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अगर आप SIP रोक दें और पैसे न निकालें तो क्या होगा?

एक अनुभव, एक पैटर्न और एक सबक़ कि पैसा हमारे लिए (या हमारे खिलाफ़) चुपचाप कैसे काम करता है

एक अनुभव, एक पैटर्न और एक सबक़ कि पैसा हमारे लिए (या हमारे खिलाफ़) चुपचाप कैसे काम करता है

सारांशः हममें से ज़्यादातर लोगों ने ये कम से कम एक बार ज़रूर किया है, मैंने भी. हम पूरे अनुशासन से SIP शुरू करते हैं, कुछ साल बाद किसी वजह से उसे बंद कर देते हैं… और फिर पहले से निवेश हुआ पैसा वहीं पड़ा रहता है. वो छोटा-सा ‘भूला हुआ’ कॉर्पस सालों-साल चुपचाप पड़ा रहता है, न बेचा जाता है और न उसमें कुछ जोड़ा जाता है. तो क्या सच में ऐसा निवेश हमें फ़ायदा देता है? या नुक़सान? आइए देखते हैं…

हममें से ज़्यादातर लोगों ने ये कम से कम एक बार तो ज़रूर किया है. मैं भी इसमें शामिल हूं.

आप पूरे पक्के इरादे से SIP शुरू करते हैं, कुछ साल तक नियम से चलते हैं… और फिर अचानक बंद कर देते हैं. हो सकता है कि फ़ंड अंडरपरफ़ॉर्म ख़राब परफ़ॉर्म करने लगा हो, या शायद किसी नए “टॉप-रेटेड” फ़ंड ने आपका ध्यान खींचा हो. ऐसा भी हो सकता है कि शायद ज़िंदगी में कुछ और अहम प्राथमिकता आ गई हों.

हालांकि, कई बार ऐसा होता है कि SIP बंद करते समय, हम पहले से निवेश किए पैसे को निकालते ही नहीं. वो बस पड़ा रहता है. और हम सोचते हैं कि “बाद में देखेंगे”. महीने गुज़रते हैं. फिर साल. और, धीरे-धीरे ये निवेश आधा भूला हुआ बोझ और आधा छुपा हुआ खज़ाना बनकर चुपचाप अपनी आर्थिक यात्रा जारी रखता है.

ऐसा इसलिए क्योंकि SIP के साथ हमारा व्यवहार थोड़ा उलझा हुआ होता है:

  • आप किसी ख़राब परफ़ॉर्म करने वाले फ़ंड में SIP बंद करते हैं, लेकिन पूरा पैसा रिडीम करने से हिचकते हैं.
  • हो सकता है कि “बेहतर NAV पर बेचूंगा” या “मार्केट तेज़ होने पर निकालूंगा” जैसी सोच आपको रोकती है.
  • बेचने पर टैक्स के बारे में सोचना पड़ता है, इसलिए आप फै़सला टाल देते हैं.
  • या, ज़्यादातर, आप कहीं और नई SIP शुरू करने के बाद इसके बारे में भूल जाते हैं.

लेकिन क्या ये भूला हुआ पैसा बढ़ता है, घटता है, या वहीं का वहीं रहता है?

चलिए इसे एक आसान और बिल्कुल असल उदाहरण से समझते हैं.

पहला सिनेरियो: SIP बंद हो जाती है, लेकिन पैसा निवेशित रहता है

मिलिए आलिया से.

वो पांच साल तक हर महीने ₹15,000 की SIP करती है, फिर एक अंडरपरफ़ॉर्मिंग फ़ंड के चलते SIP बंद कर देती है और आगे उसमें एक भी रुपया नहीं जोड़ती. SIP बंद करते समय उसके पास 12% सालाना रिटर्न मानकर लगभग ₹12.3 लाख का कॉर्पस है.

अब अगर वो कुछ न भी करे और पैसा यूं ही पड़ा रहे, तो ये होता है:

  • पांच और साल बाद, उसके ₹12.3 लाख बढ़कर ₹21.6 लाख हो जाते हैं.
  • 15 साल बाद वही पैसा ₹67.3 लाख बन जाता है.

