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बेदम कानूनों का क्या फ़ायदा?

ऐसे कानूनों की कोई अहमियत नहीं, अगर उन्हें लागू करने से ग़लत काम करने वालों को वास्तव में नुक़सान न पहुंचे

ऐसे कानूनों की कोई अहमियत नहीं, अगर उन्हें लागू करने से ग़लत काम करने वालों को वास्तव में नुक़सान न पहुंचेAditya Roy/AI-Generated Image

कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में एक चुटकुला सुनाया था, जिसमें पिछली सरकार की अधिकार-आधारित कानून बनाने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया गया था. दो दोस्त जंगल में बाघ का शिकार करने गए. रास्ते में उन्होंने सोचा कि बाघ वाले इलाक़े में पहुंचने से पहले थोड़ा टहल लिया जाए. वे गाड़ी से उतरे और घूम ही रहे थे कि अचानक उनका सामना एक बाघ से हो गया. अब समस्या यह थी कि उन्होंने अपनी बंदूकें गाड़ी में ही छोड़ दी थीं. तभी उनमें से एक को एक शानदार आइडिया आया. उसने जेब से अपनी बंदूक का लाइसेंस निकाला और बाघ को दिखाते हुए कहा-देखो, मेरे पास लाइसेंस है.

यह चुटकुला इसलिए काम करता है क्योंकि हम सब सहज रूप से समझते हैं कि काग़ज़ का एक टुकड़ा बाघ पर कोई असर नहीं डालता. बाघ को आपके क़ानूनी अधिकारों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. बाघ वही करेगा, जो बाघ करते हैं.

पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर काफ़ी चर्चा हो रही है. वेनेजुएला में अमेरिका की कार्रवाइयों और ग्रीनलैंड को लेकर दी गई धमकियों ने संप्रभुता, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है. कानूनी विशेषज्ञों ने गंभीर लेख लिखे हैं. सरकारों ने सख्त बयान जारी किए हैं. सोशल मीडिया स्थापित नियमों के उल्लंघन पर नैतिक आक्रोश से भरा पड़ा है.

इन तर्कों के मूल भाव से मैं पूरी तरह सहमत हूं. जिन सिद्धांतों का हवाला दिया जा रहा है, वे सही हैं. जिन कानूनी ढांचों की बात हो रही है, वे वैध हैं. और फिर भी, मुझे लगता है कि इस सारी चर्चा में एक बुनियादी ग़लतफ़हमी है-कि कानून और नियम असल में होते क्या हैं और काम कैसे करते हैं. बहुत से लोग आज भी बाघ को अपना लाइसेंस दिखा रहे हैं.

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यह एक असहज सच है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वित्तीय बाज़ार-दोनों पर समान रूप से लागू होता है: काग़ज़ पर लिखे शब्दों में अपने आप कोई ताक़त नहीं होती. कोई कानून, नियम, चार्टर या संधि-ये सब स्याही की जमावट भर हैं. ये किसी को शारीरिक रूप से कुछ करने से रोक नहीं सकते. ये किसी ताक़तवर खिलाड़ी का हाथ पकड़कर उसे रोक नहीं सकते.

कानूनों को ताक़त उनकी भाषा या नैतिक स्पष्टता से नहीं मिलती. उन्हें ताक़त मिलती है परिणामों की निश्चितता से. कानून तब काम करता है जब उसका उल्लंघन करने वालों को यह यकीन हो कि नियम तोड़ने पर ऐसा दंड मिलेगा, जो सच में दर्द देगा. जैसे ही यह निश्चितता खत्म होती है, कानून महज एक सुंदर कल्पना बनकर रह जाता है.

यहीं से बात उस दुनिया पर आती है, जिसके बारे में मैं हर हफ़्ते लिखता हूं-भारत में फ़ाइनेंशियल रेगुलेशन. हमारे यहां वित्तीय उत्पादों की बिक्री को लेकर नियमों की कोई कमी नहीं है. सेबी के नियम हैं. IRDAI के नियम हैं. RBI के नियम हैं. इन नियमों को बार-बार अपडेट किया जाता है, सुधारा जाता है और फैलाया जाता है. जैसे ही कोई नया घोटाला सामने आता है, प्रतिक्रिया लगभग तय होती है-और बेहतर नियम बनाइए, और ज़्यादा खुलासे ज़रूरी बनाइए, और सख्त अनुपालन ढांचा खड़ा कीजिए.

फिर भी मिस-सेलिंग बेरोकटोक जारी है. बीमा एजेंट आज भी उन लोगों को महंगी एंडोमेंट पॉलिसी बेच रहे हैं, जिन्हें सिर्फ़ साधारण टर्म इंश्योरेंस चाहिए. बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर आज भी ऐसे ग्राहकों को जटिल उत्पाद बेच रहे हैं, जिन्हें वे समझते ही नहीं. डिस्ट्रीब्यूटर आज भी वही फ़ंड सुझाते हैं, जिनमें उनका कमीशन ज़्यादा हो, न कि ग्राहक का फ़ायदा. स्टॉकब्रोकर आज भी अपने ग्राहकों को डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग की ओर धकेलते हैं, यह जानते हुए कि यह खेल रिटेल निवेशकों के ख़िलाफ़ तय है. सेबी के आंकड़े-कि डेरिवेटिव्स में 90% ट्रेडर पैसा गंवाते हैं-भी नए शिकारों की इस कसीनो में एंट्री नहीं रोक पाए हैं.

