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मान लीजिए, आपने रिटायरमेंट के लिए ₹1 करोड़ बचा लिए हैं. असल में, हम जानेंगे कि 5% रक़म की निकासी, एक समझदारी भरा 50:50 इक्विटी-डेट पोर्टफ़ोलियो और 8% रिटर्न लंबे समय में आपके घरेलू ख़र्चों को पूरा कर सकते हैं या नहीं? इस स्टोरी में हम ये भी जानेंगेः
1) क्या 30 साल तक 5% निकासी हो सकती है?
2) अगर नहीं, तो आपका ₹1 करोड़ कितनी जल्दी ख़त्म हो सकता है?
3) क्या 4% निकासी सचमुच लंबे समय तक मानसिक शांति दे सकती है?
60 साल के श्री श्रीनिवासन अभी-अभी अपनी सरकारी नौकरी से रिटायर हुए हैं. सालों तक मेहनत से की गई बचत और सोच-समझकर निवेश करने के बाद, उन्होंने ₹1 करोड़ का रिटायरमेंट कॉर्पस बनाया है. उनके लिए ये बड़ी रक़म है, जो ज़िंदगी भर के लिए काफ़ी है, ख़ासकर इसलिए, क्योंकि उन्होंने पहले ही एक घर बना लिया है.
उनका इरादाः आसान और समझदारी भरा. वो हर साल 5% निकालेंगे, पहले साल में ₹5 लाख-अपने रोज़मर्रा के ख़र्चों के लिए. बाक़ी पैसा 50% इक्विटी और 50% डेट के संतुलित पोर्टफ़ोलियो में लगा रहेगा, जिससे 8% सालाना मुनाफ़े की उम्मीद है. उन्हें लगता है कि ये अगले 30 साल आराम से गुज़ारने में मदद करेगा.
लेकिन श्री श्रीनिवासन पैसे के सबसे ख़ामोश मगर ख़तरनाक़ दुश्मन को भूल जाते हैंः महंगाई.
5% निकासी की मुश्क़िल
आइए इसे एक काल्पनिक बात से समझें. पहले साल में सब ठीक लगता है. श्री श्रीनिवासन ₹5 लाख निकालते हैं. उनका कॉर्पस बाज़ार के साथ बढ़ता है. वो सुरक्षित महसूस करते हैं.
लेकिन बीते 10 सालों में भारत की महंगाई 3.3% से 6.7% के बीच रही है. अगर अगले 30 सालों में महंगाई 6% की दर से बढ़े, तो उनके रोज़ के ख़र्च हर 12 साल में दोगुने हो जाएंगे. आज का ₹10,000 का किराने का बिल 10वें साल में क़रीब ₹18,000, बीस साल में ₹32,000 और तीस साल तक ₹57,000 से ज़्यादा हो जाएगा. अगर श्री श्रीनिवासन अपनी निकासी को महंगाई के साथ नहीं बढ़ाते, तो उनकी ज़िंदगी की चमक़ फ़ीकी पड़ जाएगी.
दूसरे शब्दों में, श्रीनिवासन को महंगाई के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए अपनी सालाना निकासी बढ़ानी होगी. तो, पहले साल में ₹5 लाख की निकासी दूसरे साल में ₹5.3 लाख तीसरे साल में ₹5.62 लाख और इसी तरह आगे भी बढ़ती रहेगी.
उन्हें अपने ख़र्चों का महंगाई के साथ तालमेल बिठाने के लिए निकासी बढ़ानी होगी. तो, पहले साल में ₹5 लाख की निकासी दूसरे साल में ₹5.3 लाख, तीसरे साल में ₹5.62 लाख और ये इसी तरह आगे बढ़ेगी.
मुश्क़िल ये हैः उनके पैसे पर नाममात्र रिटर्न तो 8% है, लेकिन 6% महंगाई को ध्यान में रखते हुए, सालाना क़रीब 1.88% रह जाता है. ये उनके बढ़ते ख़र्चों को मुश्क़िल से पूरा करता है.
इसलिए, जब तक श्रीनिवासन के 85 साल (रिटायरमेंट के 25 साल बाद) के होते ही, उनका ₹1 करोड़ का कॉर्पस पूरी तरह ख़त्म हो जाएगा. उनकी अपनी बचत ख़त्म हो जाएगी.