एक पल के लिए इस बारे में सोचिए. उसने निवेश बंद कर दिया, फिर भी पैसा अगले 15 साल में पांच गुना से ज़्यादा हो गया.

यही है कंपाउंडिंग, रिटर्न पर रिटर्न का बनना, बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के.

क्या होता अगर उसने ₹12.3 लाख निकाल लिए होते?

मान लीजिए आलिया घबरा गई और फ़ंड से पैसा निकलकर अपने पास रख लिए.

अगर महंगाई 5% सालाना के हिसाब से बढ़ती है, तो 15 साल बाद उसकी असल क़ीमत घटकर लगभग ₹6 लाख रह जाती.

यानी कैश में पड़े पैसे पर “महंगाई टैक्स” चुपचाप सब कुछ खा जाता है. आपके लिए बढ़ते पैसे और आपके खिलाफ़ बढ़ती महंगाई के बीच यही अंतर है.

अगर वो पैसा FD में डाल देती?

आलिया शायद ये भी सोच सकती हैं, “मार्केट बहुत उतार-चढ़ाव भरा है. चलो इसे मैं फ़िक्स्ड डिपॉज़िट में लगा देती हूं.”

अगर FD पर 7% मिलता रहे, तो 15 साल बाद ₹12.3 लाख की रक़म बढ़कर ₹33.9 लाख हो जाती.

हां, ये कैश आपने पास रखने से तो बेहतर है, लेकिन मार्केट में बने रहने पर मिलने वाले ₹67.3 लाख का सिर्फ़ आधा है.

और याद रखें, इसमें टैक्स शामिल नहीं है. FD इंटरेस्ट पर हर साल टैक्स लगता है, जो उनके रिटर्न का एक हिस्सा हर साल खा जाता है, जबकि इक्विटी और म्यूचुअल फ़ंड में लॉन्ग-टर्म गेन से कहीं ज़्यादा फ़ायदे वाला होता है.

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दूसरा सिनेरियो: वो अपनी SIP जारी रखती है

आलिया पांच साल तक हर महीने ₹15,000 की SIP करती है. तब उसका कॉर्पस 12% सालाना रिटर्न मानकर ₹12.3 लाख बन चुका होता है. लेकिन इस बार वो SIP रोकती नहीं बल्कि जारी रखती है.

अब देखें पैसा कितना बढ़ सकता है:

  • 10 साल बाद उसके पास ₹34.8 लाख हो सकते हैं.
  • 20 साल बाद उसका कॉर्पस ₹1.5 करोड़ तक पहुंच सकता है.

ये तुलना तस्वीर को पूरी तरह से बदल देती है.

पहले सिनेरियो में उसने SIP बंद करने के बाद भी चुपचाप कंपाउंडिंग से ₹67.3 लाख बनाए. पर दूसरे सिनेरियो पर ग़ौर करें, तो पता चलता है कि SIP जारी रखने पर कंपाउंडिंग सिर्फ़ बढ़ती नहीं बल्कि और तेज़ हो जाती है. नतीजा? ₹1.5 करोड़.

यही फ़र्क है, कंपाउंडिंग को अकेले काम करने देना और उसके साथ भागीदार बन जाना.

आख़िरी बात

अपनी SIP बंद करके भी पैसे को निवेशित रहने देना, उसे निकालने या FD में डालने से कहीं ज़्यादा अच्छा है. इक्विटी धैर्य को रिवॉर्ड करती है, चाहे निवेश जारी रहे या न रहे.

लेकिन जब आप निवेशित रहते हैं और अपनी SIP जारी रखते हैं तो आपको जो नतीजा मिलता है, वो किसी भी तुलना से परे है. यही सबसे भरोसेमंद तरीक़ा है जिससे पैसा “बढ़ता” नहीं, बल्कि असल दौलत में बदलता है.

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ये भी पढ़ें: 24% निवेशक एक साल के भीतर फ़ंड बेच देते हैं, और मुझे बेहद ख़ुशी होती है!

ये लेख पहली बार दिसंबर 02, 2025 को पब्लिश हुआ.

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