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फ़ंड का मैनेजर बदल जाए, तो निवेशक क्या करें?

एक फ़ंड मैनेजर आपके एक्टिव फ़ंड के रिटर्न को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है

जिस फ़ंड पर भरोसा किया, वो रातोरात बदल सकता हैNitin Yadav/AI-Generated Image

सारांशः जब आप एक्टिव म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करते हैं तो आप फ़ंड मैनेजर पर भी दांव लगाते हैं. मुश्किल यह है कि यह जोख़िम असली है लेकिन अक्सर तब तक नज़र नहीं आता जब तक नतीजे न बदल जाएं.

जब आप किसी एक्टिवली मैनेज्ड म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करते हैं तो एक साथ दो दांव लगाते हैं. पहला मार्केट पर. दूसरा, एक इंसान पर जो कम नज़र आता है और शायद ही कभी उसकी चर्चा होती है.

वो इंसान है फ़ंड मैनेजर. मार्केट रिस्क के उलट, जिसे निवेशक जानते-बूझते इक्विटी निवेश की क़ीमत के तौर पर स्वीकार करते हैं, मैनेजर रिस्क बिना किसी चेतावनी के आता है. ज़्यादातर निवेशकों को यह पता ही नहीं चलता कि वो यह जोख़िम उठा रहे हैं, जब तक कुछ बदलता नहीं और जो फ़ंड उन्होंने सोचा था वो कुछ और ही निकलता है.

परफ़ॉर्मेंस ट्रैक रिकॉर्ड ऐसे पेश किए जाते हैं जैसे वो किसी फ़ंड के हों, लेकिन असल में वो उस शख़्स के हैं जिसने उसे चलाया. उस शख़्स को बदलो और आपके पास एक बिल्कुल अलग निवेश हो सकता है जो वही पुराना नाम ओढ़े हो. पैसिव इन्वेस्टिंग यह समस्या हटा देती है. लेकिन यह समझने के लिए पहले यह देखना ज़रूरी है कि मैनेजर रिस्क असल में क्या असर डाल सकता है.

जब मैनेजर बदलता है तो सब कुछ बदलता है

2015 से 2017 के बीच एक फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड ने लगातार अच्छा रिटर्न दिया और ब्रॉडर मार्केट इंडेक्स को एक अच्छे अंतर से पीछे छोड़ा. उस दौर में आए निवेशकों के पास भरोसेमंद होने की वजह थी. फ़ंड ने एक अच्छी साख बनाई थी, आंकड़े बात करते थे.

अप्रैल 2019 में मैनेजर बदला और उसके बाद तीन साल की निराशा आई. 2019 से 2022 तक फ़ंड बार-बार अपने बेंचमार्क से पीछे रहा. जिन निवेशकों ने पहले के रिकॉर्ड को देखकर ख़रीदा था, अब उनके पास एक अंडरपरफ़ॉर्मर था. इसलिए नहीं कि मार्केट ने उन्हें निराश किया, बल्कि इसलिए कि फ़ैसले लेने वाला शख़्स बदल गया था.

फिर 2022 के मध्य में एक और बदलाव आया और निवेश की स्ट्रैटेजी में भी तेज़ बदलाव हुआ. फ़ंड ज़ोरदार तरीक़े से वापस आया, 2023 और 2024 में आउटपरफ़ॉर्म किया. लेकिन रिकवरी उतार-चढ़ाव भरी थी. 2025 तक यह फिर तेज़ी से फिसल गया.

एक दशक में वही फ़ंड आउटपरफ़ॉर्मेंस, लंबे अंडरपरफ़ॉर्मेंस और उतार-चढ़ाव भरी वापसी से गुज़रा. हर मोड़ इस बात पर निर्भर था कि ड्राइविंग सीट पर कौन था.

अच्छा नतीजा पक्क़ा नतीजा नहीं होता

दूसरा उदाहरण और तीखा है. यह एक टैक्स-सेविंग इक्विटी फ़ंड की बात है जिसमें कैटेगरी के नियम के मुताबिक़ 3 साल का लॉक-इन होता है. 2018 से 2020 के बीच यह फ़ंड लगातार बेंचमार्क से पीछे रहा. नियम की वजह से लॉक-इन में फंसे निवेशकों के पास कोई रास्ता नहीं था. वो बस बैठकर देखते रहे. जनवरी 2021 में नया मैनेजर आया. तब से फ़ंड ने काफ़ी बेहतर किया है और लगातार बेंचमार्क से आगे रहा है.

