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सारांशः भारत में बैटरी स्टोरेज का उछाल साफ़ दिखता है. लेकिन निवेश का मौक़ा इतना सीधा नहीं है. वैल्यू चेन को समझना और ये जानना कि कौन से खिलाड़ी अहम दांव लगा रहे हैं, यही बताता है कि असल मौक़ा कहां है.
हमारी पिछली स्टोरी में ये तर्क दिया गया था कि भारत के रिन्यूएबल एनर्जी ट्रांज़िशन में एनर्जी स्टोरेज एक गायब कड़ी है. इसके बिना, हवा और सोलर से बनने वाली वो बिजली बर्बाद हो जाती है, जो हर समय ग्रिड में समाहित नहीं हो पाती. इससे निवेशकों के लिए एक स्वाभाविक सवाल खड़ा होता है: आख़िर इस कमी को कौन पूरा कर रहा है और बैटरी स्टोरेज इकोसिस्टम के भीतर असल वैल्यू कहां बन रही है?
बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम यानी BESS को समझने का एक उपयोगी तरीक़ा ये है कि इसे परतों वाले ढांचे के रूप में देखा जाए. ये सिस्टम बिजली को स्टोर करता है और ज़रूरत पड़ने पर रिलीज़ करता है. सबसे नीचे स्पेशलाइज़्ड केमिकल्स और मटीरियल्स होते हैं. उसके ऊपर बैटरी सेल्स आते हैं, फिर उनसे बने पैक. इसके ऊपर पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ़्टवेयर होते हैं, जो बैटरियों को ग्रिड से जोड़ते हैं. सबसे ऊपर EPC खिलाड़ी होते हैं, जो ज़मीन पर सब कुछ जोड़कर तैयार करते हैं.
हम इस ढांचे को परत-दर-परत समझते हैं और इस पर ध्यान देते हैं कि भारतीय लिस्टेड कंपनियां असल में क्या बना रही हैं:
1) बैटरी केमिकल्स: शांत लेकिन मज़बूत नींव
बैटरी सेल बनने से पहले, किसी को उसकी केमिस्ट्री उपलब्ध करानी होती है. इसमें इलेक्ट्रोलाइट्स, लिथियम सॉल्ट्स, कैथोड पाउडर और बाइंडर्स शामिल हैं. ये वैल्यू चेन का सबसे कम दिखने वाला हिस्सा है, लेकिन इसे दोहराना सबसे मुश्किल भी है.
वैश्विक स्तर पर इस लेयर पर चीनी, कोरियाई और जापानी कंपनियों का दबदबा है. लेकिन भारत में अब कई स्पेशलिटी केमिकल कंपनियां इसमें बड़ी रक़म लगाने लगी हैं.
नियोजेन केमिकल्स ने बैटरी मटीरियल्स को अपनी लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी के केंद्र में रखा है. कंपनी इलेक्ट्रोलाइट्स और लिथियम सॉल्ट्स के लिए लगभग ₹1,500 करोड़ के कैपेक्स की योजना बना रही है. इसका LiPF₆ (एक लिथियम सॉल्ट) जॉइंट वेंचर पायलट स्तर से बढ़कर कई हज़ार टन की क्षमता तक पहुंचाने का लक्ष्य रखती है.
गुजरात फ्लोरोकेमिकल्स, GFCL EV प्रोडक्ट्स के ज़रिए, गुजरात में भारत का पहला पूरी तरह इंटीग्रेटेड बैटरी-मटीरियल प्लांट बना रही है. इसमें LiPF₆, LFP कैथोड्स (लिथियम-आयन बैटरियों में पॉज़िटिव इलेक्ट्रोड), इलेक्ट्रोलाइट फ़ॉर्म्युलेशन और पॉलिमर बाइंडर्स शामिल हैं. इस प्रोजेक्ट को वर्ल्ड बैंक की इकाई इंटरनेशनल फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन से $50 मिलियन का निवेश मिला है.
अक्यूटास केमिकल्स (पहले अमी ऑर्गेनिक्स) झगड़िया में फ़ाइनेंशियल ईयर 26 तक सालाना 4,000 टन की इलेक्ट्रोलाइट एडिटिव्स क्षमता जोड़ रही है. ये ₹250 करोड़ के बैटरी-केंद्रित विस्तार का हिस्सा है.
