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आठ साल पहले, जब SEBI ने पहली बार म्यूचुअल फ़ंड कैटेगरी को तर्कसंगत बनाया था, तब मैंने लिखा था कि ये एक अच्छा विचार था, जिसे पूरी तरह सही तरीके से लागू नहीं किया गया. 2017 के सर्कुलर ने ओवरलैप होती स्कीमों के अव्यवस्थित हालात को घटाकर 36 कैटेगरी में बांध दिया. व्यवहार में, कुल फ़ंडों की संख्या सिर्फ़ 29 कम हुई. फ़ंड कंपनियों ने बिना ज़्यादा बदलाव किए पुराने प्रोडक्ट को नई कैटेगरी में फिट करने के रास्ते खोज लिए. ये वैसा ही था जैसे फर्नीचर इधर-उधर करके उसे रिनोवेशन कह दिया जाए.
आज, SEBI ने एक विस्तृत सर्कुलर जारी किया है जो पूरे फ़्रेमवर्क को बदल देता है. इसके कुछ हिस्सों ने सचमुच संतोष दिया. बाक़ी हिस्सों ने कैलकुलेटर उठाने पर मजबूर कर दिया कि दीवाली तक इंडस्ट्री कितने नए NFO लॉन्च करेगी.
अच्छी बात से शुरुआत करता हूं. SEBI ने सॉल्युशन-ओरिएंटेड स्कीम्स को ख़त्म कर दिया है. पूरी तरह. सब्सक्रिप्शन तुरंत रोक दिए गए. कई सालों से कहा जा रहा था कि रिटायरमेंट फ़ंड और चिल्ड्रन फ़ंड बस लेबल का खेल थे, जिन्हें एक अलग कैटेगरी की तरह पेश किया गया. “रिटायरमेंट फ़ंड” में लगाया गया एक रुपया, बैलेंस्ड फ़ंड में लगाए गए एक रुपये से अलग नहीं होता. म्यूचुअल फ़ंड को ये नहीं पता कि रक़म रिटायरमेंट पर ख़र्च होगी या लद्दाख की यात्रा पर. SEBI को यहां तक पहुंचने में आठ साल लगे, लेकिन किसी तरह पहुंच गया. मैं खुश हूं.
सेक्टोरल और थीमैटिक फ़ंड पर पोर्टफ़ोलियो ओवरलैप की सीमा भी स्वागत योग्य है. अब कोई भी सेक्टोरल या थीमैटिक फ़ंड दूसरे इक्विटी स्कीमों के साथ 50 प्रतिशत से ज़्यादा ओवरलैप नहीं रख सकता, जिसकी कैलकुलेशन रोज़ाना वैल्यू के आधार पर हर तिमाही की जाएगी. मौजूदा स्कीमों को पालन करने या मर्ज होने के लिए तीन साल मिलेंगे. ये उस समस्या पर सीधा प्रहार है जिसे कई सालों से बढ़ते देखा गया है, जहां थीमैटिक फ़ंड, डाइवर्सिफ़ाइड स्कीम से लगभग अलग पहचान नहीं रखते. “इंफ़्रास्ट्रक्चर थीम” फ़ंड जिसके टॉप होल्डिंग में रिलायंस, L&T और ICICI बैंक हों, वो लार्ज-कैप फ़ंड से अलग कैसे हुआ? अब कंपनियों को असली पोर्टफ़ोलियो डेटा से फ़र्क साबित करना होगा. इसकी अहमियत है.
ट्रू-टू-लेबल नामकरण नियम (यानि काम और नाम में मेल होना) भी देर से आया, लेकिन ज़रूरी था. अब स्कीम के नाम में “ऑपर्च्युनिटीज़” और “वेल्थ क्रिएटर्स” जैसे शब्द नहीं चलेंगे. अगर फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड हैं, तो वही कहिए.
अब, मुझे जो चिंता है उस पर आते हैं.
ये सर्कुलर सरल नहीं बनाता. ये दायरा बढ़ाता है. अब सेक्टोरल डेट फ़ंड्स भी होंगे, जो फ़ाइनेंशियल सर्विसेज, एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विशेष सेक्टर के कॉरपोरेट बॉन्ड में निवेश करेंगे. पहले से 17 डेट कैटेगरी से उलझे रिटेल निवेशक के लिए इसमें सेक्टोरल विकल्प जोड़ना ऐसा है जैसे भरी अलमारी को ठीक करने के लिए उससे बड़ी अलमारी ख़रीद ली जाए.
