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मार्च में जितने दिन नहीं, उससे ज़्यादा क्राइसिस आ गईं

पूरी रक़म एक साथ निवेश करने की जल्दबाज़ी करने के बजाय एक बेहतर तरीक़ा अपनाइए

पूरी रक़म एक साथ निवेश करने की जल्दबाज़ी करने के बजाय एक बेहतर तरीक़ा अपनाइएAditya Roy/AI-Generated Image

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सारांशः वर्ल्ड कप में जीत, एक युद्ध, $119 पर तेल, रिफाइनरियों पर ड्रोन हमले, बैंक चेयरमैन का जाना-और अभी तो महीना भी खत्म नहीं हुआ है. सुबह की यह घबराहट अभी भी उधार के पैसे से निवेश करने वालों की है, आपकी नहीं.

मार्च 2026 अब तक क्या-क्या दे चुका है, ज़रा सोचिए. 8 तारीख़ को भारत ने T20 वर्ल्ड कप जीता - अहमदाबाद में न्यूज़ीलैंड को 96 रन से हराया. 19 तारीख़ तक ईरानी ड्रोन यानबू में सऊदी अरामको की SAMREF रिफ़ाइनरी पर हमला कर रहे थे. इन 11 दिनों के बीच: एक जंग जिसने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ बंद कर दिया, ब्रेंट क्रूड का $119 प्रति बैरल को छूना, क़तर की सबसे बड़ी गैस फ़ैसिलिटी को नुकसान, यूएस फ़ेडरल रिज़र्व का 3.75 प्रतिशत पर ब्याज दर रोके रखना और कटौती के कोई संकेत न देना, HDFC बैंक के चेयरमैन का "मूल्यों और नैतिकता" के आधार पर इस्तीफ़ा और AI से जुड़ी उथलपुथल जिसने फ़ंड मैनेजर्स को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अगले पांच साल में कौन-सी IT कंपनियां टिकी रहेंगी. यह सब होली, ईद और उगादी के ऊपर से आया है. जो महीना बुमराह के वर्ल्ड कप फ़ाइनल में चार विकेटों से शुरू हुआ था, अब उसमें रिफ़ाइनरियों पर ड्रोन हैं. मार्च में दिनों से ज़्यादा संकट हैं.

गुरुवार, 19 मार्च को सेंसेक्स 3.26 प्रतिशत गिरा. एक ही सेशन में क़रीब ₹10 लाख करोड़ का मार्केट कैप साफ़ हो गया. सेंसेक्स के सभी 30 शेयर लाल निशान पर बंद हुए. 16 के 16 सेक्टोरल इंडेक्स गिरे. इंडिया VIX 23 प्रतिशत उछला. अगर आप दिन भर फ़ोन देखते रहे, तो ऐसा लगा होगा जैसे चारों तरफ़ से आपकी माली हालत पर हमला हो रहा हो.

यह एहसास समझ में आता है. लेकिन एहसास कोई तथ्य नहीं होता. और जो बाज़ार आप देख रहे थे, वो वही बाज़ार नहीं है जिसमें आपका पैसा लगा है.

यह एक ऐसा पैटर्न है जिसके बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूं. 2 मार्च को भी यही हुआ था, जब प्री-मार्केट में Sensex के 2,700 पॉइंट गिरने का संकेत था, लेकिन दिन के अंत में गिरावट उसका एक छोटा-सा हिस्सा रही. यही महामारी के दौरान हुआ. यही हर भू-राजनीतिक झटके पर होता है. प्री-मार्केट की तबाही डरावनी लगती है. क्लोज़िंग प्राइस कहीं कम नाटकीय होती है. और फिर भी हम इन दोनों के बीच की खाई में छुपा सबक़ कभी नहीं सीखते.

वो सबक़ यह है: उधार के पैसों से निवेश करने वाले, क़ीमतों को बढ़ाते हैं.