हिमाद्री स्पेशलिटी केमिकल्स भारत का पहला कमर्शियल LFP कैथोड प्लांट लगा रही है. इसकी शुरुआती क्षमता 40,000 टन होगी, जिसे पांच से छह साल में 2 लाख टन तक बढ़ाया जा सकता है. यह लगभग 100 GWh सेल प्रोडक्शन को सपोर्ट करने के लिए काफ़ी है.
टाटा केमिकल्स ने अलग रास्ता चुना है. कंपनी लिथियम-आयन रीसाइक्लिंग पर फोकस कर रही है, ताकि इस्तेमाल हो चुकी बैटरियों से कैथोड मटीरियल्स और धातुएं वापस निकाली जा सकें.
ये लेयर इसलिए अहम है क्योंकि बैटरी-ग्रेड केमिकल्स साधारण कमोडिटी नहीं हैं. इनकी केमिस्ट्री जटिल होती है, अप्रूवल्स लंबे समय तक टिकते हैं और एक बार सप्लायर तय हो जाने के बाद कॉन्ट्रैक्ट आमतौर पर लंबे समय तक चलते हैं.
2) सेल्स और गीगाफैक्ट्रियां: जहां जोखिम बढ़ता है
बैटरी सेल किसी भी स्टोरेज सिस्टम का दिल होते हैं और ये वही हिस्सा है जो सोलर मॉड्यूल की रेस से सबसे ज़्यादा मिलता-जुलता है. ये कैपिटल-इंटेंसिव है, टेक्नोलॉजी के मामले में सख़्त है और पहले से ही चीनी ओवरकैपेसिटी से घिरा हुआ है.
वैश्विक स्तर पर भारतीय खिलाड़ी छोटे हैं, लेकिन कई लिस्टेड कंपनियां यहां बड़ी रक़म लगा रही हैंः
एक्साइड इंडस्ट्रीज़ बेंगलुरु के पास दो चरणों में 12 GWh की लिथियम-आयन सेल फैक्ट्री बना रही है. इसमें अब तक लगभग ₹3,600–3,700 करोड़ लगाए जा चुके हैं और ट्रायल प्रोडक्शन FY25 के अंत तक शुरू करने का लक्ष्य है.
अमरा राजा एनर्जी एंड मोबिलिटी अगले दशक में तेलंगाना में 16 GWh की सेल क्षमता और 5 GWh की पैक असेंबली की योजना बना रही है. कुल निवेश लगभग ₹9,500 करोड़ का है. FY27 तक शुरुआती 1 GWh चरण के लिए ₹1,200 करोड़ अलग से लगाए जाएंगे.
रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जामनगर में एक गीगाफैक्ट्री बना रही है, जिसकी शुरुआती क्षमता 40 GWh होगी और जिसे 100 GWh तक बढ़ाया जा सकेगा. इसमें सेल्स, पैक और रीसाइक्लिंग शामिल हैं.
वारी एनर्जीज़ ने अपने सोलर कारोबार के साथ-साथ लिथियम-आयन सेल प्लांट के लिए ₹300 करोड़ तय किए हैं.
ओला इलेक्ट्रिक इस समय एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल-PLI स्कीम की इकलौती लाभार्थी है, जिसकी 1 GWh सेल क्षमता चालू हो चुकी है. स्केल होने पर इसकी होम-बैटरी लाइन ही सालाना लगभग 5 GWh की खपत कर सकती है.
निवेशकों के नज़रिये से ये सबसे ख़तरनाक लेयर है. अकेले चीन की सेल क्षमता वैश्विक मांग से ज़्यादा है, क़ीमतें तेज़ी से गिर रही हैं और टेक्नोलॉजी साइकिल छोटी है. यहां अपसाइड बड़ा है, लेकिन यह जोखिम भी है कि घरेलू खिलाड़ी बेहद भीड़भाड़ वाले बाज़ार में फंस जाएं.
