Aditya Roy/AI-Generated Image
मैं पहले भी निवेश की एक आम सोच के उलट लगने वाली सच्चाई के बारे में लिख चुका हूं: निराशावादी लोग समझदार लगते हैं और आशावादी लोग पैसा बनाते हैं. अब पता चला है कि आशावादी लोग शायद ज़्यादा लंबी ज़िंदगी भी जीते हैं, इतनी लंबी कि अपने रिटर्न का फ़ायदा उठा सकें.
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट ने मेरा ध्यान एक ऐसी रिसर्च की ओर खींचा, जिसे ध्यान से पढ़ने लायक समझा जाना चाहिए, क्योंकि ये दो ऐसी चीज़ों को जोड़ती है जिनकी मुझे ख़ासी परवाह है: अच्छी सेहत और समझदारी भरा निवेश. ली और उनके साथियों की रिसर्च ने लोगों को लंबे समय तक ट्रैक किया और पाया कि जो लोग आशावाद के मामले में सबसे ऊपर वाले चौथाई हिस्से में थे, वे 11 से 15 प्रतिशत ज़्यादा लंबे समय तक जिए और उनके 85 साल की उम्र तक पहुंचने की संभावना सबसे कम आशावादी समूह की तुलना में 1.5 से 1.7 गुना ज़्यादा थी. ख़ास बात यह है कि रिसर्चर्स के स्मोकिंग, डाइट, एक्सरसाइज, शराब पीना, डिप्रेशन, BMI और सोशियो-इकोनॉमिक स्टेटस को कंट्रोल करने के बाद भी ये नतीजे सही साबित हुए. यानी आशावादी लोगों की लंबी उम्र सिर्फ़ इस वजह से नहीं थी कि वे सिगरेट नहीं पीते और सुबह टहलने जाते हैं.
एक अलग मेटा-एनालेसिस, जिसमें 2 लाख से ज़्यादा लोगों के डेटा को शामिल किया गया, ने पाया कि आशावादी लोगों में दिल से जुड़ी घटनाओं का जोखिम 35 प्रतिशत कम था. एक अन्य UCSF लैब ने पाया कि निराशावादी सोच का संबंध कोशिकाओं की तेज़ उम्र बढ़ने से है.
यह भी पढ़ेंः अपनी रिटायरमेंट प्लानिंग को नज़रअंदाज़ न करें
अब इससे पहले कि हम ज़्यादा उत्साहित हो जाएं, इस रिसर्च को संतुलित नज़र से पढ़ने के लिए एक अहम सावधानी ज़रूरी है. साथ-साथ होना, वजह होना नहीं होता. ये अध्ययन दिखाते हैं कि आशावाद और लंबी उम्र साथ दिखते हैं, लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि एक दूसरे की वजह हों. हो सकता है कि कुछ जेनेटिक, माहौल से जुड़े या स्वभाव के फ़ैक्टर्स दोनों चीज़ों में योगदान देते हों, यानी सकारात्मक सोच और लंबी उम्र में. रिसर्च दिलचस्प है, लेकिन ये कोई कंट्रोल्ड प्रयोग नहीं है.
फिर भी, चाहे वजह का सवाल कुछ भी हो, इस रिसर्च से एक नतीजा सच में दिलचस्प है. लेखकों ने साफ़ कहा है कि आशावाद बदला जा सकता है. ये कोई ऐसा स्थायी व्यक्तित्व गुण नहीं है जो या तो जन्म से हो या न हो.
निवेश से इसका रिश्ता लगभग साफ़ दिखता है, फिर भी इसे स्पष्ट कर देना ठीक है. मैं 2017 में ही इस पर लिख चुका हूं, जब मैंने कहा था कि सफल निवेशकों के लिए एक ख़ूबी ज़रूरी है: आशावाद. इसके बिना कुछ भी काम नहीं करता. निराशावादी के पास निवेश न करने की हमेशा कोई न कोई वजह होती है: वैल्यूएशन बहुत ऊंचे हैं, ग्लोबल माहौल अनिश्चित है, ये सेक्टर मुश्किल में दिख रहा है. और निराशावादी अक्सर जानकार भी लगते हैं, क्योंकि डर की कहानी का कोई न कोई भरोसेमंद रूप हमेशा मौजूद रहता है. आज का फैशनेबल रूप है AI Doomerism, यानी पूरा भरोसा कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस नौकरियां खत्म कर देगा, दौलत कुछ हाथों में सिमट जाएगी और भविष्य में निवेश करना बेकार हो जाएगा. हर पीढ़ी की तरह ये भी अपनी पसंदीदा तबाही की कहानी को पूरे बौद्धिक भरोसे के साथ पकड़ लेती है और उसी के सहारे कुछ न करने को सही ठहराती है. ये बात कि टेक्नोलॉजी ने बार-बार पुराने ढांचे बदले हैं और फिर अर्थव्यवस्था को और बड़ा बनाया है, डूमर्स (Doomers) को ज़्यादा परेशान नहीं करती.
यह भी पढ़ेंः जब शब्दों को आख़िरकार धार मिल सकती है
इस साल की शुरुआत में मैंने फिर लिखा था कि बाज़ार गिरने के समय नकारात्मक आवाज़ें सबसे ऊंची हो जाती हैं, ठीक उसी समय जब उन्हें सुनने वालों को सबसे ज़्यादा नुक़सान होता है. लंबी उम्र वाली रिसर्च इस निवेश वाली दलील में एक नया पहलू जोड़ती है. ये इशारा करती है कि ख़तरों पर बार-बार सोचना, हर नतीजे को तबाही मान लेना और हर बात में सबसे बुरा अर्थ निकालना जैसी निराशावाद की मानसिक आदतें सिर्फ़ पोर्टफोलियो के लिए ही नुक़सानदेह नहीं हैं. वे शरीर के लिए भी हानिकारक हो सकती हैं. वो निवेशक जो बाज़ार में गिरावट के कारण सो नहीं पाता, जो क़ीमतें बार-बार देखता रहता है, जो हर उतार-चढ़ाव को आर्थिक पतन की शुरुआत मान लेता है, वह सिर्फ़ कम रिटर्न की क़ीमत नहीं चुका रहा होता. इसकी क़ीमत उससे कहीं ज़्यादा हो सकती है.
इसके उलट, आशावादी निवेशक वो नहीं है जो जोखिम को नज़रअंदाज़ करे या ये मान ले कि बाज़ार हमेशा ऊपर ही जाएंगे. संतुलित निवेशक आशावाद बस ये भरोसा है कि उत्पादक एसेट्स समय के साथ वेल्थ बनाएंगी, इंसानी काम अपने आप ढल जाएगा और बढ़ेगा, और अस्थायी झटके लंबे रास्ते की दिशा नहीं बदलते. इस भरोसे को हर मार्केट साइकिल में बार-बार सही साबित होते देखा गया है.
जैसी स्थिति अभी है, ये सोच रिटर्न के लिए अच्छी लगती है. और संभव है कि सचमुच, ये ज़िंदगी के लिए भी अच्छी हो.
यह भी पढ़ेंः एक औसत निवेशक का मिथक