जो निवेशक मुश्किल सालों में लॉक-इन में थे उनके लिए मैनेजर बदलाव फ़ायदेमंद रहा. लेकिन यह वो नतीजा नहीं जिस पर आप पहले से भरोसा कर सकें. नया मैनेजर किसी संघर्ष कर रहे फ़ंड को बचा सकता है, जैसा इस मामले में हुआ. या वो किसी मज़बूत फ़ंड को संभाले और जो चीज़ उसे अच्छा बनाती थी उसे घटा दे. इतिहास दोनों नतीजे बराबर-बराबर देता है और यही उतार-चढ़ाव असल समस्या है.

वो जोख़िम जिसे नापा नहीं जा सकता

यही वो सच्चाई है जो एक्टिव निवेश के स्ट्रक्चर में है: मैनेजर रिस्क है और फिर भी इसे नापा नहीं जा सकता. मार्केट वोलैटिलिटी माप सकते हैं. गिरावट के सिनेरियो का मॉडल बना सकते हैं. लेकिन आप यह अनुमान नहीं लगा सकते कि आपका फ़ंड मैनेजर कब छोड़ेगा, स्ट्रैटेजी बदलेगा या बस अपनी धार खो देगा. और अगला मैनेजर कितना नुक़सानदेह साबित हो सकता है, यह तो बिल्कुल नहीं मॉडल कर सकते.

जो कर सकते हैं वो है निगरानी. मैनेजर बदलाव ट्रैक करें. जब लीडरशिप बदले तो पोर्टफ़ोलियो दोबारा परखें. यह आंकें कि जो निवेश का आधार आपको पसंद आया था वो अभी भी फ़ंड को चला रहा है या नहीं. यह नामुमकिन नहीं है लेकिन मेहनत का काम है और ज़्यादातर निवेशक, अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त, यह लगातार नहीं कर पाते.

एक्टिव निवेश का मैंडेट निवेशकों से एक बार अच्छा फ़ंड चुनने से ज़्यादा मांगता है. यह उन्हें उस फ़ंड पर अनिश्चित काल तक नज़र रखने को कहता है, उन बदलावों के लिए सतर्क रहते हुए जिनके बारे में शायद वक़्त पर पता भी न चले.

वो समस्या जो पैसिव निवेश ख़त्म कर देती है

इंडेक्स फ़ंड और ETF (एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड) यह समस्या साफ़ तरीक़े से सुलझा देते हैं. निवेश का प्रोसेस नियम-आधारित है. पोर्टफ़ोलियो एक मार्केट इंडेक्स को दर्शाता है और सिर्फ़ तब बदलता है जब इंडेक्स बदले. फ़ंड मैनेजर का काम ऑपरेशनल हो जाता है, निजी फ़ैसले से तय करने की जगह कि क्या ख़रीदना है या बेचना है, एफ़िशिएंट ट्रैकिंग बनाए रखना उसका काम है.

इससे मैनेजर का वेरिएबल पूरी तरह हट जाता है. जो फ़ंड आज निफ़्टी 50 ट्रैक करता है, पांच साल बाद भी वही नियम फ़ॉलो करेगा, चाहे ट्रेड पर किसी के भी दस्तख़त हों. कोई स्टार मैनेजर नहीं ट्रैक करना. स्ट्रैटेजी में कोई बदलाव नहीं. स्टाफ़ में बदलाव की किसी घोषणा को नहीं देखना है. पैसिव फ़ंड शरदार प्रदर्शन का वादा नहीं करते. कुशल एक्टिव मैनेजर मार्केट को बीट करते हैं, कुछ लंबे समय तक. लेकिन पैसिव निवेश उस संभावना की जगह जो देती है वो लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए शायद ज़्यादा क़ीमती है: नज़रिए की निश्चितता. आपको पता है आपके पास क्या है, क्यों है और यह कुछ और नहीं बनेगा.

एक्टिव फ़ंड नतीजे दे सकते हैं. लेकिन उनका नतीजा इंसानों पर निर्भर है. और इंसान छोड़ते हैं, रास्ता बदलते हैं, कमज़ोर पड़ते हैं या बस पहले जितने अच्छे नहीं रहते.

पैसिव इन्वेस्टिंग यह निर्भरता हटा देती है. यह फ़ैसले की जगह स्ट्रक्चर रख देती है. और जो निवेशक मार्केट को नेविगेट करने वाले शख़्स पर दांव लगाने की जगह ख़ुद मार्केट के मालिक बनना चाहते हैं, उनके लिए यह समझौता कोई दिलासा नहीं है. यही तो मक़सद है.

यह भी पढ़ें: 'एक्टिव' फ़्लेक्सी-कैप vs 'लेज़ी' फ़्लेक्सी-कैप: कौन-सा बेहतर है?

ये लेख पहली बार अप्रैल 02, 2026 को पब्लिश हुआ.

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