क्या होगा अगर वो सिर्फ़ 4% निकालें?
चिंता में पड़कर, श्री श्रीनिवासन अपना इरादा दोबारा बनाते हैं. इस बार वो सिर्फ़ 4% निकासी से शुरुआत करने का फ़ैसला करते हैं - पहले साल में ₹4 लाख और इसे हर साल महंगाई के साथ बढ़ाते हैं.
इस बार हालात थोड़े बेहतर हैं, लेकिन ज़्यादा नहीं. अगर वो सावधानी रखें, तो उनका पैसा 30 साल तक चल सकता है, लेकिन ये भी उतनी राहत नहीं देता. मिसाल के लिए, अगर 30 साल बाद उनके पास ₹70 लाख बचे, तो वो आज के हिसाब से सिर्फ़ ₹12 लाख के बराबर होगा. यानी, 60 की उम्र में जो ज़िंदगी वो जी सकते थे, वो 90 की उम्र में संभव नहीं होगी.
श्री श्रीनिवासन की कहानी कोई नई नहीं है; ये भारत के कई रिटायर्ड लोगों की हक़ीक़त है. ₹1 करोड़ का कॉर्पस, भले ही बड़ा लगे पर 25-30 साल के आरामदायक रिटायरमेंट के लिए अक्सर काफ़ी नहीं होता. इसके कारण ये हैंः
- महंगाई: जैसे रिटर्न बढ़ता है, वैसे ही क़ीमतें भी बढ़ती हैं. तीन दशकों में ये रिटर्न बड़ी मुश्क़िल से बढ़ता है.
- असल रिटर्न, कम होता है: 8% रिटर्न भले ही सुकून देने वाला लगे, लेकिन 6% महंगाई के बाद ये सिर्फ़ 1.88% ही रह जाता है.
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आख़िरी बात
श्री श्रीनिवासन का सफ़र हमें सिखाता है कि रिटायरमेंट का मतलब कोई मुक़ाम हासिल करना नहीं है; बल्कि ये ज़िंदगी की चमक़ बनाए रखने की बात है. इसके लिए न सिर्फ़ बचत बल्कि महंगाई को ध्यान में रखकर निकासी और लंबी समय का नज़रिया ज़रूरी है.
काग़ज़ पर ₹1 करोड़ का आंकड़ा बड़ा दिखता है. लेकिन एक ऐसी दुनिया में, जहां क़ीमतें आपकी सोच से भी तेज़ी से बढ़ती हैं, ये अब पहले जितना नहीं रह गया है और ये सब सबसे अच्छी स्थिति में है.
- यहां ये मानकर चला गया है कि आपने अपना घर पहले ही ख़रीद लिया है.
- ये माना गया है कि आपको जीवन में आगे चलकर अपने आश्रितों की मदद नहीं करनी पड़ेगी.
- ये मान लिया गया है कि आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है और ये सब कुछ कवर करता है. असल में, भारत में दवाइयों के ख़र्च सामान्य महंगाई से भी ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहे हैं, इससे आपके रिटायरमेंट कॉर्पस पर और बोझ पड़ा सकता है.
लंबे समय तक टिकने वाली वैल्थ कैसे बनाएं?
आपने अपने रिटायरमेंट की बचत के लिए सालों मेहनत की है. इसे महंगाई और ग़लत तरीके़ से की गई निकासी जैसे रिस्क को इसे खा जाने न दें.
वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र के साथ, आपको सिर्फ़ फ़ंड के सुझाव नहीं मिलते; आपको एक ज़िंदगी भर का निवेश साथी मिलता है.
- अपने गोल के हिसाब से पोर्टफ़ोलियो प्लान करें
- ऐसे फ़ंड चुनें जो रिटायरमेंट के दौरान आपकी ज़िंदगी की चमक़ बनाए रखने में मदद कर सकते हैं.
सलाह लें. चैन से ज़िंदगी गुज़ारें!
वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र पर अभी ग़ौर करें!
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ये लेख पहली बार जुलाई 22, 2025 को पब्लिश हुआ.
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