फिर लाइफ़ साइकिल फ़ंड्स, टारगेट-डेट फ़ंड जिनमें ग्लाइड पाथ होता है, कई एसेट क्लास हैं और हर AMC को छह तक लॉन्च करने की अनुमति होगी. विचार के स्तर पर ये सही है. ऐसा फ़ंड जो लक्ष्य के करीब आते-आते इक्विटी से डेट की ओर खुद-ब-खुद शिफ़्ट हो जाए, वाक़ई उपयोगी है. लेकिन इस इंडस्ट्री को अच्छे विचारों के साथ क्या करते देखा है. उन्हें बड़े पैमाने पर बनाया जाता है, तेज़ मार्केटिंग होती है और फिर अगली चीज़ की ओर बढ़ जाते हैं. अगर लगभग 40 AMC अपनी-अपनी 6 लाइफ़-साइकिल स्कीम लॉन्च करें, तो बाज़ार में 240 फ़ंड हो सकते हैं. निवेश को सरल बनाने के लिए बना प्रोडक्ट ही नया सवाल बन जाता है, “कौन-सा चुनें?”
फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स का फ़्रेमवर्क नियामकीय नज़रिये से से जटिल प्रोडक्ट जैसा है, जिसमें छह व्यापक कैटेगरी, हर एक में तीन विकल्प, रीजन केंद्रित लिस्ट और कई पन्नों तक फैले नामकरण के नियम शामिल हैं. किसी भी रिटेल निवेशक को “XYZ डोमेस्टिक एंड ओवरसीज डाइवर्सिफ़ाइड इक्विटी ऑल कैप ओमनी FOF” पढ़कर ये महसूस हो कि निवेश आसान हो गया है, ऐसा सोचना कठिन है.
म्यूचुअल फ़ंड नियमन में मूल चिंता हमेशा यही रही है: रेगुलेटर अलग-अलग कैटेगरी बनाता है ताकि निवेशक सही तुलना कर सकें. इंडस्ट्री उन कैटेगरी की सीमा तक जितने प्रोडक्ट संभव हों, उतने बनाती है, क्योंकि हर नया प्रोडक्ट एक NFO है, एक मार्केटिंग कैंपेन है, कमीशन का नया दौर है. हर बार जब SEBI नक्शे पर नई रेखा खींचता है, इंडस्ट्री उसे नए इलाक़े के रूप में देखती है.
औसत भारतीय निवेशक को लगभग चार तरह के फ़ंड चाहिए. कोर इक्विटी के लिए एक फ़्लेक्सी-कैप. स्थिरता के लिए एक शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फ़ंड. टैक्स सेविंग के लिए एक ELSS. और संभव हो तो एक हाइब्रिड फ़ंड. इसके अलावा सेक्टोरल फ़ंड, थीमैटिक फ़ंड, क्रेडिट रिस्क फ़ंड, लाइफ़-साइकिल फ़ंड, फंड ऑफ फंड ऑफ फंड्स, ये सब ज़्यादा से ज़्यादा वैकल्पिक हैं और कई बार जोखिम भरे भी. इस सर्कुलर ने इंडस्ट्री को बेचने के लिए और वैकल्पिक चीज़ें दे दी हैं.
दो साल बाद असली कसौटी ये नहीं होगी कि काग़ज़ी कंप्लायंस पूरा हुआ या नहीं. असली सवाल ये होगा कि औसत निवेशक के सामने कम और साफ़ विकल्प हैं या पहले से ज़्यादा जटिल भीड़. 30 साल से इस इंडस्ट्री को देखते हुए अंदाज़ा है कि दांव किस तरफ़ जाएगा. लेकिन ग़लत साबित होने में बेहद ख़ुशी होगी.
एक व्यावहारिक बात: SEBI द्वारा कैटेगरी की नई रेखाएं खींचने से भीड़ कम नहीं होती. अक्सर बढ़ जाती है. कुछ समय पहले जब निवेशकों के पोर्टफ़ोलियो देखे गए, तो चौंकाने वाली बात ये थी कि कई के पास 20 से ज़्यादा फ़ंड थे. ये डाइवर्सिफ़िकेशन नहीं है. ये दिशा खो देना है.
अगर पोर्टफ़ोलियो कई NFO सीज़न में जुटाई गई ख़रीदारी की टोकरी जैसा दिखने लगा है, तो समस्या स्ट्रैटेजी की नहीं, जमा करते जाने की है.
समय-समय पर सफ़ाई करना विकल्प नहीं है. ये ज़रूरी है.
यह ठीक वही भूमिका है जो Value Research Fund Advisor निभाता है.
ये पहले से मौजूद निवेश का एनालेसिस करता है और साफ़, बिना जटिल शब्दों के बताता है कि क्या Buy करें, क्या Hold रखें और क्या Sell करें. हर चीज़ सिर्फ़ इसलिए पोर्टफ़ोलियो में जगह पाने की हक़दार नहीं होती क्योंकि वो मौजूद है.
अनावश्यक दोहराव और ओवरलैप हटाने से निगरानी की थकान कम होती है. कम फ़ंड का मतलब साफ़ इरादा. और साफ़ इरादा बेहतर फ़ैसले की ओर ले जाता है.
ऐसे बाज़ार में जहां प्रोडक्ट लगातार बढ़ रहे हैं, ग्रोथ अक्सर घटाने से शुरू होती है.
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