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IDFC फ़र्स्ट बैंक में फ़्रॉड भारतीय बैंकिंग सेक्टर की कोई ‘दुर्लभ घटना’ नहीं है

भारत में बैंकों की असफ़लता दर के संदर्भ में IDFC फ़र्स्ट बैंक पर एक नज़र

IDFC फ़र्स्ट बैंक फ्रॉड भारतीय बैंकिंग में कोई ब्लैक स्वान नहीं हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः कई निवेशक बैंकिंग सेक्टर से जुड़े झटकों को अलग-थलग घटना मानते हैं. इतिहास कुछ और कहता है. देखें कि पिछले 15 साल में बैंक फेल होने की घटनाएं बताती हैं कि इस इंडस्ट्री में टिके रहना कितना मुश्क़िल है.

अगर एक बात है जो हमेशा ‘अगला HDFC बैंक’ खोजने वाले निवेशक समझ नहीं पाते, तो वह यह है कि बैंकिंग सबसे मज़बूत के टिके रहने का खेल है. असल में, ज़्यादातर समय आपके पक्ष में संभावना नहीं होती.

पिछले हफ़्ते IDFC फ़र्स्ट बैंक में सामने आई धोखाधड़ी ने इस क्रूर हक़ीक़त को फिर से सामने ला दिया. और, यह हमारे लिए अपनी यादें ताज़ा करने का सही समय भी है.

1994 की क्लास और भारतीय बैंकिंग की असफ़लता दर

1993-94 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने सोचा कि देश की बैंकिंग व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा की ज़रूरत है. सरकारी बैंक बड़े, धीमे और ग्राहकों के लिए असुविधाजनक हो चुके थे. इसलिए RBI ने 10 नए निजी बैंकों को लाइसेंस दिए. इनमें HDFC बैंक, ICICI बैंक, UTI बैंक (अब एक्सिस बैंक है), इंडसइंड बैंक, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक, टाइम्स  बैंक, सेंचुरियन बैंक, बैंक ऑफ़ पंजाब, DCB बैंक और IDBI बैंक शामिल थे.

इन 10 में से चार बैंक टिक नहीं पाए. ग्लोबल ट्रस्ट बैंक ख़राब लोन और अकाउंटिंग फ़्रॉड के बोझ तले गिर गया. टाइम्स बैंक अपनी पहुंच बढ़ाने में असफ़ल रहा. सेंचुरियन बैंक और बैंक ऑफ़ पंजाब डगमगाए और बाद में दूसरे बैंकों में समा गए. इन चार में से दो को अंत में HDFC बैंक ने ही अपने में मिला लिया. उसने सिर्फ़ बेहतर प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि दूसरों को अपने में समेट लिया.

15 साल में 40 प्रतिशत बैंक ख़त्म हो गए. यह ऐसा सेक्टर नहीं है जहां आराम से शेयर चुन लिए जाएं. यह बताता है कि यहां गिरना असामान्य नहीं, बल्कि इस क़ारोबार का हिस्सा है.

तीन दशक बाद, वही HDFC बैंक आज हर अहम पैमाने पर देश का सबसे बड़ा निजी बैंक है. अब उन बैंकों को देखिए जिन्हें कभी उसका उत्तराधिकारी कहा गया था.

  • Yes बैंक अपने शिख़र से 95 प्रतिशत गिर चुका है.
  • बंधन बैंक, जिसे कभी माइक्रोफाइनेंस की सफ़लता कहानी माना जाता था, अपने ऑल-टाइम हाई से 70 प्रतिशत से ज़्यादा नीचे है.
  • RBL बैंक मैनेजमेंट बदलाव और एसेट क्वालिटी चिंताओं के बीच आधा रह गया है.
  • IDFC फ़र्स्ट बैंक पहले ही 30 प्रतिशत गिर चुका था और पिछले हफ़्ते की घटनाओं के बाद एक ही दिन में लगभग 20 प्रतिशत और गिर गया.

HDFC बैंक जैसा बनने के लिए क्या चाहिए?

HDFC बैंक की कहानी बोरिंग है. बहुत ही बोरिंग. आदित्य पुरी ने 26 साल तक बैंक चलाया और इस पूरे समय में कोई बड़ा नाटकीय बदलाव नहीं हुआ, कोई चौंकाने वाला अधिग्रहण नहीं हुआ, और न ही “हर हाल में तेज़ ग्रोथ” का दौर आया.

बस तिमाही दर तिमाही, अलग-अलग फ़ाइनेंशियल साइकिल में सतर्क तरीके़ से लोन देना. जोख़िम भरे लोन को मना करना, धोखाधड़ी जल्दी पकड़ने वाली व्यवस्था बनाना, और एक-एक ग्राहक से डिपॉज़िट बढ़ाना. यही रोज़ की सादगी भरी मेहनत उसकी सफ़लता की वजह बनी.

अब Yes बैंक को देखिए. राणा कपूर की कहानी तेज़ सफ़लता की थी. शेयर उड़ रहा था. तिमाही नतीजे चमक़ रहे थे. ब्रांच तेजी से बढ़ रही थीं. लेकिन हर लोन की क्वालिटी और हर फै़सले की सख्ती पर कम ध्यान था. इस तरह, उसकी चमक एक झटके में गायब हो गई. लाखों करोड़ की मार्केट वैल्यू का बड़ा हिस्सा ख़त्म हो गया.

बैंक शेयरों को कैसे देखें

वैल्यू रिसर्च में हम एक साधारण समझ से शुरुआत करते हैं. बैंकों में दांव अलग होते हैं.

