
सारांशः बीते तीन सालों में चांदी ने सोने से बेहतर प्रदर्शन किया है. पिछले 12 महीनों और तीन साल के आधार पर, दोनों में चांदी ने सोने के मुक़ाबले ज़्यादा रिटर्न दिया है. फिर भी, सोना भारतीय निवेशकों की तरफ से रिकॉर्ड निवेश आकर्षित कर रहा है. ऐसा क्यों है? इस लेख में हमने चांदी की असल स्थिति का एनालेसिस किया है और ये भी बताया है कि क्यों इतिहास सावधानी बरतने की चेतावनी देता है. तो क्या सोने के साथ बने रहना चाहिए या चांदी की तेज़ी पर दांव लगाना चाहिए? इसका जवाब आपको हैरान कर सकता है.
क़ीमती मेटल की जगमगाती दुनिया में, सोना हमेशा से सुर्ख़ियों में रहा है. ये वो सेफ़-हेवन एसेट है जिसमें निवेशक इसी सुरक्षित निवेश की ओर आकर्षित होते हैं. भारत में सोना सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से भी आकर्षक है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के डेटा के मुताबिक़, अगस्त 2025 में भारत के गोल्ड ETFs में $233 मिलियन (क़रीब ₹2,000 करोड़) का नेट इनफ़्लो आया, जो पिछले महीने से 67% ज़्यादा है.
इतना ही नहीं, साल की शुरुआत से अब तक कुल इनफ़्लो $1.23 बिलियन (क़रीब ₹11,000 करोड़) तक पहुंच गया है. ये 2024 के पूरे साल के $1.29 बिलियन (लगभग ₹11,300 करोड़) के आंकड़े के क़रीब है.
यानी ऊंचे दामों के बावजूद निवेशक सोने में पैसा डालते जा रहे हैं.
वहीं, चांदी हमेशा से ही दूसरे स्थान पर रही है.
हालांकि, पिछले तीन सालों में चांदी ने चुपचाप सोने को पीछे छोड़ा है. पिछले 12 महीनों में चांदी की क़ीमत 46.29% बढ़ी है, जबकि सोना 46.03% की बढ़त के साथ थोड़ा ही पीछे है.
ये इत्तेफ़ाक़ नहीं है. पिछले तीन सालों में चांदी ने 30.6% सालाना रिटर्न दिया है, जबकि सोने के लिए ये आंकड़ा 26.6% रहा है.
तो क्या अब पोर्टफ़ोलियो में चांदी को ज़्यादा जगह देनी चाहिए? आइए दोनों पहलुओं पर ग़ौर करें.
चांदी के पक्ष में
- इंडस्ट्रियल डिमांड: सोना जहां ज़्यादातर वैल्यू स्टोर है, वहीं चांदी का इंडस्ट्रिय इस्तेमाल ज़्यादा होता है. इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और ख़ासकर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) में बैटरी और सर्किट्स में इसका अहम रोल है. जैसे-जैसे ग्रीन ट्रांज़िशन तेज़ होगा, चांदी की इंडस्ट्रियल डिमांड और बढ़ेगी.
- सप्लाई की कमी: इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के मुताबिक़, ग्लोबल स्तर पर सिल्वर की सप्लाई कम है और लगातार चौथे साल डिमांड ज़्यादा है. कई माइन्स मैच्योर हो चुकी हैं और नई सप्लाई डिमांड के साथ नहीं चल पा रही. ये असंतुलन क़ीमत को और ऊपर ले जा सकता है.
चांदी की कमज़ोरियां
लेकिन ख़रीदने से पहले याद रखिए: चांदी का इतिहास निवेशकों को निराश करता आया है.
- लंबी सुस्ती: 1998 से 2003 के बीच चांदी की ग्रोथ बस 1.5% सालाना रही, यानी महंगाई के साथ भी नहीं चल पाई.
- खोया दशक: 2008 से 2011 के बीच तेज़ी के बाद चांदी में भयंकर गिरावट देखने को मिली. 2012 से 2020 तक रिटर्न निगेटिव रहा और इसकी भरपाई के लिए 8 साल साल इंतज़ार करना पड़ा.
- भारी गिरावटें: (SilverPrice डेटा के अनुसार) 2013 से 2015 तक लगातार तीन साल चांदी गिरती रही और इस दौरान इसकी वैल्यू आधी रह गई.
सोना भी सालों तक मंदी के दौर से गुज़रा है. 1980 से 2003 तक इसकी ग्रोथ 6.8% सालाना रही. लेकिन 2003 के बाद से सोने ने 15% का सालाना रिटर्न दिया है और हर साइकिल में मज़बूत साबित हुआ है.
और यहां एक और चौंकाने वाला आंकड़ा है: 2010 से अब तक 10 कैलेंडर ईयर में सोने ने चांदी को मात दी है.
यानी दोनों ही मेटल चमकते हैं, लेकिन सोना कम झटकों के साथ रिटर्न देता है.
आप क्या समझे?
भले ही, चांदी ने हाल में सोने को पछाड़ा है, लेकिन इतिहास बताता है कि इसमें उतार-चढ़ाव ज़्यादा रहता है. इसका प्रदर्शन साइक्लिकल होता है, ये इंडस्ट्रियल डिमांड पर निर्भर है और लंबी सुस्ती के बाद इसमें तेज़ी आती है.
इसके उलट, सोना पोर्टफ़ोलियो को स्थायित्व देने वाला साबित हुआ है. ये हमेशा सबसे ऊंचे रिटर्न नहीं देता, लेकिन इसका प्रदर्शन ज़्यादा टिकाऊ है. साथ ही, ये ग्लोबल लिक्विडिटी और महंगाई व मार्केट उथल-पुथल के ख़िलाफ़ भरोसेमंद है.
हमारी राय
सोना अब भी लॉन्ग-टर्म के लिए बेहतर विकल्प बना हुआ है. हालांकि निवेश SIPs के ज़रिए ही करना चाहिए क्योंकि हाल में पीली धातु की क़ीमत तेज़ी से ऊपर गई है.
वैल्यू रिसर्च की राय साफ़ है: पोर्टफ़ोलियो में लगभग 10% एक्सपोज़र सोने में रखिए, बेहतर होगा ETFs या गोल्ड म्यूचुअल फ़ंड्स के ज़रिए निवेश करें. चांदी को सिर्फ़ एक उप-निवेश के रूप में ही देखें.
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