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फ्रॉड के शिकार लोगों के लिए दो नियम

जब ताक़तवर लोगों के साथ लूट होती है तो न्याय तेज़ी से मिलता है. बाक़ी लोगों के लिए, ऐसा नहीं है

two-rules-for-fraud-victimsAditya Roy/AI-Generated Image

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IDFC First Bank के फ्रॉड ने बहुत से लोगों को नाराज़ किया है. मैं भी नाराज़ हूं. लेकिन दिलचस्प सवाल ये है कि लोग आख़िर किस बात पर नाराज़ हैं? इस धोखाधड़ी में, कथित तौर पर कर्मचारियों और बाहरी लोगों की मिलीभगत से हरियाणा सरकार के खातों से बैंक की चंडीगढ़ शाखा के ज़रिए ₹590 करोड़ की रक़म निकाल ली गई. यह धोखाधड़ी निराश करने वाली है लेकिन चौंकाने वाली नहीं. इस तरह की बैंक धोखाधड़ी पहले भी हुई है और आगे भी होगी. सोशल मीडिया पर गुस्सा इसकी वजह से नहीं है. असली गुस्सा किसी और वजह से है: ज़्यादातर रक़म लगभग एक दिन के भीतर वापस या सुरक्षित कर ली गई. हरियाणा के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि करीब ₹556 करोड़ तुरंत रिस्टोर कर दिए गए. बैंक ने राज्य को ब्याज सहित भुगतान कर दिया. RBI ने कहा कि कोई सिस्टम स्तर का जोखिम नहीं है. और सब आगे बढ़ गए.

और यही बात आम लोगों को बेहद गुस्से में ला रही है. वे इस घटना की तुलना अपने अनुभव से कर रहे हैं और ये अंतर असहनीय है.

दो साल पहले, इसी कॉलम में भारत में डिजिटल फ़ाइनेंशियल धोखाधड़ी की महामारी पर लिखा गया था. उस समय भी यह बड़े स्तर पर था और तब से और बढ़ा है. हाल ही में सरकार ने संसद में इस समस्या से जुड़े कुछ आंकड़े रखे. अप्रैल 2021 से सितंबर 2025 तक, 4.5 साल में, साइबर अपराधियों ने 5.83 लाख दर्ज मामलों में भारतीय नागरिकों से लगभग ₹3,588 करोड़ की धोखाधड़ी की. इनमें से ज़्यादातर मामले इंटरनेट बैंकिंग धोखाधड़ी और ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड स्कैम से जुड़े थे. और इन ₹3,588 करोड़ में से, सिर्फ़ ₹239 करोड़, यानी लगभग 6.7 प्रतिशत वापस मिल पाए. जब किसी आम व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी होती है, तो सरकार हर ₹1 में से लगभग छह पैसे ही वापस ला पाती है.

अब इसकी तुलना IDFC मामले से कीजिए, जहां एक सरकारी इकाई ने एक ही दिन में 94 प्रतिशत रक़म वापस पा ली. ध्यान रहे कि बड़ी रक़म अपराधियों से बरामद नहीं हुई थी, बल्कि बैंक ने हरियाणा सरकार को अपनी जेब से लगभग तुरंत भुगतान कर दिया. इतना ही नहीं, अगले दिन अख़बारों में बैंक के पूरे पन्ने के विज्ञापन थे, जिनमें उसने खुद की सराहना की. फ़र्क़ अपराधियों की चतुराई या पैसे का पता लगाने की कठिनाई का नहीं है. दोनों ही मामलों में पैसा इलेक्ट्रॉनिक तरीके से KYC-कंप्लायंट बैंकिंग सिस्टम के भीतर घूमता है, जहां सिद्धांत रूप से हर रुपये का पता लगाया जा सकता है. फ़र्क़ इस बात का है कि पैसा किसका है और उसी के हिसाब से संस्थाएं कितनी तेज़ी से सक्रिय होती हैं.

पहले भी लिखा गया है कि भारत में फ़ाइनेंशियल फ्रॉड की असली समस्या जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि परिणामों की कमी है. फ़ाइनेंशियल एजुकेशन के चैनल विनम्र बने रहते हैं, वे बताते हैं कि क्या करना चाहिए, लेकिन शायद ही उतनी ताक़त से चेतावनी देते हैं कि आपके साथ क्या किया जा रहा है. जो ठग एक रिटायर्ड स्कूल शिक्षक की जीवन भर की बचत को नकली FedEx कॉल से साफ़ कर देते हैं, उनके पास पीड़ितों को भ्रमित करने का गहरा अनुभव होता है, लेकिन पीड़ितों के पास ऐसा कोई अनुभव नहीं होता.

लेकिन एक और असमानता है, जिस पर कम ध्यान जाता है: एन्फोर्समेंट यानि कार्रवाई में असमानता. जब हज़ारों आम भारतीय साइबर धोखाधड़ी के ज़रिए लुटते हैं, तो मामले पहले से बोझ झेल रही साइबर क्राइम इकाइयों में जमा हो जाते हैं, चोरी की रक़म कई खातों और नक़द निकासी के ज़रिए गायब हो जाती है और पीड़ितों से अक्सर कहा जाता है कि वसूली की उम्मीद कम है. लेकिन जब किसी राज्य सरकार के खाते से छेड़छाड़ होती है, तो रातोंरात फ़ॉरेंसिक टीमें लगाई जाती हैं, लाभार्थी बैंकों को तुरंत रिकॉल अनुरोध भेजे जाते हैं और मुख्यमंत्री एक दिन के भीतर प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके सफलता की घोषणा करते हैं.

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असल में व्यवहार क्या बदलेगा? जिसे “दिखाई देने वाली सज़ा” कहा जा सकता है. सिर्फ़ केस दर्ज करना नहीं, जो सालों तक खिंचते रहें, बल्कि तेज़, सार्वजनिक और सुर्खियां बनाने वाली गिरफ़्तारियां और सजा जैसी कार्रवाई हों, जो संभावित ठगों में असली डर पैदा करें. अभी साइबर धोखाधड़ी का गणित अपराधी के पक्ष में है: ज़्यादातर रक़म अपने पास रख पाने की लगभग निश्चितता, सज़ा के जोखिम से कहीं ज़्यादा फ़ायदा देती है. जब तक ये हिसाब नहीं बदलेगा, जागरूकता अभियान कोई बड़ा असर नहीं डाल पाएंगे.

दिलचस्प बात यह है कि IDFC मामला दिखाता है, जब संस्थाएं पर्याप्त रूप से प्रेरित हों तो क्या संभव है. वही बैंकिंग ढांचा जिसने चोरी को संभव बनाया, उसने ही वसूली को भी संभव बनाया. तकनीक मौजूद है. क़ानूनी ढांचा मौजूद है. जो चीज़ कम दिखाई देती है, वह है आम नागरिकों के मामलों में वही तात्कालिकता दिखाने की इच्छा, जो सरकारी विभागों के मामलों में दिखती है.

सोशल मीडिया का ग़ुस्सा अव्यावहारिक नहीं है. बल्कि ये उस सिस्टम को ठीक से पढ़ने की क्षमता है, जिसने दो अलग नियम बना रखे हैं - एक ताक़तवरों के लिए और एक बाक़ी सबके लिए.

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