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सारांशः एक पूरी पीढ़ी के निवेशकों के लिए पैसा लगभग मुफ़्त जैसा रहा और उसके नतीजों का कोई डर नहीं था. अब वैश्विक बॉन्ड बाज़ार में हो रहा एक शांत लेकिन ऐतिहासिक बदलाव, इस सोच को चुनौती दे रहा है. जब पैसे की क़ीमत फिर से महसूस होने लगती है, तो क्या बदलता है? और निवेशकों को इसकी परवाह अभी क्यों करनी चाहिए?
जितना ज़्यादातर कामकाजी लोग याद कर सकते हैं, उतने लंबे समय से पैसा लगभग मुफ़्त ही रहा है. पूरी तरह शून्य तो नहीं, लेकिन इतना सस्ता कि उसका फ़र्क़ महसूस नहीं होता था. अगर उम्र 40 साल से कम है और फ़ाइनेंस, स्टार्ट-अप या निवेश से जुड़ी दुनिया में काम किया है, तो पूरा करियर ऐसे दौर में बीता है, जहां पूंजी को लगभग मुफ़्त माना गया. वह दौर अब ख़त्म हो रहा है और जापान की 30 साल की बॉन्ड यील्ड का एक चार्ट, किसी भी एक्सपर्ट की बात से ज़्यादा साफ़ तस्वीर दिखाता है.
जापान के 30 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 3.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है. यह क्यों अहम है, इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि जापान ने सिर्फ़ फ़्री मनी के वैश्विक प्रयोग में हिस्सा नहीं लिया था, बल्कि उसकी शुरुआत ही वहीं से हुई थी.
1999 में, जब दुनिया के दूसरे हिस्से अपने-अपने जश्न में डूबे थे, जापान ने ज़ीरो इंटरेस्ट रेट पॉलिसी लागू की. वे इसके सबसे पहले समर्थक थे, सबसे ज़्यादा भरोसा करने और सबसे लंबे समय तक इस पर टिके रहने वाले भी थे. क़रीब एक चौथाई सदी तक जापान दुनिया का ATM बना रहा.
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हर तरह के हेज फ़ंड, कंपनियां और सट्टेबाज़, लगभग शून्य ब्याज़ पर येन में उधार लेकर दूसरी जगह निवेश करते रहे. इसे कैरी ट्रेड कहा गया और यह लगभग बिना मेहनत के पैसा कमाने जैसा था.
पिछले 25 सालों में ज़्यादातर समय जापान के 30 साल के बॉन्ड की यील्ड 0.5 से 2.5 प्रतिशत के बीच रही. 2016 में तो ये 0.5 प्रतिशत से भी नीचे चली गई थी. और अब? अचानक ऊपर की ओर तेज़ उछाल, ऐसे स्तर तक, जो ज़्यादातर लोगों के करियर शुरू होने से पहले देखे गए थे.
अगर इंसानी इतिहास में सबसे ज़्यादा ढीली मौद्रिक नीति अपनाने वाला देश, यानी जापान, भी फ़्री मनी की इस सोच को बनाए नहीं रख पा रहा है, तो यह साफ़ है कि यह दौर अब पूरी तरह ख़त्म हो चुका है.
तो भारतीय निवेशकों को जापान की बॉन्ड यील्ड की परवाह क्यों करनी चाहिए? इसलिए, क्योंकि फ़्री मनी के दौर ने आधुनिक बिज़नेस और निवेश की सोच को गहराई से प्रभावित किया था. अब उन्हीं धारणाओं की असली परीक्षा हो रही है.
जब पूंजी की कोई क़ीमत नहीं होती, तो उसके साथ वैसा ही बर्ताव किया जाता है. 2010 के दशक का पूरा स्टार्टअप मार्केट इसी सोच पर टिका था. ज़रूरत से ज़्यादा पैसा उठाओ, किसी भी क़ीमत पर तेज़ी से बढ़ो, मुनाफ़े की चिंता बाद में करो, या कभी मत करो. वीवर्क महंगे सोफ़ों और मुफ़्त बीयर पर अरबों ख़र्च कर सकता था. उबर हर राइड को लागत से कम क़ीमत पर चला सकता था.