3) पैक और कंटेनर: हार्डवेयर को जोड़ना
ज़्यादातर ग्रिड-स्केल BESS प्रोजेक्ट शिपिंग कंटेनरों की कतारों जैसे दिखते हैं. इन धातु के बॉक्सों में सेल रैक्स, कूलिंग सिस्टम, सेफ़्टी हार्डवेयर और बैटरी-मैनेजमेंट सिस्टम होते हैं.
इस लेयर में वैल्यू सेल क़ीमत में CATL जैसी चीनी लीडर को हराने से नहीं आती. यहां असली वैल्यू इंटीग्रेशन, सेफ़्टी इंजीनियरिंग और प्रोजेक्ट के मुताबिक कस्टमाइज़ेशन से आती है.
गोदावरी पावर एंड इस्पात, अपनी सब्सिडियरी गोदावरी न्यू एनर्जी के ज़रिए, महाराष्ट्र में 10 GWh की BESS इंटीग्रेशन फैसिलिटी लगा रही है. इसमें लगभग ₹300 करोड़ का इक्विटी रेज़ और कुल मिलाकर करीब ₹700 करोड़ का आउटले शामिल है. कंपनी घरेलू या वैश्विक सप्लायर्स से सेल ख़रीदकर उन्हें कंटेनर सिस्टम में इंटीग्रेट करेगी.
सर्वोटेक रिन्यूएबल पावर सिस्टम्स ने चीन की झुहाई पिविन के साथ साझेदारी की है, ताकि हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र के साथ मॉड्यूलर BESS यूनिट्स भारत में बनाई जा सकें.
वारी एनर्जीज़ सोलर मॉड्यूल्स से आगे बढ़कर पूरे स्टोरेज सिस्टम्स की ओर जा रही है. इसे ₹125 करोड़ की पूंजी जुटाने और शुरुआती यूटिलिटी-स्केल ऑर्डर्स का सहारा मिला है.
ओरियाना पावर, जो परंपरागत रूप से सोलर EPC रही है, अब एक अलग BESS वर्टिकल बना रही है. FY26 तक इसके पास 2 GWh की पाइपलाइन है और 2030 तक 20 GWh का लक्ष्य है, ताकि कंटेनर और कंट्रोल्स के साथ एंड-टू-एंड समाधान दिए जा सकें.
व्यावसायिक रूप से ये लेयर इस बात पर टिकी है कि सिस्टम की क़ीमतें चीनी हार्डवेयर के साथ कितनी तेज़ी से नीचे आती हैं और क्या भारतीय इंटीग्रेटर्स डिज़ाइन, भरोसेमंदी और सर्विस के ज़रिए वैल्यू पकड़ पाते हैं या सिर्फ़ धातु के बॉक्स बेचकर रह जाते हैं.
4) पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ़्टवेयर: स्टोरेज का दिमाग़
कंट्रोल्स के बिना बैटरी सिर्फ़ लिथियम का महंगा ढेर है. पावर-कन्वर्ज़न सिस्टम, इन्वर्टर और सॉफ़्टवेयर तय करते हैं कि BESS ग्रिड एसेट के रूप में कैसे काम करेगा. यही सिस्टम फ़्रीक्वेंसी बदलाव पर प्रतिक्रिया देते हैं, चार्ज साइकिल मैनेज करते हैं और सहायक सेवाएं देते हैं.
भारत में यहां कोई प्योर-प्ले लिस्टेड सॉफ़्टवेयर कंपनी नहीं है. ज़्यादातर इंटेलिजेंस हार्डवेयर के साथ जुड़ी हुई आती है.
हिताची एनर्जी इंडिया PCS और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म सप्लाई करती है, जो पावर इलेक्ट्रॉनिक्स को ग्रिड-मैनेजमेंट सॉफ़्टवेयर से जोड़ते हैं.
HBL इंजीनियरिंग इंटीग्रेटेड बैटरी-मैनेजमेंट सिस्टम और कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स देती है.
सीमेंस इंडिया, GE T&D इंडिया और श्नाइडर इलेक्ट्रिक इंफ्रास्ट्रक्चर ऑटोमेशन, प्रोटेक्शन रिले और SCADA सिस्टम सप्लाई करती हैं, जिन्हें अब तेज़ी से BESS के साथ जोड़ा जा रहा है.
