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इंफ़ोसिस के बायबैक पर लगेगा टैक्स. इसे कैसे कम करें?

चलिए जानते हैं

इंफ़ोसिस बायबैक पर लगेगा टैक्स. अपना टैक्स कैसे कम करें?Aditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः इंफ़ोसिस का बायबैक टैक्स में कमी लाने वाला लग रहा है. लेकिन अगर हम आपको बताएं कि ज़्यादातर निवेशक एक ऐसे नियम को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं जो इसके असर को कम कर सकता है, तो क्या होगा? नए नियम निवेशकों के मुनाफ़े को कम करते दिख रहे हैं, लेकिन टैक्स सिस्टम में एक ऐसा पेंच है जो आपको इस झटके से राहत दिला सकता है. जानिए पूरी कहानी.

जब कोई कंपनी मोटे प्रीमियम पर बायबैक का ऐलान करती है, तो आमतौर पर निवेशकों में उत्साह बढ़ जाता है. इंफ़ोसिस ने भी यही किया है. बेंगलुरु की IT कंपनी ₹18,000 करोड़ के शेयर टेंडर रूट से ख़रीदेगी, ₹1,800 प्रति शेयर के भाव पर - यानी ऐलान से पहले की क़ीमत पर लगभग 18% प्रीमियम. काग़ज़ पर ये आकर्षक दिखता है क्योंकि मौजूदा मार्केट क़ीमत ₹1,523 है.

लेकिन बायबैक के लिए नए टैक्स नियम अब जेब में आने वाली रक़म को बदल देंगे.

क्या बदला है

पहले, कंपनियां लगभग 23% का बायबैक टैक्स भरती थीं और शेयरहोल्डर्स को पूरी रक़म टैक्स-फ़्री मिलती थी. लेकिन फ़ाइनेंस एक्ट में संशोधन के बाद, टैक्स का बोझ अब निवेशकों पर आ गया है.

अब बायबैक से मिलने वाली रक़म को ‘अन्य सोर्स से इनकम’ माना जाएगा. यानी ये आपकी कुल कमाई में जुड़ जाएगी और उसी के हिसाब से टैक्स स्लैब पर टैक्स लगेगा. साथ ही कंपनी द्वारा पहले ही 10% का एकमुश्त TDS भी भी काट लिया जाता है. सुविधा के लिए, TDS को अभी नज़रअंदाज़ करते हैं और देखते हैं कि स्लैब के हिसाब से आपकी बायबैक इनकम पर कितना असर पड़ेगा.

मान लीजिए आपके पास इंफ़ोसिस के 10 शेयर हैं, जो ₹1,500 प्रति शेयर पर ख़रीदे गए थे. आप उन्हें बायबैक में ₹1,800 पर टेंडर करते हैं, तो कुल ₹18,000 मिलते हैं (मान लें कि पूरी तरह स्वीकार हो जाते हैं). अब, नए नियम के तहत ये पूरी रक़म आपकी कमाई में जुड़कर टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होगी.

इसलिए, अगर आप 20% स्लैब में आते हैं, तो नेट ₹14,400 ही बचेगा. वहीं 30% स्लैब वालों को ₹12,600 ही मिलेगा. यानी जितना ऊंचा टैक्स स्लैब, उतना कम बायबैक गेन. अब पहले जैसा पूरा प्रीमियम हाथ में नहीं आएगा.

लेकिन यहां एक हैक है

भले ही बायबैक की रक़म कमाई मानी जाएगी, लेकिन जिन शेयरों को टेंडर किया गया है उनकी ख़रीद की क़ीमत (हमारे उदाहरण में ₹15,000) को कैपिटल लॉस माना जा सकता है क्योंकि शेयर ख़त्म हो जाते हैं.

इस लॉस का इस्तेमाल आप कहीं और बने कैपिटल गेन को एडजस्ट करने में कर सकते हैं. दूसरे शेयर बेचने से होने वाले कैपिटल गेन की भरपाई के लिए कर सकते हैं. अगर आपको तुरंत लाभ नहीं होता है, तो आप इस नुक़सान को आठ साल तक आगे बढ़ा सकते हैं.

सीधे शब्दों में कहें तो, आपकी ₹15,000 ख़रीदारी लागत ₹15,000  का कैपिटल लॉस बन जाती है. अगर आपने कहीं और ₹20,000 का कैपिटल गेन दर्ज किया है, तो आप इस घाटे को एडजस्ट कर सकते हैं और बक़ाया ₹5,000 पर टैक्स का भुगतान कर सकते हैं.

इस तरह, स्लैब टैक्सेशन के कारण आपकी बायबैक इनकम कम हो जाती है, लेकिन कैपिटल लॉस एडजेस्टमेंट आपको अन्य लाभ दर्ज करने पर टैक्स बोझ को हल्का करने का एक और रास्ता देता है

निष्कर्ष

बायबैक अब पहले जैसा आसान टैक्स-फ़्री फ़ायदा नहीं रह गया है. अब निवेशकों को मिलने वाली रक़म पूरी तरह उनके टैक्स स्लैब पर निर्भर है. कई लोगों के लिए बायबैक से मिलने वाली रक़म पहले से काफ़ी कम होगी. लेकिन राहत ये है कि ख़रीद क़ीमत कैपिटल लॉस में बदलकर दूसरे गेन के ख़िलाफ़ एडजस्ट की जा सकती है.

तो क्या आपको अपने इंफ़ोसिस के शेयर बेच देने चाहिए?

बायबैक, ख़ासकर प्रीमियम पर, निवेशकों को आर्बिट्राज से फ़ायदा लेने का मौक़ा देते हैं. लेकिन नए टैक्स नियमों की वजह से अब ये सौदा सीधे-सीधे उतना आकर्षक नहीं रह गया है.

सबसे अहम बात ये है कि हम हमेशा शॉर्ट-टर्म लहरों से आगे देखने की सलाह देते हैं. असली सवाल ये है कि क्या इंफ़ोसिस अगले 10 साल तक रखने लायक़ है?

वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र में हम इसी सवाल का जवाब देते हैं. गहन फ़ंडामेंटल रिसर्च के ज़रिए हम लिस्टेड कंपनियों पर क़रीब से नज़र रखते हैं, उन्हें क्वालिटी, ग्रोथ, वैल्यूएशन और मोमेंटम पर परखते हैं और डेटा पर आधारित स्पष्ट गाइडेंस देते हैं - क्या ख़रीदना है, होल्ड करना है या बेचना है.

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तो ये जानने के लिए कि इंफ़ोसिस लॉन्ग-टर्म पोर्टफ़ोलियो का हिस्सा होना चाहिए या नहीं, स्टॉक एडवाइज़र में हमारी बाय रिकमेंडेशन देखिए.

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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