क्रिप्टो सिर्फ़ भरोसे के सहारे अनंत रिटर्न का वादा कर सकती थी. जब पूंजी की क़ीमत शून्य हो, तो कोई भी बिज़नेस मॉडल काग़ज़ पर सही दिखाया जा सकता है.
भारतीय निवेशकों ने भी यही तर्क अपने यहां काम करते देखा. जिन कंपनियों ने कभी मुनाफ़ा नहीं कमाया और कुछ मामलों में जिनके बिज़नेस मॉडल में मुनाफ़ा कमाना स्ट्रक्चर के हिसाब से मुश्किल था, उनकी बहुत ऊंची वैल्यूएशन सिर्फ़ उसी दुनिया में समझ में आती थी, जहां पूंजी की कोई क़ीमत नहीं थी.
पूंजी के प्रति सम्मान
जब ‘डिजिटल कंपनियां’ भारी नुक़सान के बावजूद अरबों जुटा रही थीं, तो यह मान लिया गया था कि पैसा हमेशा सस्ता ही रहेगा. आज बढ़त, कल मुनाफ़ा, और टिकाऊपन पर कोई सवाल नहीं. अब इसी सोच पर काफ़ी सख़्ती से सवाल उठ रहे हैं.
एक बात है, जो इस ग़लती को साफ़ पकड़ती है. पूंजी के प्रति सम्मान. जब ब्याज़ दरें शून्य होती हैं, तो पूंजी के प्रति सम्मान भी नहीं रहता. संस्थापकों ने ज़रूरत से ज़्यादा फ़ंडिंग ली, क्योंकि पैसा आसानी से मिल रहा था. कंपनियों ने कर्ज़ लेकर अपने ही शेयर ख़रीदे, क्योंकि यह इक्विटी से सस्ता था. सरकारों ने बिना डर के घाटा चलाया, क्योंकि बॉन्ड बाज़ार ने कभी रोक नहीं लगाई.
फ़ाइनेंस की दुनिया की एक पूरी पीढ़ी ने ऐसा माहौल कभी देखा ही नहीं, जहां पूंजी की असली क़ीमत हो. उन्हें सच में नहीं पता कि सामान्य हालात कैसे होते हैं.
जापान बहुत लंबे समय तक टिका रहा, जो फ़्री मनी की सोच का आख़िरी बड़ा समर्थक था. लेकिन आख़िरकार वहां भी यह सोच टूट गई. आख़िरी विकेट गिर गया है. पारी अब समाप्त हो चुकी है.
निवेशकों के लिए इसका मतलब साफ़ है. पिछले 15 सालों में एसेट की क़ीमतों को ऊपर ले जाने वाली हवा अब सामने से आ रही है. अब कंपनियों को सिर्फ़ यूज़र बढ़ाने, ध्यान खींचने या बिक्री के आंकड़े दिखाने से काम नहीं चलेगा. उन्हें पूंजी पर असल रिटर्न दिखाना होगा.
इक्विटी वैल्यूएशन को अब असली कैश फ़्लो से सही ठहराना होगा, न कि सिर्फ़ बड़े बाज़ार की कहानियों से. वही कंपनियां टिकेंगी और आगे बढ़ेंगी, जिन्होंने हमेशा यह माना कि पूंजी की क़ीमत होती है और उसी हिसाब से उसका इस्तेमाल किया जाता है.
अनुशासित निवेशकों के लिए, जिन्होंने कभी बुनियादी सवाल छोड़ नहीं दिए, जो मुनाफ़े और रिटर्न ऑन इक्विटी जैसे सवाल पूछते रहे, जबकि बाकी लोग ग्रोथ की कहानियों के पीछे भागते रहे, यह दौर अच्छी ख़बर लेकर आया है. खेल फिर से उसी मैदान पर लौट रहा है, जिसे वे समझते हैं. फ़्री मनी का असर अब धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है. और हक़ीक़त, जैसा कि हमेशा होता है, फिर से अपनी जगह बना रही है.
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