हाई-एंड सॉफ़्टवेयर IP अभी भी ज़्यादातर मल्टीनेशनल कंपनियों के पास है. लेकिन जैसे-जैसे भारत के ग्रिड में ज़्यादा जटिल सेवाओं की मांग होगी, ये लेयर चुपचाप एक मज़बूत मोट (MOAT) बन सकती है.
5) EPC और इंटीग्रेटर्स: ज़मीन पर स्टील लगाना
आख़िर में EPC कॉन्ट्रैक्टर्स पूरे स्टोरेज प्रोजेक्ट को क्लाइंट तक पहुंचाते हैं. इसमें शुरुआती डिज़ाइन से लेकर बैटरियों समेत सभी ज़रूरी हिस्सों की सोर्सिंग, इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग तक सब शामिल होता है.
लार्सन एंड टुब्रो BESS EPC के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में उभरकर सामने आई है. कंपनी को सोलर-प्लस-स्टोरेज के कई बड़े ऑर्डर मिले हैं और ये स्टैंडअलोन BESS टेंडर्स में भी सक्रिय है.
वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज़, जो वारी एनर्जीज़ से अलग है, अपने स्टोरेज आर्म या थर्ड-पार्टी सप्लायर्स के हार्डवेयर का इस्तेमाल कर सोलर-प्लस-स्टोरेज प्रोजेक्ट्स में EPC की भूमिका निभाती है.
ये एक जाना-पहचाना कारोबार है. यहां स्केल, एग्ज़ीक्यूशन और बैलेंस-शीट की मज़बूती सबसे ज़्यादा मायने रखती है. जैसे-जैसे टेंडर्स स्टैंडर्ड होते जाएंगे, यहां मार्जिन सोलर-EPC स्तरों की ओर खिसक सकते हैं.
तो निवेशकों के लिए वैल्यू कहां बनती है?
बैटरी स्टोरेज में इस समय दो ताक़तवर रुझान आमने-सामने हैं. पहला, क़ीमतों का तेज़ी से गिरना. चीनी ओवरकैपेसिटी और सस्ते कच्चे माल की वजह से लिथियम-आयन पैक की क़ीमतें तेज़ी से घटी हैं. चीन की योजनाबद्ध क्षमता अब कई टेरावॉट-घंटे तक पहुंच चुकी है, जो वैश्विक मांग से कहीं ज़्यादा है.
दूसरा, भारत में इसकी पहुंच अब भी असमान है. 2021 के बाद से 80 GWh से ज़्यादा BESS टेंडर किए जा चुके हैं, लेकिन असल में कमीशंड क्षमता सिर्फ़ 500 MWh के आसपास है. कैंसलेशन भी बढ़ रहे हैं. हालिया बोली ₹1.5 प्रति kWh तक चली गई है, जो भारी भीड़, बेहद सीमित मार्जिन और सेफ़्टी से समझौता होने के ख़तरे की ओर इशारा करती है.
निष्कर्ष ये नहीं है कि स्टोरेज अनाकर्षक है, बल्कि ये कि इंडस्ट्री अभी भी अपने मंथन के दौर में है. पूरी वैल्यू चेन में क्षमता अनुशासन से तेज़ी से आई है. इतिहास बताता है कि ये दौर हमेशा नहीं रहता. जैसे ही क़ीमतें स्थिर होंगी, कमज़ोर बैलेंस-शीट्स पर दबाव बढ़ेगा और एग्ज़ीक्यूशन की अहमियत बढ़ेगी, कंसॉलिडेशन होगा. और इसी झटके के बाद, चाहे सेल्स हों, सिस्टम हों या सर्विसेज़, भारत के बैटरी-स्टोरेज इकोसिस्टम के असल लॉन्ग-टर्म विजेता सामने आएंगे.
वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र में हम इस सेक्टर को क़रीब से ट्रैक कर रहे हैं. शोर के बीच दो कंपनियां अपनी बैलेंस-शीट की मज़बूती, कैपिटल डिसिप्लिन और लंबे शेक-आउट को झेलने की क्षमता की वजह से अलग दिखती हैं. ये कंसॉलिडेशन से बचने ही नहीं, बल्कि उससे फ़ायदा उठाने की स्थिति में भी हैं.
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ये लेख पहली बार दिसंबर 17, 2025 को पब्लिश हुआ.
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