जब आप शेयर ख़रीदने के लिए पैसे उधार लेते हैं या फ़्यूचर्स और ऑप्शंस मार्केट में पोज़ीशन लेते हैं, तो आप ऐसी पूंजी से निवेश कर रहे होते हैं जो आपसे रोज़ किराया वसूलती है और क़ीमत ग़लत दिशा में जाने पर ज़बरदस्ती वापस मांगी जा सकती है. समय आपका दोस्त नहीं है - वो एक टिकटिक करती घड़ी है. जब रात 2 बजे ब्रेंट क्रूड $119 पर पहुंचता है और ईरानी ड्रोन सऊदी रिफ़ाइनरी पर हमला करते हैं, तो क़र्ज़ लेकर निवेश करने वाला सुबह की पूरी तस्वीर का इंतज़ार नहीं कर सकता. उसे तुरंत कदम उठाना पड़ता है, क्योंकि हर घंटे की देरी मार्जिन कॉल बन सकती है. उसकी घबराहट ग़ैर-वाजिब नहीं है. उसके फ़ाइनेंशियल स्ट्रक्चर को देखते हुए यही एकमात्र समझदारी भरा जवाब है.

यही वो बाज़ार है जो आप सुबह 9:15 पर देख रहे होते हैं. यह उन लोगों का बाज़ार है जो उधार लेकर वहां हैं, जिनका निवेश का दायरा घंटों में नापा जाता है और जिनके लिए तेल का झटका या बैंक चेयरमैन का इस्तीफ़ा सच में एक आपात स्थिति है. SEBI की रिसर्च बताती है कि 89 प्रतिशत व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स को नुक़सान होता है. जो लेवरेज उन नुक़सानों की वजह है, वही लेवरेज पहले घंटे की तबाही की वजह भी है. जब आप Sensex को 2,500 पॉइंट गिरते देखकर घबरा जाते हैं, तो दरअसल आप किसी और के फ़ाइनेंशियल स्ट्रक्चर के भावनात्मक नतीजे महसूस कर रहे होते हैं. अपनी नहीं.

दिन भर में जो रिकवरी होती है, वो बाज़ार का "शांत होना" नहीं है. वो असली बाज़ार का उधार-के-पैसों वाले बाज़ार पर दोबारा हावी होना है. जैसे-जैसे लेवरेज्ड पोज़ीशन बंद होती हैं, म्यूचुअल फ़ंड और SIP के ज़रिए असली कारोबार के मालिक बने लोग धीरे-धीरे फिर से क़ीमत तय करने लगते हैं. उन पर बेचने का कोई दबाव नहीं है. किसी ने उन्हें वो पैसा नहीं दिया जो शाम तक वापस करना हो.

मैं यह साफ़ कहना चाहता हं. मार्च 2026 कोई साधारण महीना नहीं है. $110 से ऊपर का तेल भारत के लिए एक बड़ी मुसीबत है, जो अपनी 85 प्रतिशत क्रूड ज़रूरत आयात से पूरी करता है. अगर ये क़ीमतें बनी रहीं, तो महंगाई बढ़ेगी, करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ेगा और तेल से जुड़े सेक्टर्स की कमाई पर असर पड़ेगा. जंग वास्तविक है. सप्लाई में रुकावट वास्तविक है. यह कोई झूठी चेतावनी नहीं है.

लेकिन एक असली समस्या और आपकी आपात स्थिति में फ़र्क़ होता है. असली समस्या हफ़्तों और महीनों में वैल्यूएशन को एडजस्ट करती है, जैसे-जैसे तस्वीर साफ़ होती जाती है. आपकी आपात स्थिति - जिस तरह की जो गुरुवार की सुबह 9:15 पर आपको कदम उठाने पर मजबूर करे - तभी होती है जब आपने बाज़ार में उधार लेकर पैसा लगाया हो.

मार्च ने अपना सब कुछ झोंक दिया है. वर्ल्ड कप, जंग, तेल, ड्रोन, AI, एक कॉर्पोरेट गवर्नेंस का विवाद, एक सख़्त फ़ेड. महीना अभी ख़त्म नहीं हुआ. लेकिन सुबह की घबराहट उधार के पैसों से निवेश करने वालों की है. उनकी आपात स्थिति उधार लेने की कोई ज़रूरत आपको नहीं है.

यह भी पढ़ेंः घबरा जाना और हार मान लेना

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