो आपका औसतन निवेश हर कंपनी में सिर्फ़ ₹14.28 ही होगा. अगर इनमें से 10 मिड कैप कंपनियों ने 100% रिटर्न दिया तब भी आपका मुनाफ़ा ₹142.8 ही होगा जो कि 10,000 का 1.43% ही है. वहीं, अगर हम 70  कंपनियों में निवेश करते हैं जिनमें से अगर दो कंपनियों ने भी ऐसा शानदार प्रदर्शन दिखाया तो आपको दोगुना मुनाफ़ा हो सकता है (ये मानते हुए कि हर स्टॉक में बराबर का निवेश हो रहा है). बस यही है ओवर-डाइवर्सिफ़िकेशन - जितनी ज़्यादा कंपनियां, आपका हर कंपनी में निवेश उतना ही कम होगा और आपको उसकी ग्रोथ से उतना ही कम फ़ायदा होगा.

ये भी पढ़ें: SIP सही है, लेकिन ये स्ट्रैटेजी देगी और ज़्यादा रिटर्न

ओवर-डाइवर्सिफ़िकेशन दिखता कैसा है?

पहलू समझदार निवेशक ओवर-डाइवर्सिफ़ाई करने वाले
म्यूचुअल फ़ंड्स की संख्या 3 से 4 7 से 10 या उससे ज़्यादा
होल्डिंग्स की समझ साफ़ तौर पर भ्रम और दोहराव
एक जैसी कंपनियों का दोहराव बहुत कम बहुत ज़्यादा
नतीजा लक्ष्य आधारित ग्रोथ औसत रिटर्न, बेमतलब भीड़ 

फ़्लेक्सी कैप है, तो लार्ज कैप क्यों?

एक निवेशक के तौर पर अगर आपने फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड में निवेश कर रखा है, जिसमें पहले से ही 63% पैसा लार्ज-कैप, 21% मिड-कैप और 16% स्मॉल-कैप में लगा हुआ है. अब कोई आपको बोलता है कि लार्ज-कैप में पैसा लगाओ. तब आप क्या करेंगे… निवेश कर देंगे?

नहीं! यही आप करते हैं ओवर-डायवर्सिफ़िकेशन, आपका पोर्टफ़ोलियो थोड़ो उलझ जाता है और आपको डाइवर्सिफ़िकेशन का पूरा फ़ायदा नहीं मिल पाता. आम तौर पर, फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड का लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप कंपनियों में एक अच्छा बैलेंस होता है. अगर आप अब और लार्ज-कैप में पैसा डालते हैं, तो आपके पोर्टफ़ोलियो में लार्ज-कैप का वेटेज बढ़ जाएगा - यानी लार्ज-कैप में ज़रूरत से ज़्यादा पैसा हो जाएगा. इससे आपके पोर्टफ़ोलियो पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि आपने सारा दांव एक ही तरफ़ लगा दिया है. जैसा कि आप नीचे ग्राफ़ में देख सकते हैं.

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इस तरह के पोर्टफ़ोलियो आपकी स्ट्रैटेजी को उलझा देते हैं और निवेशक को भ्रम में डालते हैं.

ये भी पढ़ें: सही Diversification के लिए कितने म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करें?

 धीरेंद्र कुमार का नज़रिया

  • ज़्यादा फ़ंड्स का मतलब ज़्यादा दिमाग़ी बोझ.
  • बिना वजह के नए फ़ंड्स में पैसा लगाना बेकार है.
  • सादगी ही सबसे बड़ी रणनीति है.

“आपको हर चीज़ में निवेश करने की ज़रूरत नहीं, बस सही विकल्प चुनिए और धैर्य रखिए.”

अंत में एक बात

आपको सब कुछ का मालिक बनने की ज़रूरत नहीं. ज़रूरत है तो सिर्फ़ सोच-समझकर सही चीज़ों में निवेश करने की. जैसे ज़ू में जानवरों की भीड़ होती है पर कोई दिशा नहीं, वैसे ही एक उलझा हुआ पोर्टफ़ोलियो दिखने में बड़ा लगता है लेकिन आपको कहीं नहीं पहुंचाता.

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ये भी पढ़िए: SIP क्या है और यह कैसे काम करती है?

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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