Aditya Roy/AI-Generated Image
अमेरिकी शेयर बाज़ार के पिछले 93 साल के इतिहास में 10 प्रतिशत या उससे ज़्यादा की 50 गिरावटें आ चुकी हैं. यानी औसतन हर दो साल में एक बार. इन 50 में से 15 गिरावटें तो 25 प्रतिशत या उससे भी ज़्यादा की थीं. अतीत पर ग़ौर करें तो वहां के बाज़ार में हर छह साल में एक बेयर मार्केट का सामना किया है. ये आंकड़े पीटर लिंच के हैं, जो अब तक के सबसे बेहतरीन फ़ंड मैनेजरों में से एक हैं. और उन्होंने यह बात डराने के लिए नहीं, बल्कि तसल्ली देने के लिए कही थी. अगर आप यह समझ लें कि गिरावट बाज़ार का एक स्थायी और अनुमानित हिस्सा है, तो फिर हर गिरावट किसी आपदा जैसी नहीं लगती, बल्कि कैलेंडर की एक तारीख़ की तरह लगती है.
पिछले हफ़्ते जब मैंने देखा कि मार्च में सेंसेक्स करीब 8 प्रतिशत गिरकर 72,000 पर आ गया, और फिर जब मैं यह लिख रहा हूं तो यह 75,000 के पार वापस पहुंच गया है, तो मुझे लिंच की यही बात याद आई. इंडेक्स 77,000 तक उछलेगा या फिर 73,000 तक लुढ़केगा, यह सच में कोई मायने नहीं रखता. असल बात यह है कि यह दौर आपको क्या सिखा रहा है या एक निवेशक के तौर पर आपके लिए इसके क्या मायने होने चाहिए.
एक बात मैं लंबे समय से मानता आया हूं और सीधे कहना चाहता हूं: कोई किताब, कोई कॉलम, कोई फ़ाइनेंशियल कोर्स, और तो और कोई यूट्यूब वीडियो भी आपको वह नहीं दे सकता जो एक असली बाज़ार की गिरावट देती है. यह समझ तजुर्बे से आती है. इसके लिए आपको उस दौर के बीच में रहना होगा, जब आपका पोर्टफ़ोलियो सिकुड़ रहा हो, अख़बारों की सुर्खियां डरा रही हों, घर के लोग चिंतित हों, और मन बेचैन हो कि कुछ तो करो. तभी आप जान पाते हैं कि सच में आप किस तरह के निवेशक हैं. थ्योरी एक अच्छी तैयारी हो सकती है, लेकिन असली परीक्षा तो टिके रहने में है.
मैं यह अपने निजी तजुर्बे से कह रहा हूं. जिन तीन गिरावटों ने मुझे सबसे ज़्यादा सिखाया, वे थीं: 1992 का हर्षद मेहता घोटाला, 2000-01 का डॉटकॉम क्रैश और 2008 की ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस. उस वक़्त हर गिरावट डरावनी लगती थी, लेकिन जो निवेश में टिके रहे, उनकी लंबी अवधि की कहानी में ये गिरावटें बेमानी साबित हुईं. मुझे अब भी 2008 की क्राइसिस से जुड़े दौर की हंसाने वाली बातें याद हैं जो वैल्यू रिसर्च के दफ़्तर में छाई हुई थी. उन दिनों एक चुटकुला चर्चा में था कि दो ट्रेडर्स बात कर रहे हैं. पहला कहता है, "मैंने सब छोड़ दिया, अब बस सोना ख़रीदूंगा." दूसरा सोचता है और जवाब देता है, "सोने का क्या करोगे? मैं तो चावल ख़रीद रहा हूं."
यह भी पढ़ेंः SIP कितने समय तक चलनी चाहिए?
वह मज़ाक, और उसके बाद की घबराहट भरी हंसी, उन हफ़्तों के एहसास की एक सच्ची झलक थी-मानो दुनिया के सामान्य नियमों पर अनिश्चित काल के लिए रोक लग गई हो. लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि हर गिरावट ने मुझे वह सिखाया जो मैं किसी और तरीक़े से नहीं सीख सकता था: कि बाज़ार में जमीनी स्तर पर जो शोर होता है, वह असली तबाही से बिल्कुल अलग नहीं लगता, और सिर्फ़ डटे रहकर ही इससे उबरा जा सकता है. जो निवेशक एक बड़ी गिरावट से गुज़र चुका होता है, वह अगली गिरावट में कुछ अनमोल - अनुमान नहीं, बल्कि समझ- लेकर आता है. उसने यह फ़िल्म पहले देखी होती है. उसे सिर्फ़ दिमाग़ में नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों में पता होता है कि कहानी का अंत वैसा नहीं होगा जैसा घबराई हुई आवाज़ें कह रही हैं.
लिंच एक और बात कहते हैं जो सोचने लायक़ है. वे वॉलमार्ट का उदाहरण देते हैं, जो 1970 में पहले से ही शानदार रिकॉर्ड के साथ पब्लिक हुई थी. अगर आपने लिस्टिंग के दिन ही शेयर ख़रीदे होते, तो दशकों में आपकी रक़म 500 गुना हो जाती. लेकिन, और यही वह हिस्सा है जो लोग चूक जाते हैं, अगर आपने इस चिंता में 10 साल इंतज़ार किया होता कि वॉलमार्ट कुछ राज्यों से आगे बढ़ पाएगी या नहीं, और तब शेयर ख़रीदा होता, तो भी आपकी रक़म 35 गुना होती. यहां सबक़ यह नहीं है कि टाइमिंग आसान है. सबक़ यह है कि वक़्त उन लोगों पर बेहद मेहरबान होता है जो घबराते नहीं. वॉलमार्ट में निवेश करने के लिए आपके पास दशकों का वक़्त था और फिर भी आप अच्छा मुनाफ़ा कमा सकते थे. बस एक काम जो आप नहीं कर सकते थे, वह था उन 50 गिरावटों में से किसी एक में बेचकर वापस न आना.
मौजूदा गिरावट, चाहे जितनी भी गहरी हो, एक काम तो कर ही रही है. यह निवेशकों को दो हिस्सों में बांट रही है: वे जो पहली बार सच में डरे हुए हैं, और वे जो पहले भी इस डर से गुजर चुके हैं. पहला ग्रुप उसी समय रियल टाइम में, असली क़ीमत पर अपने सबक़ हासिल कर रहा है. इनमें से कुछ सही सबक़ सीखेंगे, कुछ नहीं. जो सीखेंगे, जो हाथ बांधकर बैठे रहेंगे, शायद अपनी SIP में थोड़ा और जोड़ेंगे और इस दौर के गुज़रने का इंतज़ार करेंगे, वे हमेशा के लिए दूसरे ग्रुप में शामिल हो जाएंगे.
और, दूसरा ग्रुप ही है जो रात को काफ़ी अच्छी नींद सोता है.
यह भी पढ़ेंः घबराहट के दौरान एक नज़रिया