बैंक कुछ हद तक बहुत ज़्यादा कर्ज़ वाली मैन्युफ़ैक्चरिंग कंपनी जैसे होते हैं. एक छोटी समस्या भी इक्विटी को बड़ा झटका दे सकती है, क्योंकि औसतन बैंक अपनी इक्विटी के 8 से 10 गुना तक काम करते हैं. जब उन लोन का छोटा हिस्सा भी ख़राब होता है, तो असर कई गुना बढ़ जाता है. असान शब्दों में, अगर बैंक अपने लोन पर 10 प्रतिशत नुक़सान करता है, तो शेयरहोल्डर अपनी 80 से 100 प्रतिशत पैसा गंवा सकते हैं. यही हर बैंकिंग संकट का गणित है.

दूसरी बात, हर मिड-टियर के बैंक के पास एक स्ट्रैटेजी डॉक्यूमेंट होता है जो अगले HDFC बैंक जैसा बनने की योजना बताता है. रिटेल बढ़ाओ, डिपॉज़िट बढ़ाओ, टेक्नोलॉजी में निवेश करो. शब्द लगभग एक जैसे होते हैं. जो चीज़ कंपाउंडर्स को डिस्ट्रॉयर्स से अलग करती है, वह विज़न नहीं बल्कि अंडरराइटिंग डिसिप्लिन और ऑपरेशनल कंट्रोल्स की बोरिंग, अनदेखी प्लंबिंग है.

तीसरी बात, बैंकिंग में धोखाधड़ी कोई दुर्लभ घटना नहीं है. यह एक लगातार रहने वाला जोख़िम है. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में भारत की बैंकिंग व्यवस्था ने धोखाधड़ी से ₹36,000 करोड़ गंवाए, जो पिछले साल से लगभग दोगुना है. सवाल यह नहीं है कि धोखाधड़ी होगी या नहीं. सवाल यह है कि क्या बैंक उसे समय पर पकड़ पाएगा. और बाहर बैठा निवेशक इसे पहले से नहीं समझ सकता.

चौथी बात, अगर आपको बैंक शेयर रखने ही हैं, तो सबसे मज़बूत बैंक चुनिए और धैर्य रखिए. HDFC बैंक किसी और जैसा बनने की कोशिश करके बड़ा नहीं बना. उसने 30 साल तक एक अच्छा बैंक बनने का कठिन और साधारण काम किया. यह वह चीज़ है जो सस्ता वैल्यूएशन ख़रीदकर नहीं मिलती.

IDFC फ़र्स्ट बैंक की घटना क्या सिखाती है

IDFC फ़र्स्ट बैंक की चंडीगढ़ ब्रांच में ₹590 करोड़ की धोखाधड़ी कुल डिपॉज़िट का सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत है. बहुत छोटा हिस्सा. लेकिन यह पूरे एक तिमाही के मुनाफ़े से ज़्यादा था. बाज़ार ने नुक़सान से कई गुना ज़्यादा वैल्यू मिटा दी. इसका मतलब यह है कि निवेशक सिर्फ़ इस धोखाधड़ी को नहीं देख रहे थे, बल्कि इस बात से डर रहे थे कि ऐसी चीज़ पकड़ने की व्यवस्था कितनी मज़बूत है. डर यह था कि शायद और भी कुछ छिपा हो.

यही बैंकिंग का असली दांव है. मामला सिर्फ़ दिख रहे नुक़सान का नहीं होता, बल्कि उस नुक़सान का होता है जो अभी सामने नहीं आया.

अगर आपके पास यह शेयर है और आपको नुक़सान हुआ है, तो हो सकता है यह निवेश सफ़ल न रहा हो. लेकिन इससे सीख बेकार नहीं जानी चाहिए. बैंकिंग ऐसा क़ारोबार है जहां ज़मीन अचानक खिसक सकती है.

ज़्यादातर उद्योगों में 30 प्रतिशत गिरावट तनाव का संकेत होती है. बैंकिंग में यह या तो ज़्यादा प्रतिक्रिया हो सकती है या फिर बड़ी गिरावट की शुरुआत. मुश्क़िल यह है कि उस समय यह साफ़ नहीं होता कि कौन-सा सच है.

तो इस सीख का क्या करें? अगली बार निवेश करते समय इसे याद रखें. ज़्यादा सख्त सवाल पूछें. सुरक्षा का बड़ा अंतर रखें. हर बैंक शेयर को थोड़े संदेह के साथ देखें. और अगर आप खुद यह सब नहीं कर सकते, तो बैंकों में फ़ंड के ज़रिए निवेश करें, जहां यह जांच आपके लिए की जाती है.

कोई निवेश बेकार नहीं जाता अगर वह आपकी समझ बेहतर कर दे.

और अगर आप समझदारी और भरोसे के साथ निवेश का फ़ैसला लेना चाहते हैं, तो वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र आपकी मदद कर सकता है. हमारा काम मज़बूत और टिकाऊ बिज़नेस को कमजोर कहानियों से अलग करना है. हम वित्तीय मज़बूती, मैनेजमेंट का रिकॉर्ड और संभावित जोख़िम को उतनी ही गंभीरता से देखते हैं जितनी दूसरे लोग ग्रोथ अनुमान को देखते हैं. लक्ष्य साफ़ है- कैपिटल को बचाना और लॉन्ग-टर्म में वेल्थ बनाने में आपकी मदद करना.

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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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