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आत्मविश्वास का भ्रम

क्यों कई निवेशक उन क्रैश के लिए खुद को तैयार मान लेते हैं, जिनका उन्होंने कभी सच में सामना नहीं किया

एक कॉन्फिडेंस ट्रिक: क्या आप सच में मार्केट क्रैश को संभाल सकते हैं?Anand Kumar

सारांशः हर बुल मार्केट ऐसे निवेशक पैदा करता है, जिन्हें लगता है कि उन्होंने शांत रहना सीख लिया है. जबकि, इतिहास कुछ और ही कहता है. ये संपादकीय बताता है कि असली ख़तरा तभी सामने आता है, जब ज्ञान नहीं, बल्कि धैर्य की परीक्षा होती है.

इस समय म्यूचुअल फ़ंड की दुनिया में कुछ दिलचस्प चल रहा है. निवेशकों में आत्मविश्वास भरा हुआ है. SIP रिकॉर्ड स्तर पर हैं, होल्डिंग पीरियड बढ़ रहे हैं और जहां देखिए, कोई न कोई कहता दिख जाता है, “वो उतार-चढ़ाव संभाल सकते हैं.” ये अब एक तरह का सम्मान का प्रतीक बन गया है. लेकिन क्या ये आत्मविश्वास असली परिपक्वता दिखाता है या सिर्फ़ क़िस्मत की बात है कि अब तक उनका बाज़ार के असल मुश्किल दौर का सामना नहीं हुआ है.

जो लोग दशकों से बाज़ार देखते आए हैं, उनके लिए ये दौर थोड़ा असहज तरीके से जाना-पहचाना लगता है. हर बुल रन ऐसे निवेशक पैदा करता है, जिन्हें लगता है कि उन्होंने शांत रहना सीख लिया है. उन्होंने गिरावट के बारे में पढ़ा है, नियम जानते हैं, निवेश में बने रहो, घबराओ मत और एक-दो गिरावट देख भी चुके हैं. फिर सीखने को क्या बचा है? असल में, काफ़ी कुछ बचा है.

आज जिसे क्रैश कहा जा रहा है, उनमें से ज़्यादातर असल में क्रैश नहीं हैं. 2020 का कोविड करेक्शन ज़ोरदार था, लेकिन कुछ ही महीनों में बाज़ार संभल गया. 2021–22 की गिरावट चुभी ज़रूर, लेकिन नए हाई जल्दी दिखने लगे. ये वो लंबे, थकाने वाले और मनोबल तोड़ने वाले बेयर मार्केट नहीं थे, जो दिमाग़ नहीं, बल्कि सहनशक्ति की परीक्षा लेते हैं.

अपने 23 सालों में ये मैगज़ीन असली बेयर मार्केट देख चुकी है. डॉट-कॉम का हाहाकार. 2008 का क्रैश. ये V-शेप रिकवरी नहीं थीं. सबसे अच्छे हाल में U-शेप और कई लोगों के लिए L-शेप. असली बेयर मार्केट की पहचान शुरुआती गिरावट नहीं होती. गिरावट तो सबने देखी है. असल में ये ठीक होने के किसी भी संकेत के लिए महीनों, कभी-कभी सालों तक लगातार, हिम्मत तोड़ने वाला इंतज़ार होता है।

इसी वजह से तीन तरह के ख़तरों पर हमारी कवर स्टोरी इस समय बेहद प्रासंगिक है. लेकिन एक व्यवहार संबंधी लेयर भी है, जिस पर उतना ही ध्यान देने की ज़रूरत है. आज के निवेशक ख़तरे की जानकारी को उसके लिए तैयार होने से ग़लत तरीक़े से जोड़ लेते हैं. उन्हें पता है कि क्रैश आते हैं. उन्हें पता है कि गिरावट अस्थायी होती हैं. लेकिन किसी बात को जानना और दो साल तक अपने पोर्टफ़ोलियो को उसके पीक से 40 प्रतिशत नीचे पड़ा हुआ देखना और फिर भी टिके रहना, ये दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं.

म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री, अपनी तमाम ख़ूबियों के बावजूद, यहां ज़्यादा मदद नहीं करती. सलाह हमेशा एक जैसी रहती है, निवेश में बने रहिए, लॉन्ग-टर्म सोचिए. ये सलाह सही है, लेकिन सबसे कठिन हिस्से को छोड़ देती है. वो है मनोवैज्ञानिक सहनशक्ति, जब लॉन्ग-टर्म अंतहीन लगने लगे और निवेश में बने रहना बेवक़ूफ़ी जैसा महसूस हो. इंडस्ट्री उतार-चढ़ाव और गिरावट की बात तो करती है, लेकिन शायद ही कभी ये पूछती है कि ऐसा होने पर व्यवहार कैसा रहेगा.

ये इसलिए अहम है क्योंकि क्रैश के दौरान निवेशक का व्यवहार निवेश सिद्धांतों की जानकारी से तय नहीं होता. ये उन बातों से तय होता है, जिन पर ज़्यादातर लोग पहले कभी सोचते ही नहीं. जैसे पैसों की असली ज़रूरत, रोज़ के नुक़सान देखने की सहनशक्ति, बाज़ार और मीडिया के शोर को नज़रअंदाज़ करने की क्षमता और सबसे अहम, क्या पोर्टफ़ोलियो ऐसा बनाया गया है जो सैद्धांतिक रिस्क टॉलरेंस से नहीं, बल्कि असल नुक़सान सहने की क्षमता से मेल खाता हो.

विडंबना ये है कि ज़्यादातर निवेशक अपना समय इन्हीं बातों को छोड़कर बाक़ी सब पर लगाते हैं. फ़ंड चुनने पर बहस, वैल्यूएशन ट्रैक करना, क्रैश की भविष्यवाणियां देखना. लेकिन ये सवाल नहीं पूछते कि क्या पोर्टफ़ोलियो नहीं, खुद का स्ट्रेस-टेस्ट किया है. क्या पहले से तय किया है कि घबराहट आने पर क्या किया जाएगा. क्या ऐसा डाइवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो बनाया है, जिसके साथ तब भी टिके रह सकें, जब हर भावना बेचने के लिए मजबूर कर रही हो.

जब कवर स्टोरी पढ़ी जाएगी, तो प्रोडक्ट रिस्क, व्यवहार संबंधी रिस्क और फ़िट रिस्क (जब निवेश निवेशक की असल ज़रूरतों, क्षमताओं आदि से मेल नहीं खाए) का टेक्निकल फ़्रेमवर्क पोर्टफ़ोलियो को सही तरह से परखने के टूल देगा. लेकिन असली काम इससे कहीं ज़्यादा निजी है. इसके लिए आपको खुद से “क्या आप सिद्धांत रूप में वोलैटिलिटी को संभाल सकते हैं” के बजाय ये पूछना कि क्या आपने ईमानदारी से अपनी सहनशक्ति के बारे में अपनी मान्यताओं का टेस्ट किया है. असल में, जब असली क्रैश आएगा, और वो आएगा ही, तो वही ख़तरा मायने रखेगा, जिसे बिना जाने आप साथ लेकर चल रहे हैं.

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