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सब्र रखने की समस्या

क्यों निवेश में टिके रहना जन्मजात स्वभाव नहीं, बल्कि सीखी जाने वाली एक स्किल है

फ़ंड चुनने से ज़्यादा इन्वेस्टर की जल्दबाजी क्यों नुक़सान देती है

सारांशः चार्ली मंगर और पीटर लिंच की समझ से प्रेरित यह लेख बताता है कि निवेशकों का कमज़ोर प्रदर्शन अक्सर गलत चुनावों से नहीं, बल्कि ज़रूरत से ज़्यादा एक्टिविटी से आता है. असली बात यह है कि धैर्य कोई पर्सनैलिटी से जुड़ी ख़ूबी नहीं, बल्कि एक ऐसी स्किल है जो सही स्ट्रक्चर के ज़रिये विकसित की जाती है.

अगस्त 2023 में, मैंने चार्ली मंगर द्वारा इस्तेमाल किए गए एक दिलचस्प शब्द-‘diworsification’-के बारे में लिखा था, जिसे पीटर लिंच ने गढ़ा था. मंगर का कहना था कि निवेशकों के लिए यह मानना “पूरी तरह पागलपन” (absolute insanity) है कि 4 या 5 शेयरों के बजाय 100 शेयर रखना उन्हें ज़्यादा प्रोफेशनल बना देता है. मैंने तर्क दिया था कि यही सोच म्यूचुअल फ़ंड्स पर भी लागू होती है. बहुत से निवेशक अपने पास मौजूद फ़ंड्स की संख्या को अपने पोर्टफ़ोलियो की क्वालिटी समझ बैठते हैं.

उस कॉलम में समस्या के एक पहलू-क्या (what)-पर बात की गई थी. बहुत ज़्यादा फ़ंड्स का मतलब है-ज़रूरत से ज़्यादा ओवरलैप और असली डाइवर्सिफ़िकेशन की कमी. लेकिन जैसा कि इस महीने की हमारी कवर स्टोरी दिखाती है, एक और पहलू है जो शायद इससे भी ज़्यादा नुक़सानदेह है-कैसे (how). यहां समस्या बहुत सारे फ़ंड्स की नहीं, बल्कि बहुत ज़्यादा एक्टिविटी की है. सही तरीक़े से बनाए गए पोर्टफ़ोलियो भी इस अतिरिक्त सक्रियता से कमज़ोर पड़ सकते हैं.

आंकड़े चौंकाने वाले हैं. निवेशक अक्सर अच्छा प्रदर्शन देखने के बाद फ़ंड्स में पैसा डालते हैं और ख़राब दौर आते ही पैसा निकाल लेते हैं. वे साइक्लिकल आउटपरफॉर्मेंस को भरोसेमंद मान लेते हैं और अंडरपरफॉर्मेंस को फ़ैसला. वे बार-बार रीबैलेंस करते हैं-विनर्स को काटते हैं और उसी कंपाउंडिंग को धीमा कर देते हैं, जिसकी उन्हें तलाश होती है. पैटर्न साफ़ है: अच्छे रिटर्न का सबसे बड़ा दुश्मन ख़राब फ़ंड चयन नहीं, बल्कि निवेशकों की बेचैनी है.

मुझे इसमें सबसे दिलचस्प बात यह लगती है. जब मैं ये निष्कर्ष निवेशकों से साझा करता हूं, तो जवाब लगभग हमेशा एक जैसा होता है-“मुझे पता है कि मुझे ज़्यादा धैर्य रखना चाहिए, लेकिन मैं ऐसा बना ही नहीं हूं.” इसके पीछे यह मान्यता छिपी होती है कि धैर्य कोई पर्सनैलिटी की ख़ूबी है-कुछ ऐसा जो या तो आपके पास होता है या नहीं, जैसे लंबा कद या घुंघराले बाल. इस सोच के मुताबिक, धैर्यवान निवेशक एक ख़ास किस्म के लोग होते हैं और बाक़ी लोगों को अपनी चंचल प्रवृत्ति और उससे जुड़े कमज़ोर रिटर्न को स्वीकार कर लेना चाहिए.

