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जब शब्दों को आख़िरकार धार मिल सकती है

RBI के नए मिस-सेलिंग नियम एक मोड़ साब़ित हो सकते हैं - अगर सख़्ती से लागू हों

RBI के नए मिस-सेलिंग नियम एक मोड़ साब़ित हो सकते हैं - अगर सख़्ती से लागू होंAditya Roy/AI-Generated Image

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कई सालों से मैं लिखता रहा हूं कि पर्सनल फ़ाइनेंस का सिस्टम आम बचत करने वालों की सेवा करने के बजाय उनसे रक़म निकालने के लिए बना है. कुछ ही हफ़्ते पहले मैंने जॉन कैंपबेल और तरुण रामदोराई की एक किताब पर चर्चा की थी, जो इस बात को पुख़्ता सबूतों के साथ रखती है. उनका कहना है कि फ़ाइनेंशियल इंडस्ट्री को मुनाफ़ा लोगों की ग़लतियों के बावजूद नहीं मिलता, बल्कि उन्हीं ग़लतियों की वजह से मिलता है. दरअसल, ये ग़लतियां जानबूझकर कराई जाती हैं. इससे पहले मैंने लिखा था कि हमारे नियम चाहे कितने भी ठीक तरह से लिखे गए हों, वे बेअसर रहते हैं, क्योंकि उन्हें तोड़ने की सज़ा उस मुनाफ़े के मुक़ाबले बहुत छोटी होती है, जो उनसे कमाया जा सकता है.

अब ख़बर है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने ड्राफ़्ट नियम जारी किए हैं, जो अगर सच में सख़्ती से लागू किए गए, तो इस पूरे तरीक़े को बदल सकते हैं. प्रस्तावित नियमों के मुताबिक़ बैंक सिर्फ़ थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट जैसे इंश्योरेंस और म्यूचुअल फ़ंड बेचने से पहले सहमति लेने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ये भी देखना होगा कि ये प्रोडक्ट उस ग्राहक के लिए सही हैं या नहीं. इससे भी अहम बात ये है कि अगर मिस-सेलिंग साब़ित होती है, तो बैंक को ग्राहक से ली गई पूरी रक़म लौटानी होगी और हुए किसी भी नुक़सान के लिए अतिरिक्त मुआवज़ा भी देना होगा.

यही आख़िरी प्रावधान इन ड्राफ़्ट नियमों को संभावित रूप से बड़ा बदलाव बना सकता है. पहली बार रेगुलेटर ऐसे नतीजों की बात कर रहा है जो सच में असर डाल सकते हैं. सालाना रिपोर्ट के डेटा के मुताबिक़, टॉप 5 प्राइवेट सेक्टर बैंकों की अन्य इनकम में इंश्योरेंस से होने वाली आय की हिस्सेदारी FY25 में बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई, जो FY19 में 8.2 प्रतिशत थी. टॉप दस बैंकों द्वारा बेचे गए इंश्योरेंस प्रोडक्ट से आय छह साल पहले के ₹6,381 करोड़ से ढाई गुना बढ़कर FY25 में ₹16,747 करोड़ हो गई. ये छोटी रक़में नहीं हैं. बैंकों ने कर्मचारियों के इंसेंटिव और सेल्स टारगेट को इन प्रोडक्ट की बिक्री से जोड़ा है, क्योंकि इनमें मुनाफ़ा ज़्यादा है.

अब असली सवाल ये है कि क्या ये ड्राफ़्ट एक सख़्त नियम बनेगा और उस पर ठीक से अमल होगा, या फिर हमारी लंबी लिस्ट में एक और ऐसा नियम जुड़ जाएगा जो सिर्फ़ काग़ज़ पर रह जाता है. किसी क़ानून के असरदार होने और बेअसर रहने के बीच का फ़र्क़ नतीजों की निश्चितता में होता है. थोड़ी-सी पेनल्टी, एक चेतावनी, लीगल टीम की कुछ औपचारिकताएं, बैंक इन्हें कारोबार की लागत मान लेते हैं. असली रोक तब लगती है, जब असली नुक़सान का डर हो.

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RBI का प्रस्ताव सही दिशा में क़दम है. पूरी रक़म की वापसी और साथ में मुआवज़े की शर्त मिस-सेलिंग का हिसाब बदल देती है. अगर हर ग़लत बिक्री में सिर्फ़ प्रीमियम लौटाने का नहीं, बल्कि ज़्यादा हर्ज़ाना देने का भी ख़तरा हो, तो धोखा देने का फ़ायदा घट सकता है. यही बात मैं पहले भी कह चुका हूं कि हमें ऐसी सख़्ती चाहिए जो सच में असर करे.

बेशक, ऐसे कई अधूरे बदलाव देखे हैं, इसलिए संदेह भी है. ड्राफ़्ट नियम अंतिम नियम नहीं होता. अंतिम नियम को लागू करना पड़ता है. लागू करने के लिए शिक़ायतों की जांच करनी होती है. जांच के लिए ये साब़ित करना होता है कि बिक्री के वक़्त क्या कहा गया था, जबकि ऐसी बातचीत का आमतौर पर कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं होता. हर चरण पर नियम को हल्का करने की गुंजाइश रहती है. बैंक नरमी की मांग करेंगे. बैंक चैनल पर निर्भर इंश्योरेंस कंपनियां भी अपनी बात रखेंगी. कारोबार की व्यवस्था के पास अच्छे इरादे वाले नियमों को धीमा करने के कई तरीक़े होते हैं.

फिर भी, बैंकिंग इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का इन नियमों पर चिंता जताना इस बात का इशारा है कि वे इसे गंभीर मान रहे हैं. जब कोई इंडस्ट्री कहती है कि नियम उसके कारोबार को चोट पहुंचाएंगे, तो अक्सर इसका मतलब होता है कि नियम असर कर सकते हैं. ख़बरों में एक प्राइवेट बैंक के रिटेल बैंकिंग प्रमुख ने माना कि नए नियम बैंकों को थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट बेचने में “सतर्क” बना देंगे.

साधारण निवेशकों के लिए सबक़ वही है, जो मैं लंबे वक़्त से कहता आया हूं: जटिलता मददगार नहीं होती. जब तक ये नियम लागू होकर अपने असर को ज़मीन पर साब़ित नहीं कर देते, तब तक सबसे मज़बूत बचाव सादगी ही है. सुरक्षा के लिए टर्म इंश्योरेंस, निवेश के लिए चुने हुए कुछ म्यूचुअल फ़ंड, और बाकी चीज़ों को नज़रअंदाज़ करने का अनुशासन. लेकिन अच्छा होगा अगर इस बार शब्दों में सचमुच कुछ धार आ जाए.

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