हाल ही में X पर मैंने एक पोस्ट देखी. एक महिला ने बताया कि यूपी में रहने वाले उसके बुज़ुर्ग रिश्तेदारों के बैंक खाते में कुछ पैसे आए, क्योंकि उनका बेटा सिंगापुर में काम करता है. बैंक ने तुरंत उन पर बीमा पॉलिसी ख़रीदने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. बेटे ने कहा कि वह विदेश में है और लौटकर देखेगा. बैंक नहीं रुका. उनके कर्मचारी घर पहुंच गए, दस्तख़त और चेक की मांग की और चले गए. ज़रा सोचिए-बुज़ुर्ग माता-पिता, आस-पड़ोस के लोग जमा, तनाव का माहौल. दबाव इतना ज़्यादा था कि बुज़ुर्ग व्यक्ति की तबीयत बिगड़ गई. यह सब सिर्फ़ एक सेल्स टार्गेट के लिए.

यह कोई अकेली घटना नहीं है. यह आम चलन है. और ऐसा करने वालों को कोई असली सज़ा नहीं मिलती.

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क्यों? क्योंकि नियम तोड़ने पर मिलने वाली सज़ा, उससे होने वाले मुनाफ़े के मुक़ाबले बहुत मामूली है. कहीं जुर्माना, कहीं चेतावनी, थोड़ा-सा काग़ज़ी काम-ये सब बिज़नेस की लागत हैं, कोई वास्तविक रोक नहीं. गणित सीधा है: अगर धोखा देने पर मिलने वाली अपेक्षित सजा, उससे मिलने वाले मुनाफ़े से कम है, तो धोखा चलता रहेगा.

जो सच में काम करेगा, वह है ऐसी सख्त कार्रवाई, जो असली नुक़सान पहुंचाए. उल्लंघन करने वालों के लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द होने चाहिए. सबसे गंभीर मामलों में लोगों को आर्थिक तबाही झेलनी चाहिए. कुछ को जेल भी जाना चाहिए-खुले तौर पर, सबके सामने. सजा इतनी निश्चित और इतनी कठोर होनी चाहिए कि कोई भी समझदार व्यक्ति ऐसा जोखिम उठाने की हिम्मत न करे.

दरअसल, अगर आपके किसी परिचित के साथ इस तरह का बैंक उत्पीड़न होता है और आप थोड़े संसाधन वाले व्यक्ति हैं, तो मैं यह सुझाव दूंगा कि सीधे फ़ाइनेंशियल रेगुलेशन मशीनरी में फंसने के बजाय पुलिस में धोखाधड़ी की आपराधिक शिकायत दर्ज कराइए. अगर बड़ी संख्या में ‘रिलेशनशिप मैनेजरों’ को थाने जाकर बैठना पड़े, पुलिस के सवालों का जवाब देना पड़े, तो असर शायद कहीं ज़्यादा बड़ा होगा. फ़ाइनेंशियल रेगुलेटर्स धीमी गति से चलते हैं और मामूली पेनल्टी या सजा देते हैं. पुलिस, अपनी तमाम कमियों के बावजूद, ज़िंदगी तुरंत असहज बना सकती है.

देखिए कि कड़े ऑटोमेटेड सिस्टम और भारी जुर्मानों वाले शहरों में ट्रैफीक नियम कितनी प्रभावी तरह से लागू होते हैं. नियम अपने आप में बहुत जटिल नहीं होते. उन्हें पकड़े जाने की लगभग निश्चितता और सजा का असली दर्द कारगर बनाती है. इसकी तुलना उन शहरों से कीजिए, जहां वही नियम काग़ज़ पर तो हैं, लेकिन ढंग से लागू नहीं होते-वहां नियम सिर्फ़ सुझाव बन जाते हैं, जिन्हें ड्राइवर आराम से नज़रअंदाज़ कर देते हैं.

अंतरराष्ट्रीय मामलों में समानता साफ़ है. अंतरराष्ट्रीय कानून के पास कोई वैश्विक पुलिस नहीं है, कोई ऐसा विश्व न्यायालय नहीं है जिसकी सजा सच में लागू हो सके, और न ही ऐसा तंत्र है जो ताक़तवर देशों पर ऐसे परिणाम थोप सके, जिन्हें वे आसानी से टाल न सकें. इसका मतलब यह नहीं कि सिद्धांत ग़लत हैं. इसका मतलब यह है कि उन्हें लागू करने का ढांचा मौजूद नहीं है.

जो लोग आम निवेशकों की सुरक्षा की चिंता करते हैं, उनके लिए सबक़ साफ़ है. हमें बेहतर नियमों से चमत्कार की उम्मीद करना बंद करनी चाहिए. हमारे पास जो नियम हैं, वे ज़्यादातर काफ़ी हैं. कमी है तो उन्हें सच में दर्द देने वाले तरीक़े से लागू करने की इच्छाशक्ति की.

जब तक कुछ बीमा कंपनियों के अधिकारी सिस्टमेटिक मिस-सेलिंग के लिए व्यक्तिगत आर्थिक मार नहीं झेलते, जब तक कुछ बैंक मैनेजर बुजुर्ग ग्राहकों को परेशान करने के लिए जेल नहीं जाते, तब तक ठग हमारी रूल-बुक पर हंसते रहेंगे. बेहतर नियम, बिना बेहतर कार्रवाई के, सिर्फ़ ईमानदार खिलाड़ियों की लागत बढ़ाते हैं और बेईमानों को पहले की तरह काम करते रहने देते हैं.

खतरनाक जानवरों को लाइसेंस दिखाना बंद कीजिए.
पिंजरे बनाना शुरू कीजिए.

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