मैं इस बात से सहमत नहीं हूं. निवेश में धैर्य कोई जन्मजात स्वभाव नहीं है. यह एक स्किल है, जिसे विकसित किया जा सकता है. और ज़्यादातर स्किल्स की तरह, यह इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि स्ट्रक्चर से बनती है.

इस पर विचार कीजिए कि हमारी कवर स्टोरी जिसे “पोर्टफ़ोलियो ऑपरेटिंग सिस्टम” कहती है-एक ऐसा फ़्रेमवर्क, जहां हर फ़ंड की एक तय भूमिका होती है, जहां सटीक लक्ष्य के बजाय रेंज को स्वीकार किया जाता है, और जहां बदलाव तभी किया जाता है जब कोई फ़ंड अपना तय काम करना बंद कर दे, न कि तब जब रेटिंग गिर जाए या बाज़ार का रुख बदल जाए. यह स्वभाव से धैर्यवान लोगों के लिए नहीं बना है. यह आम निवेशकों को धैर्य से व्यवहार करने में मदद करने के लिए बनाया गया सिस्टम है.

यह फ़र्क़ बहुत मायने रखता है. जब धैर्य को पर्सनैलिटी की ख़ूबी माना जाता है, तो जिन निवेशकों में यह नहीं होता, वे खुद को बेबस महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि उनके पास दो ही रास्ते हैं-या तो अपने स्वभाव से लड़ें, जो अक्सर बेकार साबित होता है, या यह मान लें कि लंबी अवधि का निवेश उनके लिए नहीं है. लेकिन जब धैर्य को एक संरचनात्मक नतीजे के रूप में देखा जाता है, तो पूरी तस्वीर बदल जाती है. आपको खुद को बदलने की ज़रूरत नहीं होती. आपको ऐसा सिस्टम चाहिए, जो धैर्यपूर्ण व्यवहार को सबसे आसान रास्ता बना दे.

इसीलिए हमारी कवर स्टोरी का सिद्धांत-“निगरानी नहीं, लय (rhythm not surveillance)”-मुझे इतना प्रभावी लगता है. अपने पोर्टफ़ोलियो को तिमाही या छमाही आधार पर देखना किसी असाधारण आत्म-नियंत्रण की बात नहीं है. इसका मकसद उस लगातार उत्तेजना को हटाना है, जो बेवजह के फ़ैसलों को जन्म देती है. आप बदलाव की इच्छा को दबा नहीं रहे होते; आप उन परिस्थितियों को ही खत्म कर रहे होते हैं, जो यह इच्छा पैदा करती हैं.

Mutual Fund Insight मैगज़ीन को 23 साल तक प्रकाशित करने के अनुभव ने मुझे सिखाया है कि सफल निवेशक वे नहीं होते, जिनमें भावनात्मक दूरी बनाने की कोई दुर्लभ क्षमता होती है. वे ऐसे लोग होते हैं, जिन्होंने अपने व्यवहार के चारों ओर सुरक्षा रेलिंग्स बना ली होती हैं. वे यह स्वीकार कर चुके होते हैं कि निवेश में ऑप्टिमाइज़ेशन से ज़्यादा सहनशक्ति की ज़रूरत होती है, और उन्होंने अपने पोर्टफ़ोलियो और अपनी आदतों को उसी हिसाब से ढाल लिया होता है.

अगर आपने कभी यह सोचा है कि आप लंबी अवधि के निवेश के लिए बने ही नहीं हैं, तो मैं आपको सलाह दूंगा कि हमारी कवर स्टोरी को एक नई नज़र से पढ़ें. समस्या शायद आपके स्वभाव में नहीं है. संभव है कि आप एक संरचनात्मक समस्या को सिर्फ़ इच्छाशक्ति से हल करने की कोशिश कर रहे हों.

यह भी पढ़ेंः पूर्वानुमानों को नज़रअंदाज़ करें, प्रक्रिया को दुरुस्त रखें

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